संख्याओं की दुनिया — गणित मंजरी कक्षा 9 अध्याय 3 सम्पूर्ण हल |

गणित मंजरी कक्षा 9 अध्याय 3 संख्याओं की दुनिया के सभी अभ्यासों का सम्पूर्ण हल — प्राकृत संख्याएं, शून्य, पूर्णांक, परिमेय और अपरिमेय संख्याएं, √2 का प्रमाण सहित। SCERT Uttarakhand Ganita Manjari Class 9 Chapter 3 all exercise solutions in Hindi

Apr 28, 2026 - 10:54
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संख्याओं की दुनिया — गणित मंजरी कक्षा 9 अध्याय 3 सम्पूर्ण हल |
गणित मंजरी कक्षा 9 अध्याय 3 संख्याओं की दुनिया — प्राकृत, पूर्णांक, परिमेय, अपरिमेय और वास्तविक संख्याएं | Ganita Manjari Class 9 Chapter 3 World of Numbers Solutions SCERT Uttarakhand

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गणित मंजरी कक्षा 9 — अध्याय 3
संख्याओं की दुनिया — सम्पूर्ण व्याख्या, प्रमाण एवं हल सहित
प्राकृत संख्याओं से शून्य, ऋणात्मक, परिमेय, अपरिमेय और वास्तविक संख्याओं तक की पूरी यात्रा

3.1 गणित का उदय — गिनने की मानवीय आवश्यकता

गणित का जन्म किसी कक्षा में नहीं हुआ था। हजारों साल पहले, जब मनुष्य कृषि समुदायों में रहते थे, उन्हें गायों की संख्या जानने की आवश्यकता थी। बिना संख्याओं के वे एक-से-एक पत्राचार (One-to-One Correspondence) का उपयोग करते थे — हर गाय के लिए मिट्टी के बर्तन में एक कंकड़। यही प्राकृत संख्याओं (Natural Numbers) का जन्म था।

प्राकृत संख्याएं: ℕ = {1, 2, 3, 4, ...} — ये गिनने की मूलभूत संख्याएं हैं जो कम से कम दसों हजार साल पुरानी हैं।

3.1.1 हड्डी पर लिखा इतिहास

लेबॉम्बो हड्डी (Lebombo Bone) — दक्षिण अफ्रीका और स्वाजीलैंड के बीच पाई गई, लगभग 35,000 साल पुरानी। इसमें 29 सुव्यवस्थित निशान हैं जो चंद्रमा के चरणों को गिनने के लिए उपयोग किए जाते थे।

इशांगो हड्डी (Ishango Bone) — कांगो के पास लगभग 20,000 BCE की। इसमें तीन स्तंभ हैं जिनमें 11, 13, 17, 19 के समूह हैं — ये 10 और 20 के बीच की अभाज्य संख्याएं हैं! एक अन्य स्तंभ 2 से गुणन (दोगुना करना) दर्शाता है।

भारतीय संदर्भ: व्यापार और खगोल — सिंधु घाटी सभ्यता के लोथल और हड़प्पा में व्यापार के लिए मानकीकृत बाट की जरूरत थी। वेदों में 1012 तक की घात संख्याओं के नाम थे (जैसे परार्ध)। ललितविस्तार में बुद्ध ने 1053 (तल्लक्षण) तक के नाम बताए। ऋग्वेद में 10 की घातों का उपयोग हमारी आज की दशमलव संख्या प्रणाली की नींव बना।

अभ्यास 3.1 — सम्पूर्ण हल

प्रश्न 1: लोथल का एक व्यापारी मसाले के 2 थैलों के बदले 15 तांबे की छड़ें लेता है। यदि वह 12 थैले लाए तो कितनी छड़ें मिलेंगी?
2 थैले → 15 छड़ें
1 थैला → 15/2 छड़ें
12 थैले → 12 × (15/2) = 12 × 7.5 = 90 छड़ें

प्रश्न 2: इशांगो हड्डी के एक स्तंभ में 11, 13, 17, 19 हैं। इनमें क्या समानता है? अगली तीन संख्याएं बताएं।
ये सभी अभाज्य संख्याएं (Prime Numbers) हैं — जो केवल 1 और स्वयं से विभाज्य हों।
अगली तीन अभाज्य संख्याएं: 23, 29, 31

प्रश्न 3: क्या प्राकृत संख्याएं घटाव के लिए बंद हैं?
नहीं, प्राकृत संख्याएं घटाव के लिए बंद नहीं हैं।
उदाहरण: 3 − 5 = −2 (प्राकृत संख्या नहीं)
2 − 7 = −5 (प्राकृत संख्या नहीं)
जब छोटी संख्या में से बड़ी घटाई जाए तो परिणाम ऋणात्मक होता है जो ℕ में नहीं है।

★ प्रश्न 4: प्राचीन भारतीय हाथ की उंगलियों के जोड़ों से गिनते थे। एक हाथ में कितने जोड़ होते हैं? आधार-12 से क्या संबंध है?
4 उंगलियाँ × 3 जोड़ प्रति उंगली = 12 जोड़ (अंगूठे से गिनकर)
इसलिए एक हाथ से 12 तक गिना जा सकता था → यही आधार-12 (Base-12) गणना प्रणाली का आधार था। यही कारण है कि आज भी 1 दर्जन = 12, 1 फुट = 12 इंच, 1 दिन = 24 घंटे (12×2) होते हैं।

3.2 शून्य की क्रांति — जब "कुछ नहीं" "कुछ" बन गया

हजारों साल तक संख्या रेखा 1 से शुरू होती थी। यदि आपके पास 5 सेब थे और सब दे दिए, तो उस स्थिति के लिए कोई संख्या नहीं थी। बेबीलोनियन और माया सभ्यताओं ने प्लेसहोल्डर का उपयोग किया, लेकिन वे "शून्य" को एक संख्या नहीं मानते थे।

बख्शाली पांडुलिपि और ब्रह्मगुप्त के नियम — बख्शाली पांडुलिपि (प्रारंभिक शताब्दियां CE) में शून्य को एक बिंदु (bindu) से दर्शाया गया था। लेकिन ब्रह्मगुप्त ने अपने ब्राह्मस्फुटसिद्धांत (628 CE) में शून्य को पहली बार एक पूर्ण गणितीय संख्या के रूप में परिभाषित किया: a − a = 0

ब्रह्मगुप्त के शून्य के नियम

  • किसी भी संख्या में शून्य जोड़ने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है: a + 0 = a
  • किसी भी संख्या में से शून्य घटाने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है: a − 0 = a
  • किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर शून्य मिलता है: a × 0 = 0

3.3 पूर्णांक — क्षितिज का विस्तार

ब्रह्मगुप्त की दो अवस्थाएं: धन (Dhana) → धनात्मक संख्याएं = सम्पत्ति | ऋण (Riṇa) → ऋणात्मक संख्याएं = कर्ज

संख्या रेखा: ← −5   −4   −3   −2   −1   0   1   2   3   4   5 →
← ऋण (कर्ज)                               धन (सम्पत्ति) →

3.3.1 पूर्णांकों का अंकगणित

नियम उदाहरण वास्तविक जीवन
धन + धन = धन 5 + 4 = 9 ₹5 + ₹4 = ₹9
ऋण + ऋण = ऋण (−5) + (−4) = −9 ₹5 का कर्ज + ₹4 का कर्ज
धन − शून्य = धन 7 − 0 = 7
ऋण × धन = ऋण (−3) × 4 = −12 4 बार ₹3 का कर्ज लेना
ऋण × ऋण = धन (−3) × (−4) = 12 4 कर्ज हटाना = ₹12 अमीर

अभ्यास 3.2 — सम्पूर्ण हल

प्रश्न 1: लद्दाख में दोपहर का तापमान 4°C है। रात तक 15°C गिर जाता है। रात का तापमान?
4 − 15 = −11°C

प्रश्न 2: एक व्यापारी ₹850 का कर्ज लेता है, अगले दिन ₹1200 मुनाफा, अगले सप्ताह ₹450 हानि। अंतिम स्थिति?
प्रारंभिक स्थिति + मुनाफा − हानि − कर्ज
= −850 + 1200 − 450
= 1200 − 1300 = −₹100 (अभी भी ₹100 का घाटा)

प्रश्न 3: ब्रह्मगुप्त के नियमों से हल करें:
(i) (−12) × 5 = −60
(ii) (−8) × (−7) = +56
(iii) 0 − (−14) = 0 + 14 = 14
(iv) (−20) ÷ 4 = −5

3.4 परिमेय संख्याएं — भिन्न और अनुपात

परिमेय संख्या की परिभाषा: कोई भी संख्या जिसे p/q के रूप में लिखा जा सके — जहाँ p और q पूर्णांक हों और q ≠ 0 — परिमेय संख्या (Rational Number) कहलाती है।

विचार करें (Think and Reflect): q ≠ 0 क्यों जरूरी है?
यदि q = 0 हो, तो p/q का अर्थ होगा किसी संख्या को शून्य से भाग देना। इसका कोई परिभाषित मूल्य नहीं होता।

अभ्यास 3.3 — सम्पूर्ण हल

प्रश्न 1: सिद्ध करें कि निम्नलिखित परिमेय संख्याएं बराबर हैं:
(i) 2/3 और 4/6: 2 × 6 = 12 = 3 × 4 = 12 ✓
(ii) 5/4 और 10/8: 5 × 8 = 40 = 4 × 10 = 40 ✓

प्रश्न 2: योगफल ज्ञात करें:
(i) 2/5 + 3/10 = 4/10 + 3/10 = 7/10
(ii) 7/12 + 5/8 = 14/24 + 15/24 = 29/24

प्रश्न 3: अंतर ज्ञात करें:
(i) 5/6 − 1/4 = 10/12 − 3/12 = 7/12
(iii) −7/9 − (−2/3) = −7/9 + 6/9 = −1/9

3.5 अपरिमेय संख्याएं (Irrational Numbers)

अपरिमेय संख्याओं का दशमलव न समाप्त होता है, न दोहराता है:
√2 = 1.41421356...
π = 3.14159265...

√2 अपरिमेय है — प्रमाण

चरण 1 — मान्यता: माना √2 परिमेय है। तो √2 = p/q जहाँ p और q सह-अभाज्य पूर्णांक हैं।
चरण 2 — वर्ग करें: √2 = p/q → 2 = p²/q²
चरण 3 — निष्कर्ष: p और q दोनों सम हैं, जो हमारी सह-अभाज्य की मान्यता का खंडन करता है। अतः √2 अपरिमेय है।

अभ्यास 3.5 — सम्पूर्ण हल

प्रश्न 1: पहचानें — 7/20, 4/15, 13/250
7/20: 20 = 2² × 5 → सान्त
4/15: 15 = 3 × 5 → आवर्ती
13/250: 250 = 2 × 5³ → सान्त

प्रश्न 3: वर्गीकरण करें:
(i) √81 = 9 → परिमेय
(ii) √12 = 2√3 → अपरिमेय
(iii) 0.333... → परिमेय
(v) 1.01001000... → अपरिमेय

अध्याय सारांश

  • प्राकृत संख्याएं (ℕ): गिनती के लिए {1, 2, 3...}
  • शून्य (Śhūnya): ब्रह्मगुप्त द्वारा परिभाषित एक गणितीय संख्या।
  • पूर्णांक (ℤ): धनात्मक, ऋणात्मक और शून्य का समूह।
  • परिमेय (ℚ): p/q रूप, सघन (Dense) गुण।
  • अपरिमेय (I): √2, π जैसी संख्याएं जो भिन्न नहीं हैं।
  • वास्तविक (ℝ): परिमेय और अपरिमेय का संपूर्ण मेल।
Shakti Rao Mani Shakti Rao Mani शिक्षा नीति, सरकारी योजनाओं और उत्तराखण्ड के विद्यालयी शिक्षा तंत्र पर विशेष रूप से लिखते हैं। Aapbiti के Education Unit से जुड़े हैं और अभिभावकों व छात्रों तक सटीक एवं उपयोगी जानकारी पहुँचाना उनकी प्राथमिकता है।