कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 3 नोट्स — स्वास्थ्य एक अमूल्य निधि (हिंदी में)

कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 3 "स्वास्थ्य — एक अमूल्य निधि" के पूर्ण हिंदी नोट्स — इस पोस्ट में स्वास्थ्य की परिभाषा (WHO), स्वस्थ जीवनशैली के स्तंभ, लक्षण व संकेत में अंतर, संचरणीय व असंचरणीय रोगों की सूची व तालिका, रोग-संचरण के तरीके, प्रतिरक्षा प्रणाली, टीकाकरण (एडवर्ड जेनर व चेचक), प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक्स) व प्रतिजैविक प्रतिरोध, तथा अध्याय के सभी 11 प्रश्न-उत्तर विस्तार से कवर किए गए हैं। NCERT जिज्ञासा पाठ्यपुस्तक पर आधारित ये नोट्स परीक्षा तैयारी के लिए बेहद उपयोगी हैं।

Jul 19, 2026 - 20:37
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यह चित्र कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 3 "स्वास्थ्य — एक अमूल्य निधि" के लिए बनाया गया एक नोटबुक-शैली इन्फोग्राफिक है। बीच में एक ढाल (शील्ड) है जो शरीर की सुरक्षा और प्रतिरक्षा को दर्शाती है, जिसके चारों ओर तीन रंगीन वृत्त हैं — शारीरिक (नीला), मानसिक (हरा) और सामाजिक (गुलाबी) — जो WHO की स्वास्थ्य परिभाषा के तीन आयामों को दर्शाते हैं। इसके बाहर छह गोल आइकन बनाए गए हैं जो स्वस्थ जीवनशैली की आदतों को दर्शाते हैं: हाथ धोना (?), टीकाकरण (?), संतुलित आहार (?), व्यायाम (?), पर्याप्त नींद (?), और मास्क व स्

जिज्ञासा • NCERT कक्षा 8

स्वास्थ्य — एक अमूल्य निधि

अध्याय 3 · संपूर्ण नोट्स, परिभाषाएँ, चित्र व अभ्यास हल

? शारीरिक ? मानसिक ? सामाजिक ? टीकाकरण

"स्वास्थ्य केवल रोग का न होना नहीं है — यह शरीर, मन और समाज के संतुलन का नाम है।"

यह नोट्स NCERT की जिज्ञासा पाठ्यपुस्तक पर आधारित हैं। इससे पहले के अध्याय भी पढ़ें — कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 1 के नोट्स और कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 2 के नोट्स


3.1 स्वास्थ्य — क्या रोग का न होना ही मात्र स्वास्थ्य है?

परिभाषा (WHO):

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार — "स्वास्थ्य पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की स्थिति है, न कि मात्र रोगों की अनुपस्थिति।"

एक स्वस्थ व्यक्ति — अपने शरीर की देखभाल करता है, सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण रखता है, और समाज में भली-भाँति सामंजस्य बना पाता है।

✎ स्वास्थ्य के तीन आयाम

शारीरिक मानसिक सामाजिक स्वास्थ्य

चित्र 3.1 — स्वास्थ्य के तीन परस्पर जुड़े आयाम

? हमारी वैज्ञानिक परंपरा: आयुर्वेद सिखाता है — शरीर, मन और परिवेश का संतुलन ही सच्चा स्वास्थ्य है। दिनचर्या और ऋतुचर्या का पालन, नियमित व्यायाम, स्वच्छता, अच्छी नींद व शांत मन इस संतुलन में सहायक हैं। योग, ध्यान व सचेतनता (mindfulness) भी इसमें मदद करते हैं — राष्ट्रीय आयुष मिशन इसी दिशा में कार्यरत है।

✎ क्रियाकलाप 3.1 — केस स्टडी (सोचें)

नए स्कूल में मित्रहीन विद्यार्थी मोबाइल/सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने लगा → एकाकीपन बढ़ा, सिरदर्द, वज़न कम, नींद की कमी हुई। निष्कर्ष: स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं — भावनाएँ व सामाजिक जुड़ाव भी उतने ही ज़रूरी हैं।


3.2 हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं?

✅ अच्छी आदतें

  • व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना
  • स्वस्थ व संतुलित आहार लेना
  • नियमित व्यायाम करना
  • प्रतिदिन विश्राम व ध्यान के लिए समय निकालना

❌ बुरी आदतें

  • मोबाइल/डिजिटल स्क्रीन पर अत्यधिक समय
  • प्रतिदिन फास्ट फूड / जंक फूड
  • रात्रि में देर से सोना, अपर्याप्त नींद
  • सुबह का नाश्ता (कलेवा) न करना

✎ 3.2.1 स्वस्थ जीवनशैली के 6 स्तंभ (चित्र 3.2)

  • ? संतुलित आहार लें
  • ? शारीरिक रूप से सक्रिय रहें
  • ? धूम्रपान/मद्यपान को 'ना' कहें
  • ? तनाव प्रबंधन करें
  • ? पर्याप्त नींद लें
  • ? स्क्रीन टाइम सीमित करें

इसके साथ प्रसंस्कृत, वसायुक्त व शर्करायुक्त भोजन से बचें और नियमित रूप से योग/प्राणायाम करें।

✎ 3.2.2 पर्यावरण को स्वच्छ रखें

?️ क्रियाकलाप 3.3: स्वच्छ, सुव्यवस्थित खेल का मैदान बनाम गंदा, प्रदूषित मैदान — गंदे क्षेत्र में रहने वाले लोग बार-बार बीमार पड़ सकते हैं। वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बताता है कि वायु कितनी स्वच्छ है।

ध्यान रखें — स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं। मित्रों/परिवार के साथ समय बिताना, बातचीत, हँसी-मज़ाक मन को भी स्वस्थ रखते हैं।


3.3 हम कैसे जानें कि हम अस्वस्थ हैं?

जब शरीर के भीतर कुछ सुचारु रूप से कार्य नहीं करता, तब हमें लक्षण या संकेत मिलते हैं जो चिकित्सक को समस्या समझने में मदद करते हैं।

लक्षण (Symptom):

वह जिसे हम स्वयं अनुभव करते हैं। उदा. — दर्द, थकान, चक्कर आना।

संकेत (Sign):

वह जो देखा या मापा जा सकता है। उदा. — ज्वर, दाने, उच्च रक्तचाप, शोथ (सूजन)।


3.4 रोगों के कारण और प्रकार क्या हैं?

रोग:

वह स्थिति जो शरीर या मन के सामान्य कार्यों को प्रभावित करती है — जब एक/अधिक अंग या अंग-प्रणालियाँ ठीक से कार्य करना बंद कर देती हैं।

? रोगजनक (रोगाणु): रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव — जीवाणु, विषाणु, कवक, कृमि/कीट या प्रोटोजोआ।

संचरणीय रोग

  • रोगाणुओं के कारण होते हैं
  • एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं
  • उदा. — टाइफॉइड, डेंगू, फ्लू, चेचक, कोविड-19

असंचरणीय रोग

  • रोगजनकों के कारण नहीं होते
  • एक से दूसरे में नहीं फैलते
  • उदा. — कैंसर, मधुमेह, अस्थमा (जीवनशैली/आहार/पर्यावरण से जुड़े)

? भारत में वर्तमान में अधिकांश मृत्यु असंचरणीय रोगों के कारण होती हैं (कारण — प्रसंस्कृत भोजन, कम व्यायाम, बढ़ती जीवन-प्रत्याशा)।

✎ 3.4.1 संक्रामक रोग कैसे फैलते हैं? (चित्र 3.4)

? संक्रमित व्यक्ति ? स्वस्थ व्यक्ति प्रत्यक्ष संपर्क (हाथ मिलाना) वायु द्वारा (खाँसना/छींकना) दूषित भोजन/जल द्वारा ? मच्छर/कीट (वेक्टर) द्वारा ?

चित्र 3.4 — रोग संचरण के सामान्य तरीके (प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष संपर्क, वायु, जल-भोजन, वेक्टर, संक्रमित पशु)

? परजीवी: ऐसे जीव (जैसे कृमि) जो किसी अन्य जीव के शरीर में/पर रहकर पोषक तत्व खाकर जीवित रहते हैं — मुख्यतः पाचन तंत्र में पाए जाते हैं।

✎ तालिका 3.1 — सामान्य संचरणीय रोग (पूरी सूची)

?️ वायु के माध्यम से फैलने वाले रोग

  • सर्दी-जुकाम व इन्फ्लूएंज़ा — कारक: विषाणु। संक्रमण स्थान: श्वसन तंत्र। लक्षण: नाक बंद/बहना, गले में खराश, ज्वर, खाँसी। निवारण: हाथ धोएँ, वस्तुएँ साझा न करें, मास्क पहनें।
  • छोटी माता (चिकनपॉक्स) — कारक: विषाणु। संक्रमण स्थान: श्वसन तंत्र, त्वचा। लक्षण: हल्का ज्वर, खुजली, चकत्ते, फफोले। निवारण: रोगी को अलग रखें, टीकाकरण करवाएँ।
  • खसरा (मीज़ल्स) — कारक: विषाणु। संक्रमण स्थान: त्वचा, श्वसन तंत्र। लक्षण: ज्वर, गले में खराश, लाल चकत्ते। निवारण: अलग रखें, स्वच्छता, टीकाकरण।
  • क्षय रोग (टीबी) — कारक: जीवाणु। संक्रमण स्थान: फेफड़े। लक्षण: खाँसी, ज्वर, थकान, रात में पसीना। निवारण: निकट संपर्क से बचें, टीकाकरण।

? दूषित जल व भोजन से फैलने वाले रोग

  • यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए — कारक: विषाणु। संक्रमण स्थान: यकृत। लक्षण: थकान, ज्वर, मतली, पीलिया। निवारण: उबला पानी पिएँ, टीकाकरण।
  • हैजा (कॉलरा) — कारक: जीवाणु। संक्रमण स्थान: आंत्र। लक्षण: अतिसार, निर्जलीकरण। निवारण: स्वच्छता, पका भोजन, उबला पानी।
  • आंत्र ज्वर (टाइफॉइड) — कारक: जीवाणु। संक्रमण स्थान: आंत्र। लक्षण: सिरदर्द, पेट में तकलीफ, ज्वर, अतिसार। निवारण: स्वच्छता, पका भोजन, उबला पानी।
  • एस्केरिसता (गोल कृमि) — कारक: कृमि। संक्रमण स्थान: आंत्र। लक्षण: मल में कृमि, भूख न लगना, वज़न कम होना। निवारण: स्वच्छता, पका भोजन, उबला पानी।

? कीटों द्वारा संचरित रोग

  • मलेरिया (विषम ज्वर) — कारक: प्रोटोज़ोआ। संक्रमण स्थान: त्वचा, रक्त। लक्षण: तीव्र ज्वर, पसीना, कंपकंपी। निवारण: मच्छरदानी, प्रतिकर्षी, पूरी बाँह के कपड़े।
  • डेंगू ज्वर (हड्डी तोड़ ज्वर) — कारक: विषाणु। संक्रमण स्थान: त्वचा, रक्त। लक्षण: ज्वर, सिरदर्द, जोड़ों में दर्द, मतली। निवारण: मच्छरदानी, रुद्ध जल से बचें।

? आधार: क्रियाकलाप 3.4 — सामुदायिक अभियान व पुस्तकालय अध्ययन से संकलित सूची

✎ रोकथाम के सरल उपाय

  • ? बार-बार साबुन-पानी से हाथ धोना
  • ? खाँसते/छींकते समय मुँह-नाक ढकना
  • ? व्यक्तिगत वस्तुएँ साझा न करना
  • ? अस्वस्थ होने पर घर पर आराम

✎ 3.4.2 असंचरणीय रोग किस कारण होते हैं?

दीर्घकालिक रोग:

कैंसर, मधुमेह, अस्थमा जैसे रोग प्राय: 3 महीने से अधिक बने रहते हैं — इन्हें दीर्घकालिक रोग कहते हैं। भारत मधुमेह के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में से एक है — कारण: हॉर्मोन असंतुलन, अस्वास्थ्यकर खानपान, शारीरिक निष्क्रियता, स्थूलता।

? अभावजन्य रोग: भोजन में किसी विशेष पोषक तत्व की कमी से होने वाले रोग (जैसे स्कर्वी, एनीमिया, घेंघा) भी असंचरणीय रोग की श्रेणी में आते हैं।

  • स्थूलता — संकेत व लक्षण: अधिक शारीरिक भार। सुझाए गए परिवर्तन: संतुलित आहार + नियमित व्यायाम।
  • मधुमेह — संकेत व लक्षण: बार-बार पेशाब, अत्यधिक प्यास, भार घटना, थकान, धीमी गति से घाव भरना। सुझाए गए परिवर्तन: चीनी/वसा कम करें, सक्रिय रहें, जाँच करवाएँ।
  • उच्च रक्तचाप — संकेत व लक्षण: सिरदर्द, थकान, कभी-कभी कोई लक्षण नहीं। सुझाए गए परिवर्तन: नमक कम करें, तनाव प्रबंधन, व्यायाम।

3.5 रोगों का निवारण और नियंत्रण कैसे करें?

"रोकथाम उपचार से बेहतर है।" — क्रियाकलाप 3.6: ओडिशा के भद्रक जिले में सामुदायिक स्वच्छता अभियान से खुले में शौच घटा → बच्चों में अतिसार व संक्रमण के मामले कम हुए।

प्रतिरक्षा (Immunity):

हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता — जिसे प्रतिरक्षा प्रणाली संभालती है।

उपार्जित प्रतिरक्षा:

जब शरीर किसी रोगाणु/टीके के संपर्क में आता है और प्रतिरक्षा प्रणाली उसे पहचानना सीखती है।

? टीका (वैक्सीन): रोगाणु के क्षीणीकृत / मृत / निष्क्रिय हानिरहित भाग से बना — यह प्रतिरक्षा प्रणाली को हानिकारक रोगाणुओं को पहचानने व आक्रमण करने हेतु प्रशिक्षित करता है। ⚠️ टीके रोकथाम के लिए हैं, चिकित्सा (इलाज) के लिए नहीं।

? वैज्ञानिक की भाँति सोचें — एडवर्ड जेनर व चेचक का टीका

अवलोकन: दूध दुहने वाली ग्वालिनें जिन्हें गौशीतला (काउपॉक्स) हुआ, वे चेचक से संक्रमित नहीं हुईं।

?️ अवलोकन → ? परिकल्पना → ? परीक्षण → ? परिणाम → ? अनुप्रयोग

गौशीतला के फफोलों के तरल पदार्थ को एक लड़के में अंतःक्षेपित किया → बाद में चेचक के संपर्क में आने पर भी कोई लक्षण नहीं दिखा → परिणामस्वरूप व्यापक टीकाकरण से 1979 में चेचक का विश्व से उन्मूलन हुआ (भारत में 1965 का अभियान अहम रहा)।

?? भारत की भूमिका: भारत विश्व के सबसे बड़े टीका-उत्पादकों में से एक है — कोविड-19 महामारी में भारतीय टीका कंपनियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पारंपरिक विधि मसूरिकाकरण (वैरियोलेशन) आधुनिक टीकों से पहले चेचक से बचाव हेतु भारत में प्रयोग होती थी — इसे करने वालों को 'टीकेदार' कहा जाता था।

?‍? वैज्ञानिक परिचय: कमल रणदिवे — हॉर्मोन व विषाणुओं का कैंसर से संबंध; महाराज किशन भान — रोटावायरस टीका विकास (बच्चों को अतिसार से बचाव)।

✎ 3.5.1 रोगों का उपचार — प्रतिजैविक औषधियाँ (Antibiotics)

प्रतिजैविक:

ऐसी औषधियाँ जो केवल जीवाणु से होने वाले संक्रमणों को नष्ट करती हैं — ये विषाणु या प्रोटोज़ोआ जनित रोगों पर प्रभावी नहीं हैं।

? पेनिसिलिन की खोज (1928): लंदन के जीवाणुविज्ञानी एलेक्ज़ेंडर फ्लेमिंग ने देखा कि पेट्री डिश पर लगी फफूंद ने जीवाणु वृद्धि रोक दी → प्रथम प्रतिजैविक 'पेनिसिलिन' की खोज हुई।

⚠️ प्रतिजैविक प्रतिरोध (Antibiotic Resistance)

वह परिघटना जिसमें पहले प्रतिजैविक द्वारा नष्ट किए गए जीवाणु अब उसी दवा से मरते नहीं और गुणन करते रहते हैं।

? अनावश्यक/अधूरा प्रतिजैविक सेवन → ? प्रतिरोधी जीवाणु विकसित → ? समुदाय में प्रसार → ? उपचार कठिन/जटिल

✅ बचाव के उपाय

  • चिकित्सक की सलाह पर ही सेवन
  • निर्धारित पूरी खुराक पूरी करें
  • पशुओं में अनावश्यक प्रयोग न करें

❌ जोखिम बढ़ाने वाले कारण

  • बिना ज़रूरत प्रतिजैविक लेना
  • बीच में दवा छोड़ देना
  • पशु खाद्य उत्पादों से जीवाणु संपर्क

भारत में आयुर्वेद, सिद्ध व यूनानी जैसी पारंपरिक प्रणालियाँ भी सामान्य स्वास्थ्य प्रबंधन में सहायक हैं (जड़ी-बूटियाँ, संतुलित आहार, जीवनशैली) — किंतु ये सभी रोगों में प्रभावी नहीं होतीं। असंचरणीय रोगों के उपचार में शीघ्र निदान व निरंतर देखभाल जटिलताएँ रोकने की कुंजी है।


? स्मरणीय बिंदु

  • स्वास्थ्य = पूर्ण शारीरिक + मानसिक + सामाजिक कल्याण (न कि मात्र रोग की अनुपस्थिति)।
  • प्रसन्नता व स्वास्थ्य का घनिष्ठ संबंध है।
  • रोग = शरीर/मन की सामान्य कार्य-प्रणाली में बाधा।
  • लक्षण = जो अनुभव हो (दर्द); संकेत = जो देखा/मापा जाए (ज्वर, चकत्ते)।
  • असंचरणीय रोग (मधुमेह, हृदय रोग) — जीवनशैली/पर्यावरण से; रोगाणु से नहीं।
  • संचरणीय (संक्रामक) रोग — जीवाणु, विषाणु, कृमि जैसे रोगजनकों से।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली हमें हानिकारक रोगजनकों से बचाती है।
  • टीके = मृत/क्षीणीकृत/हानिरहित रोगाणु-भाग — रोकथाम हेतु, चिकित्सा हेतु नहीं।
  • उचित निदान ही रोग-प्रबंधन व उपचार की पहली सीढ़ी है।

✍️ जिज्ञासा बनाए रखें — अभ्यास प्रश्न हल

Q1. चित्रों को संचरणीय/असंचरणीय में वर्गीकृत करें संचरणीय सर्दी-जुकाम व फ्लू, आंत्र ज्वर (टाइफॉइड), छोटी माता (चिकनपॉक्स)  |  असंचरणीय मधुमेह (डायबिटीज), अस्थमा (दमा)

Q2. असंचरणीय रोगों को पहचानिए (आंत्र ज्वर, अस्थमा, मधुमेह, खसरा) उत्तर: (ख) (ii) और (iii) — अस्थमा तथा मधुमेह असंचरणीय रोग हैं (आंत्र ज्वर व खसरा संक्रामक/संचरणीय हैं)।

Q3. स्कूल में फ्लू का प्रकोप (i) तुरंत उपाय — बीमार विद्यार्थियों को आराम की सलाह, बार-बार हाथ धोना व मास्क को प्रोत्साहन, कक्षा/डेस्क की सफाई, व्यक्तिगत वस्तुएँ साझा न करने पर बल, जागरूकता संदेश।
(ii) सहानुभूतिपूर्वक बताएँ कि तबीयत ठीक नहीं लग रही, शिक्षक को सूचित करें व आराम का सुझाव दें — बिना ठेस पहुँचाए।
(iii) मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना, वस्तुएँ साझा न करना, दूरी बनाए रखना, स्वयं अस्वस्थ होने पर घर पर आराम करना।

Q4. मलेरिया-प्रकोप वाले क्षेत्र की यात्रा (i) यात्रा-पूर्व: चिकित्सक से परामर्श, आवश्यक दवा/टीकाकरण; यात्रा के समय: मच्छरदानी, प्रतिकर्षी, पूरी बाँह के कपड़े, ठहरे पानी से बचना; यात्रा-पश्चात: ज्वर के लक्षण दिखे तो तुरंत जाँच करवाएँ।
(ii) उदाहरण द्वारा समझाएँ कि मच्छरदानी/प्रतिकर्षी एक "सुरक्षा-कवच" की तरह काम करते हैं जो मच्छर के काटने और गंभीर बीमारी दोनों से बचाते हैं।
(iii) अनदेखी करने पर मलेरिया होने का खतरा काफी बढ़ जाता है और समुदाय में रोग फैलने की संभावना भी बढ़ती है।

Q5. चाचाजी की धूम्रपान की आदत (i) प्रेमपूर्वक व बिना आलोचना किए धूम्रपान के स्वास्थ्य दुष्प्रभावों के तथ्य साझा करें और चिंता व्यक्त करें।
(ii) विनम्रता से मना करें और स्वास्थ्य कारण स्पष्ट रूप से बताएँ।
(iii) स्कूल जागरूकता कार्यक्रम, परामर्श सत्र और स्वास्थ्य-शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को बचा सकता है।

Q6. सानिया के कथन "प्रतिजैविक हर संक्रमण ठीक कर सकती है" पर विनीता के प्रश्न

  • क्या प्रतिजैविक विषाणु-जनित रोगों (जैसे सर्दी-जुकाम, फ्लू) पर काम करती है?
  • बिना डॉक्टर की सलाह के प्रतिजैविक लेना क्या सुरक्षित है?
  • क्या इसके अनावश्यक प्रयोग से प्रतिजैविक प्रतिरोध विकसित नहीं हो सकता?

Q7. डेंगू मामलों का दंड आलेख (बार ग्राफ) मामले जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुल अग सित अक्तू नव दिस जुलाई–सितंबर में 65-65-65 मामलों के साथ सर्वोच्च शिखर (गुलाबी बार) (i) सर्वाधिक मामलों वाले तीन महीने: जुलाई, अगस्त, सितंबर (65-65-65)।
(ii) सबसे कम मामले: जनवरी (10)।
(iii) मानसून के कारण — जल-जमाव, अधिक आर्द्रता व तापमान मच्छरों के प्रजनन को बढ़ावा देते हैं।
(iv) निवारक उपाय — मानसून-पूर्व फॉगिंग, जल-जमाव रोकना, मच्छरदानी वितरण अभियान, समुदाय में समय रहते जागरूकता।

Q8. विद्यालय स्वास्थ्य अभियान — मुख्य संदेश नियमित हाथ धोना • स्वच्छ पेयजल व भोजन • संतुलित आहार व नियमित व्यायाम • पूर्ण टीकाकरण • धूम्रपान/नशे से दूरी • पर्याप्त नींद व तनाव प्रबंधन • बीमार होने पर आराम व समय पर जाँच।

Q9. वायरल संक्रमण (सर्दी/खाँसी/फ्लू) में प्रतिजैविक न लेने की सलाह क्यों? प्रतिजैविक केवल जीवाणुओं पर प्रभावी हैं, विषाणुओं पर नहीं — अनावश्यक सेवन से कोई लाभ नहीं होता बल्कि प्रतिजैविक प्रतिरोध विकसित हो सकता है, जिससे भविष्य में वास्तविक जीवाणु-संक्रमण होने पर वही दवा असरहीन हो सकती है।

Q10. दूषित पेयजल से कौन-से रोग फैल सकते हैं? (हेपेटाइटिस ए, टीबी, पोलियो, हैजा, चेचक) उत्तर: यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए, पोलियोमाइलाइटिस और हैजा — ये मल-दूषित जल/भोजन (fecal-oral मार्ग) से फैलते हैं। टीबी वायु-जनित है और चेचक वायु/संपर्क से फैलता है, जल-जनित नहीं।

Q11. दूसरी बार प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अधिक तीव्र क्यों होती है? पहली बार शरीर रोगजनक को धीरे-धीरे पहचानता है (प्राथमिक प्रतिक्रिया धीमी होती है)। इस दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली स्मृति कोशिकाएँ (memory cells) बना लेती है जो उस रोगजनक को "याद" रखती हैं। दोबारा सामना होने पर ये स्मृति कोशिकाएँ तुरंत सक्रिय हो जाती हैं और तेज़ी से अधिक एंटीबॉडी बनाती हैं — इसी कारण दूसरी प्रतिक्रिया कहीं अधिक तीव्र व प्रभावी होती है। यही सिद्धांत टीकाकरण का आधार है।

✦ नोट्स समाप्त — कक्षा 8, अध्याय 3: स्वास्थ्य एक अमूल्य निधि ✦
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