कक्षा 7 विज्ञान अध्याय 9 नोट्स: जंतुओं में जैव प्रक्रम (पाचन व श्वसन)

कक्षा 7 विज्ञान (जिज्ञासा) अध्याय 9 "जंतुओं में जैव प्रक्रम" के हस्तलिखित नोट्स। इसमें मानव पाचन तंत्र, लार की क्रिया, आमाशय, क्षुद्रांत्र, रोमंथन, पक्षियों का पाचन, मनुष्यों और मछली-उभयचरों में श्वसन, गैस विनिमय और प्रयोग सरल भाषा में दिए गए हैं।

Oct 20, 2026 - 11:38
Updated: 13 hours ago
0 4
कक्षा 7 विज्ञान अध्याय 9 नोट्स: जंतुओं में जैव प्रक्रम (पाचन व श्वसन)
कक्षा 7 विज्ञान अध्याय 9 "जंतुओं में जैव प्रक्रम" के हस्तलिखित नोट्स का फीचर्ड इमेज, जिसमें पोषण (पाचन तंत्र) और श्वसन (फेफड़े) के सरल चित्र बने हैं।
9
जंतुओं में जैव प्रक्रम
कक्षा 7 • विज्ञान (जिज्ञासा) • हस्तलिखित नोट्स ✍️
? जैव प्रक्रम — परिचय
? जैव प्रक्रम
सजीवों की उत्तरजीविता (जीवित रहने) के लिए आवश्यक प्रकार्य जैसे — पोषण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन को सामूहिक रूप से जैव प्रक्रम कहते हैं।
✦
इस अध्याय में हम पोषण और श्वसन के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।
✦
जंतु अलग-अलग भोजन ग्रहण करते हैं — मधुमक्खी/शकरखोरा: पुष्पों का मकरंद; शिशु: माँ का दूध; अजगर: शिकार को निगलता है; कुछ जलीय जंतु: जल में तैरते भोजन के छोटे कण छानकर खाते हैं।
✦
सभी जंतु भोजन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं जिससे वे जैव प्रक्रम कर पाते हैं।
✦
भोजन में जटिल घटक (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा) होते हैं — इन्हें उपयोग से पहले सरल रूपों में तोड़ना आवश्यक है।
? आहार नाल
एक लंबी नलिका जिसमें जटिल भोजन-घटकों का सरल रूपों में विघटन होता है। यह मुख से आरंभ होकर गुदा में समाप्त होती है। विभिन्न भागों से स्रावित पाचक रस भोजन को सरल रूपों में तोड़ते हैं, फिर सरल रूप अवशोषित होकर शरीर के सभी भागों तक पहुँचाया जाता है।
मुख
➜
ग्रासनली
➜
आमाशय
➜
क्षुद्रांत्र
➜
बृहदांत्र
➜
मलाशय
➜
गुदा
? याद रखो
यकृत और अग्न्याशय आहार नाल के भाग नहीं हैं, पर संबद्ध (सहायक) संरचनाएँ हैं — ये पाचक रस स्रावित करती हैं।
चित्र 9.1 — मानव पाचन तंत्र
✏️ चित्र 9.1 — मानव पाचन तंत्र
?️ 9.1 जंतुओं में पोषण
? पोषण
जंतुओं द्वारा भोजन ग्रहण करना और उसके जटिल घटकों को सरल रूपों में विघटित कर शरीर द्वारा उपयोग में लाना।
? पाचन
शरीर में जटिल भोजन-घटकों को सरल रूप में विघटित करने का प्रक्रम पाचन कहलाता है।
9.1.1 मानव में पाचन
(क) मुख गुहा
? यांत्रिक पाचन
भोजन को दाँतों द्वारा संदलन (क्रशिंग) और चर्वण (चबाना) से आरंभिक रूप में छोटे-छोटे टुकड़ों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया।
? लार (लाला रस)
मुख में स्रावित रस जिसमें पाचक रस होता है। यह मंड (स्टार्च) को शर्करा में विघटित करता है और भोजन को आर्द्र/मृदु (नरम) करके निगलना आसान बनाता है। प्रिय भोजन के बारे में सोचने पर अधिक लार स्रावित होती है — इसीलिए मुँह में पानी आता है।
? जीभ चबाए गए भोजन को लार के साथ मिलाती है और भोजन को आगे धकेलती है।
✍️ क्रियाकलाप 9.1 — मंड पर लार की क्रिया
?
दो परखनलियाँ ‘क’ और ‘ख’ लो।
?
‘क’ में एक छोटा चम्मच उबले चावल; ‘ख’ में उतने ही उबले चावल 30–60 सेकंड चबाने के बाद डालो।
?
दोनों में 3–4 mL जल डालो, फिर बिंदुपाती से आयोडीन विलयन की 3–4 बूँदें डालकर मिलाओ और अवलोकन करो।
परखनली आयोडीन से पूर्व रंग आयोडीन के पश्चात रंग परिवर्तन का कारण
(क) उबले हुए चावल सफेद/हल्का नीला-काला चावल में मंड उपस्थित; आयोडीन + मंड = नीला-काला
(ख) चबाए हुए चावल सफेद/हल्का रंग नहीं बदला या बहुत हल्का नीला-काला लार ने मंड को शर्करा में तोड़ दिया — मंड अनुपस्थित/बहुत कम
? इंगित करना (संकेत देना)
नीला-काला रंग दिखना = मंड की उपस्थिति; रंग न बदलना = मंड की अनुपस्थिति; हल्का परिवर्तन = मंड की बहुत कम मात्रा।
? निष्कर्ष
मंडयुक्त भोजन (रोटी) को अधिक देर चबाने पर मीठा लगता है, क्योंकि लार का पाचक रस मंड को शर्करा में बदल देता है। भोजन आंशिक रूप से मुख में ही पच जाता है।
?‍? विज्ञान एवं समाज — मुख स्वास्थ्य
दिन में दो बार मंजन करें, जीभ साफ करें और हर भोजन के बाद कुल्ला करें — इससे दंतक्षय और मुख की दुर्गंध से बचाव होता है।
(ख) भोजन नली (ग्रासनली) — मुख से आमाशय तक
? ग्रासनली
लंबी एवं लचीली नलिका जो मुख को आमाशय से जोड़ती है। इसकी भित्तियाँ धीरे-धीरे लहरदार गति से संकुचित (सिकुड़ना) और शिथिल (ढीली) होती हैं जिससे भोजन आमाशय में धकेला जाता है।
? यह गति संपूर्ण आहार नाल में होती है और भोजन को आगे की ओर धकेलती जाती है।
चित्र 9.2 — ग्रासनली में भोजन की गति
✏️ चित्र 9.2 — ग्रासनली में भोजन की गति
(ग) आमाशय
✦
आमाशय की भित्तियाँ भोजन के मंथन के लिए संकुचित-शिथिल होती हैं।
✦
मथा भोजन आमाशय के आंतरिक आस्तर से स्रावित स्राव में मिलता है — इस स्राव में अम्ल, पाचक रस और श्लेष्मा होते हैं।
✦
पाचक रस → भोजन में उपस्थित प्रोटीन को सरल घटकों में तोड़ता है।
✦
अम्ल → प्रोटीन के विघटन में सहायक + हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
✦
श्लेष्मा → आमाशय के आस्तर की अम्ल से सुरक्षा करता है और क्षति रोकता है।
✦
भोजन आंशिक रूप से पचकर अर्धतरल पदार्थ बन जाता है।
चित्र 9.3 — आमाशय
✏️ चित्र 9.3 — आमाशय
? रोचक तथ्य — आमाशय की खोज कैसे हुई?
सन् 1822 में ऐलेक्सिस सेंट मार्टिन को दुर्घटनावश पेट में गोली लगी। चिकित्सक विलियम ब्यूमोंट ने उपचार किया। घाव पूरी तरह ठीक नहीं हुआ और स्थायी छिद्र रह गया, जिससे ब्यूमोंट ने आमाशय की पाचन-क्रिया प्रत्यक्ष देखी, विविध खाद्य पदार्थों पर प्रयोग किए और पाचन पर संवेगों के प्रभाव का भी अध्ययन किया।
(घ) क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
✦
आहार नाल का सबसे लंबा भाग — लगभग 6 मीटर (नाम ‘छोटी’ आँत है, क्योंकि यह पतली है)।
✦
तीन स्रोतों से पाचक स्राव मिलता है: (1) क्षुद्रांत्र का स्वयं का आंतरिक आस्तर, (2) यकृत, (3) अग्न्याशय।
✦
यकृत → पित्तरस: थोड़ा क्षारीय; आमाशय से आए अम्ल को उदासीन करता है और वसा को छोटी गोलिकाओं में तोड़ता है (पाचन सरल हो जाता है)।
✦
अग्न्याशय → अग्न्याशयी रस: क्षारीय; अम्ल को उदासीन करता है तथा कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा को विघटित करता है।
✦
क्षुद्रांत्र की भित्ति का रस: वसा तथा आंशिक पचे कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन को और अधिक सरल रूपों में तोड़ता है।
चित्र 9.4 — फैलाकर दर्शाई गई आहार नाल
✏️ चित्र 9.4 — फैलाकर दर्शाई गई आहार नाल
? पोषकों का अवशोषण
पचे हुए पोषकों का क्षुद्रांत्र की भित्तियों की रक्त-वाहिनियों में उपस्थित रक्त में प्रविष्ट होना अवशोषण कहलाता है।
? रसांकुर / प्रवर्ध (प्रोजेक्शन)
क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर पाई जाने वाली अँगुली जैसी हजारों संरचनाएँ। ये पोषकों के अवशोषण हेतु सतही क्षेत्रफल बढ़ाते हैं और पचे पोषकों को रक्त में भेजते हैं।
? रक्त इन पोषकों को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाता है — पोषक ऊर्जा देते, वृद्धि और मरम्मत में सहायक होते हैं।
चित्र 9.5 — क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर
✏️ चित्र 9.5 — क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर
?‍? विज्ञान एवं समाज — सीलिएक रोग
इसमें शरीर गेहूँ, जौ, राई में पाए जाने वाले प्रोटीन ग्लूटेन के प्रति प्रतिक्रिया करता है, जिससे क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर क्षतिग्रस्त होता है और पोषक अवशोषण बाधित होता है। उपाय: ग्लूटेन-युक्त भोजन से बचना; ज्वार, बाजरा, रागी जैसे कदन्न (प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन रहित) उत्तम विकल्प हैं।
(ङ) बृहदांत्र (बड़ी आँत)
✦
लंबाई लगभग 1.5 मीटर (क्षुद्रांत्र से कम) — फिर भी ‘बड़ी’ क्योंकि यह क्षुद्रांत्र से अधिक चौड़ी होती है।
✦
बिना पचे भोजन में से जल और कुछ लवण अवशोषित करती है, जिससे अपशिष्ट अर्ध ठोस हो जाता है।
✦
इस अर्ध ठोस अपशिष्ट को मल कहते हैं।
? मलाशय
बृहदांत्र का निचला भाग जहाँ मल-त्याग होने तक मल एकत्रित रहता है।
? बहिःक्षेपण (मल-त्याग)
मल का गुदा द्वारा शरीर से बाहर निकाला जाना। (रेशे — फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज — खाने से मल-त्याग सरल होता है।)
? रोचक तथ्य — बृहदांत्र के सूक्ष्मजीव
बृहदांत्र में उपस्थित लाभदायक जीवाणु बिना पचे भोजन (विशेषतः रेशों) को विघटित करते हैं और आवश्यक पोषक बनाते हैं। किण्वित भोजन — दही, छाछ, श्रीखंड, कांजी, अचार, गुंद्रुक, पोइता भात — पाचन तंत्र के लिए उत्तम हैं।
?‍? विज्ञान एवं समाज — पाचन स्वास्थ्य
प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में सरलता से पचने वाले भोजन और अदरक, काली मिर्च, जीरा जैसे मसालों के उचित उपयोग पर बल है। उचित समय पर भोजन, उचित आहार और भूख से अधिक न खाना पाचन स्वास्थ्य के मुख्य कारक हैं।
? 9.1.2 क्या सभी जंतुओं में पाचन मनुष्यों जैसा होता है?
रोमंथी जंतु (गाय, भैंस, बकरी)
? रोमंथन
घास खाने वाले जंतु पहले घास को आंशिक चबाकर निगलते हैं → आमाशय में आंशिक पाचन → आंशिक पचा भोजन वापस मुँह में लाकर धीरे-धीरे चबाया जाता है → फिर आहार नाल में जाता है। इस प्रक्रिया को रोमंथन कहते हैं और ऐसे जंतु रोमंथी कहलाते हैं।
? गाय दिन में लगभग 8 घंटे भोजन चबाने में लगाती है।
चित्र 9.6 — रोमंथी का पाचन तंत्र
✏️ चित्र 9.6 — रोमंथी का पाचन तंत्र
पक्षी
? पेषणी (गिजार्ड)
पक्षियों के दाँत नहीं होते। उनके आमाशय में एक माँसपेशीय प्रकोष्ठ होता है जिसे पेषणी कहते हैं। इसकी भित्तियों के संकुचन-शिथिलन से, निगले गए छोटे कंकड़ व बजरी की सहायता से भोजन विघटित होता है।
चित्र 9.7 — पक्षियों का पाचन तंत्र
✏️ चित्र 9.7 — पक्षियों का पाचन तंत्र
➡️ जंतुओं ने अपने भोजन के अनुसार आहार नाल की संरचना और कार्य में अनुकूलन विकसित किए हैं।
? 9.2 जंतुओं में श्वसन
? श्वसन
वह प्रक्रिया जिसके द्वारा पोषक (जैसे ग्लूकोस) प्रयोज्य ऊर्जा में परिवर्तित होते हैं। यह कोशिकाओं/शरीर के अंदर होने वाली रासायनिक प्रक्रिया है।
? शब्द समीकरण
ग्लूकोस + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा
9.2.1 मनुष्यों में श्वसन
? श्वास लेना
वायु को शरीर के अंदर लेना (अंतःश्वसन) और बाहर निकालना (उच्छ्वसन) — यह एक शारीरिक प्रक्रिया है।
? अंतःश्वसन
वायु को शरीर के अंदर लेना।
? उच्छ्वसन
वायु को शरीर के बाहर निकालना।
? भोजन के बिना एक सप्ताह और पानी के बिना 1–2 दिन जीवित रहना कठिन है, पर श्वास के बिना कुछ मिनट से अधिक नहीं — मनुष्य ही नहीं, पादप व अन्य जंतु भी श्वास लेते हैं।
? श्वसन तंत्र
श्वास लेने और श्वसन की प्रक्रिया में सहायक अंगों का तंत्र, जिसमें वायु जिस पथ से शरीर में जाती और बाहर आती है उसके सभी भाग सम्मिलित हैं।
भाग कार्य / विशेषता
नासाद्वार (नासारंध्र) जिनसे वायु अंतःश्वसित/उच्छ्वसित होती है; श्वसन तंत्र का आरंभ
नासा पथ छोटा युगल पथ; सूक्ष्म रोम + श्लेष्मा वायु की धूल और गंदगी को फँसा (पाशित कर) लेते हैं — इसलिए श्वास नाक से लें, मुख से नहीं
श्वासनली नासा पथ से वायु श्वासनली से होकर फेफड़ों में जाती है; यह दो शाखाओं में बँटकर दोनों फेफड़ों में जाती है
फेफड़े शाखाएँ और महीन शाखाओं में बँटती हैं जिनका अंत कूपिकाओं में होता है
कूपिकाएँ छोटे गुब्बारे जैसे कोश; गैसों का विनिमय यहीं होता है
पसली पिंजर फेफड़ों की सुरक्षा
डायाफ्राम फेफड़ों के नीचे गुंबदाकार पेशी; श्वास लेने में सहायक
चित्र 9.8 — मानव श्वसन तंत्र
✏️ चित्र 9.8 — मानव श्वसन तंत्र
?‍? विज्ञान एवं समाज — संक्रामक कण
अंतःश्वसित वायु की बहुत-सी धूल बाहर रह जाती है, पर छोटे संक्रामक कण फेफड़ों तक पहुँच जाते हैं। उदाहरण: कोविड-19 में SARS-CoV-2 विषाणु ने श्वसन तंत्र को प्रभावित किया और श्वास लेने में कठिनाई हुई।
✍️ क्रियाकलाप 9.2 — श्वास लेने का प्रतिरूप (मॉडल)
?
चौड़ी पारदर्शी ढक्कनदार बोतल का पेंदा हटाओ; ढक्कन में छेद करो।
?
Y आकार की नली के दोनों सिरों पर बिना फुलाए गुब्बारे बाँधो (वायुरोधी); सीधा सिरा ढक्कन से निकालो और चिकनी मिट्टी से वायुरोधी बनाओ।
?
खुले पेंदे पर रबर की पतली शीट तानकर रबर बैंड से कस दो।
?
रबर शीट नीचे खींचो → गुब्बारे फूलते हैं (अंतःश्वसन)। ऊपर छोड़ो → गुब्बारे पिचकते हैं (उच्छ्वसन)।
?
गुब्बारे = फेफड़े; रबर शीट = डायाफ्राम।
चित्र 9.9 — श्वास लेने का प्रतिरूप
✏️ चित्र 9.9 — श्वास लेने का प्रतिरूप
श्वास लेने की क्रियाविधि
अंतःश्वसन उच्छ्वसन
पसलियाँ ऊपर तथा बाहर की ओर नीचे अर्थात अंदर की ओर (मूल स्थिति)
डायाफ्राम नीचे की ओर वापस ऊपर (मूल स्थिति)
वक्ष-गुहा विस्तार बढ़ता है विस्तार कम होता है
वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है फेफड़ों से बाहर धकेली जाती है
चित्र 9.10 — श्वसन की क्रियाविधि
✏️ चित्र 9.10 — श्वसन की क्रियाविधि
?‍? विज्ञान एवं समाज — श्वसन अभ्यास
प्राणायाम श्वसन तंत्र के स्वास्थ्य, चित्त-शांति और एकाग्रता के लिए; लद्दाख में तुम्मो श्वास ठंडे मौसम में शरीर में ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए; समावृत्ति प्राणायाम (बॉक्स ब्रीदिंग) — श्वास अंदर लेना, रोकना, छोड़ना, रोकना (लयबद्ध नियंत्रण)।
✍️ क्रियाकलाप 9.3 — हम श्वास द्वारा क्या छोड़ते हैं?
?
दो परखनलियों ‘क’ और ‘ख’ में ताजा चूने का पानी (समान मात्रा) लो।
?
‘क’ में पिचकारी/सिरिंज से सामान्य वायु (अंतःश्वसित) प्रवाहित करो।
?
‘ख’ में स्ट्रॉ से मुँह से बार-बार श्वास फूँको (उच्छ्वसित वायु)।
?
अवलोकन: ‘ख’ का चूने का पानी दूधिया हो गया, ‘क’ का नहीं।
?
निष्कर्ष: चूने का पानी CO₂ से प्रतिक्रिया कर दूधिया होता है; अतः उच्छ्वसित वायु में अंतःश्वसित वायु से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है।
चित्र 9.11 — चूने के पानी से जाँच
✏️ चित्र 9.11 — चूने के पानी से जाँच
गैसों का विनिमय कैसे होता है?
✦
वायु फेफड़ों में जाकर विशिष्ट पथ से कूपिकाओं को भर देती है।
✦
कूपिकाओं की भित्तियाँ पतली होती हैं और रक्त से पूरित महीन नलिकाओं (रुधिर वाहिकाओं) से घिरी होती हैं।
✦
रक्त शरीर से CO₂ को कूपिकाओं तक लाता है → वहाँ से CO₂ वायु में निर्मुक्त होती है।
✦
उसी समय कूपिकाओं से ऑक्सीजन रक्त में जाती है → रक्त इसे शरीर के सभी भागों में पहुँचाता है।
चित्र 9.12 — कूपिकाओं से गैस विनिमय
✏️ चित्र 9.12 — कूपिकाओं से गैस विनिमय
? गैस विनिमय
कूपिकाओं में रक्त और वायु के बीच ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान।
गैस अंतःश्वसित वायु उच्छ्वसित वायु
ऑक्सीजन लगभग 21% लगभग 16–17%
कार्बन डाइऑक्साइड लगभग 0.04% लगभग 4–5%
? अंतःश्वसित पूरी ऑक्सीजन का उपयोग नहीं होता। कुछ जंतु अधिक भाग का उपयोग कर सकते हैं।
चित्र 9.13 — वायु में गैसों का प्रतिशत
✏️ चित्र 9.13 — वायु में गैसों का प्रतिशत
श्वास लेना श्वसन
शारीरिक प्रक्रिया रासायनिक प्रक्रिया
वायु अंदर लेना और बाहर निकालना (अंतःश्वसन–उच्छ्वसन) ग्लूकोस का ऑक्सीजन की सहायता से विघटन होकर ऊर्जा निर्मुक्त होना
फेफड़ों/वक्ष (पसलियाँ, डायाफ्राम) द्वारा शरीर के अंदर (कोशिकाओं में) होती है
O₂ अंदर, CO₂ बाहर निकलती है O₂ का उपयोग भोजन के विघटन व ऊर्जा निर्मुक्त करने में होता है
➡️ यह ऊर्जा हमें चलने, दौड़ने, खेलने और सोचने में सहायता करती है। दोनों प्रक्रियाएँ जीवित रहने के लिए अनिवार्य हैं।
? परिसंचरण तंत्र
पोषकों, ऑक्सीजन और अन्य पदार्थों के परिवहन का विशिष्ट तंत्र, जिसमें हृदय, रुधिर और रुधिर-वाहिकाएँ सम्मिलित हैं। हृदय रुधिर-वाहिकाओं के माध्यम से रुधिर को पंप करता है; अपशिष्ट पदार्थ शरीर से बाहर निकाले जाते हैं।
?‍? विज्ञान एवं समाज — धूम्रपान
धूम्रपान फेफड़ों को हानि पहुँचाता है, कैंसर सहित श्वसन रोगों का जोखिम बढ़ाता है, लगातार खाँसी और बार-बार संक्रमण करता है। निष्क्रिय धूम्रपान (दूसरों के धुएँ में श्वास लेना) बच्चों, वृद्धजनों और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष हानिकारक है।
9.2.2 क्या अन्य जंतु भी मानवों की भाँति श्वास लेते हैं?
जंतु श्वसन अंग
पक्षी, हाथी, शेर, गाय, बकरी, छिपकली, साँप फेफड़े (संरचना सभी में भिन्न)
मछली व अधिकांश जलीय जंतु क्लोम (गलफड़े) — रक्त-वाहिकाओं की प्रचुर आपूर्ति; रक्त और पानी में घुली गैसों के बीच O₂ व CO₂ का विनिमय
उभयचर (मेंढक) — टैडपोल जल में क्लोम से
वयस्क मेंढक थल पर फेफड़े; जल में त्वचा से
केंचुआ अपनी नम त्वचा से
चित्र 9.14 — मछली के श्वास लेने में सहायक भाग
✏️ चित्र 9.14 — मछली के श्वास लेने में सहायक भाग
? क्लोम (गलफड़े)
जलीय जंतुओं (जैसे मछली) में पाई जाने वाली विशेषीकृत संरचनाएँ जिनसे जल में घुली ऑक्सीजन ली जाती है और CO₂ का विनिमय होता है।
? उभयचर
जो थल और जल दोनों में रह सकते हैं, जैसे मेंढक। ये अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में श्वास के लिए अलग-अलग अंग उपयोग करते हैं।
➡️ अलग-अलग पर्यावासों के अनुकूल जंतुओं के श्वास लेने के तरीके भिन्न-भिन्न होते हैं (अनुकूलन)।
⭐ संक्षेप में (Quick Revision)
⭐
पोषण, परिसंचरण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन — जैव प्रक्रम, सजीवों की उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य।
⭐
मानव आहार नाल: मुख → ग्रासनली → आमाशय → क्षुद्रांत्र → बृहदांत्र → गुदा + संबद्ध भाग यकृत व अग्न्याशय।
⭐
पचे भोजन का प्राथमिक अवशोषण क्षुद्रांत्र की भित्तियों द्वारा; पोषक रक्त द्वारा शरीर के सभी भागों में पहुँचते हैं।
⭐
बृहदांत्र बिना पचे भोजन से जल और लवण अवशोषित करती है।
⭐
गाय, बकरी जैसे जंतु रोमंथी कहलाते हैं (रोमंथन करते हैं)।
⭐
श्वास लेना: अंतःश्वसन + उच्छ्वसन; O₂ और CO₂ का विनिमय फेफड़ों की कूपिकाओं में।
⭐
श्वसन में ग्लूकोस का O₂ द्वारा विघटन → CO₂ + जल + ऊर्जा।
⭐
परिसंचरण तंत्र (हृदय) पोषकों और O₂ को सभी भागों तक ले जाता है।
⭐
श्वास लेना = शारीरिक प्रक्रिया; श्वसन = रासायनिक प्रक्रिया।
⭐
जंतुओं के पर्यावास के अनुरूप श्वसन के अलग-अलग अंग/प्रणालियाँ होती हैं।
? अभ्यास — हल सहित
प्रश्न 1. (आइए और अधिक सीखें) रिक्त बक्सों को भरकर आहार नाल द्वारा भोजन की यात्रा पूरी कीजिए।
उत्तर:
भोजन
➜
मुख
➜
ग्रासनली
➜
आमाशय
➜
क्षुद्रांत्र
➜
बृहदांत्र (निचला भाग मलाशय)
➜
गुदा
प्रश्न 2. साहिल ने परखनली ‘क’ में रोटी के कुछ टुकड़े डाले। नेहा ने ‘ख’ में रोटी के टुकड़ों को चबाकर डाला और संतुष्टि ने ‘ग’ में उबले हुए आलू मसलकर डाले। तीनों में आयोडीन विलयन डालने पर क्या अवलोकन होंगे? कारण बताइए।
उत्तर:
परखनली अवलोकन कारण
क (रोटी के टुकड़े) नीला-काला रंग रोटी में मंड है और बिना चबाए लार की क्रिया नहीं हुई, अतः मंड बचा रहा
ख (चबाई हुई रोटी) रंग नहीं बदलेगा या बहुत हल्का नीला-काला लार के पाचक रस ने मंड को शर्करा में तोड़ दिया
ग (मसले आलू) नीला-काला रंग आलू में मंड है और इसमें लार नहीं मिली, अतः मंड उपस्थित
प्रश्न 3. श्वास लेने में डायाफ्राम की क्या भूमिका है?
उत्तर: (iii) अंतःश्वसन और उच्छ्वसन में सहायता करना।
अंतःश्वसन में डायाफ्राम नीचे जाता है (वक्ष-गुहा बढ़ती है, वायु अंदर आती है) और उच्छ्वसन में ऊपर आता है (गुहा घटती है, वायु बाहर जाती है)।
प्रश्न 4. मिलान कीजिए।
उत्तर:
भाग का नाम प्रकार्य
(i) नासाद्वार (क) बाहर से हवा प्रवेश करती है।
(ii) नासा पथ (घ) सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा हमारे द्वारा ग्रहण की गई वायु में से धूल और गंदगी को रोकने में सहायक हैं।
(iii) श्वासनली (ङ) इस भाग से होकर वायु हमारे फेफड़ों तक पहुँचती है।
(iv) कूपिकाएँ (ख) गैसों का विनिमय होता है।
(v) पसली पिंजर (ग) फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
प्रश्न 5. अनिल ने सान्वी से कहा कि श्वसन और श्वास लेना एक ही प्रक्रिया है। अनिल को समझाने के लिए सान्वी उससे क्या प्रश्न पूछ सकती है?
उत्तर:
?
श्वास लेने में केवल वायु अंदर-बाहर होती है, तो फिर ऊर्जा कहाँ से निर्मुक्त होती है? (श्वसन में)
?
क्या श्वास लेना शरीर के बाहर दिखता है जबकि ग्लूकोस का ऑक्सीजन से विघटन शरीर के अंदर रासायनिक रूप से होता है?
?
श्वास लेने में ग्लूकोस का उपयोग होता है या नहीं? (नहीं — श्वसन में होता है)
?
निष्कर्ष: श्वास लेना = शारीरिक प्रक्रिया (वायु का आदान-प्रदान); श्वसन = रासायनिक प्रक्रिया (भोजन का विघटन + ऊर्जा) — दोनों भिन्न हैं।
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है और क्यों? अनु — हम वायु को अंतःश्वसित करते हैं। शानू — हम ऑक्सीजन को अंतःश्वसित करते हैं। तनु — हम ऑक्सीजन से समृद्ध वायु को अंतःश्वसित करते हैं।
उत्तर: अनु का कथन सत्य है। हम वातावरण की वायु (जिसमें लगभग 21% ऑक्सीजन तथा अन्य गैसें हैं) अंदर लेते हैं। शानू का कथन गलत है क्योंकि केवल ऑक्सीजन नहीं, वायु अंदर ली जाती है। तनु का कथन भी गलत है क्योंकि हम सामान्य वायु लेते हैं, ऑक्सीजन-समृद्ध वायु नहीं।
प्रश्न 7. जब हम श्वास के साथ धूल भरी वायु को अंदर लेते हैं तो प्रायः हम छींकते हैं। इसके संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
उत्तर:
?
धूल के कण नासा पथ के सूक्ष्म रोमों और श्लेष्मा में फँसकर उन्हें उत्तेजित करते हैं।
?
शरीर इन कणों को बलपूर्वक बाहर निकालना चाहता है ताकि वे फेफड़ों तक न पहुँचें।
?
धूल/संक्रामक कण या एलर्जी के कारण नाक के आस्तर में जलन होती है — छींक उसकी सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया है।
प्रश्न 8. परिधि और अनुषा ने दौड़ना आरंभ किया। अनुषा परिधि की अपेक्षा अधिक तेजी से श्वास ले रही थी। इसके कम से कम दो संभावित कारण बताइए।
उत्तर:
?
अनुषा ने अधिक तेज/अधिक दूर दौड़ा होगा — उसकी मांसपेशियों को अधिक ऊर्जा चाहिए, इसलिए अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता है।
?
अधिक श्वसन से उत्पन्न अधिक CO₂ को बाहर निकालने के लिए तेज श्वास लेनी पड़ती है।
?
अनुषा का व्यायाम का अभ्यास/शारीरिक सहनशक्ति कम हो सकती है (परिधि अधिक अभ्यस्त)।
प्रश्न 9. यदु ने एक प्रयोग किया: दो परखनलियाँ ‘क’ और ‘ख’ में आधा पानी और एक चुटकी चावल का आटा मिलाया। परखनली ‘ख’ में कुछ बूँदें लार की मिलाईं। 35–40 मिनट रखकर आयोडीन डाला (चित्र 9.15)। आपके विचार से वह क्या परीक्षण करना चाहता है?
उत्तर:
चित्र 9.15 — प्रयोग के परिणाम
✏️ चित्र 9.15 — प्रयोग के परिणाम
यदु यह परीक्षण करना चाहता है कि क्या लार चावल के आटे के मंड को पचाती है/शर्करा में बदलती है?
परखनली ‘क’ (बिना लार) नीला-काला = मंड उपस्थित; परखनली ‘ख’ (लार के साथ) नीला-काला नहीं हुई = मंड अनुपस्थित, अर्थात लार ने मंड को विघटित कर दिया।
प्रश्न 10. रक्षिता ने दो परखनलियाँ चूने के पानी से भरीं। ‘क’ में अंतःश्वसित वायु नली द्वारा चूषित करके प्रवाहित की, ‘ख’ में उच्छ्वसित वायु फूँककर प्रवाहित की (चित्र 9.16)। वह क्या जाँचना चाहती है? निष्कर्षों की पुष्टि कैसे करे?
उत्तर:
चित्र 9.16 — प्रायोगात्मक व्यवस्थापन
✏️ चित्र 9.16 — प्रायोगात्मक व्यवस्थापन
वह जाँचना चाहती है कि अंतःश्वसित और उच्छ्वसित वायु में किसमें CO₂ अधिक है।
अपेक्षित: ‘क’ का चूने का पानी लगभग साफ/हल्का दूधिया, ‘ख’ का अधिक दूधिया → उच्छ्वसित वायु में अधिक CO₂।
पुष्टि: दोनों नलियों में चूने के पानी की मात्रा व वायु प्रवाह का समय/बार समान रखकर प्रयोग कई बार दोहराए, नए ताजे चूने के पानी से प्रयोग करे और परिणामों की तुलना करे।
? अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ (विचार)
✦
मुख की स्वच्छता बनाए रखने की उत्तम विधियों पर रिपोर्ट बनाओ।
✦
पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के उपाय और रेशेयुक्त/किण्वित खाद्य पदार्थों की सूची बनाओ।
✦
रंगीन चिकनी मिट्टी से पाचन तंत्र का 3D प्रतिरूप बनाकर कागज की पर्चियों से भाग नामांकित करो।
✦
वायु गुणवत्ता और AQI का विभिन्न व्यक्तियों के श्वसन तंत्र पर प्रभाव खोजो।
✦
बॉक्स ब्रीदिंग के लाभ पढ़ो; पक्षी ऊँचाई पर कम ऑक्सीजन में कैसे जीवित रहते हैं — उनका श्वसन तंत्र किस प्रकार अनुकूलित है, खोजो।
? कक्षा 7 विज्ञान — अन्य अध्याय के नोट्स
? कक्षा 7 विज्ञान — सभी अध्याय? भानु क्लासेस भोगपुर — फ्री नोट्स, क्विज़ व एक्टिविटी? NCERT पाठ्यपुस्तकें (आधिकारिक)
✨ All the Best — Happy Studying! ✨

Comments (0)

User