NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 5: Panch Shilani Acharema | पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम व्याख्या
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के पंचम पाठ 'पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें साञ्ची स्तूप, व्याघ्री-जातक कथा, पञ्चशील, चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और त्रिशरण — चित्रों सहित — शामिल है।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का पंचम पाठ "पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम" साञ्ची स्तूप की यात्रा के दृश्य से आरंभ होकर बौद्धधर्म, भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और पञ्चशील (पाँच नैतिक सिद्धांतों) का परिचय देता है। पाठ में जातकमाला की प्रसिद्ध व्याघ्री-जातक कथा के माध्यम से बोधिसत्त्व की करुणा को दर्शाया गया है, तथा चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और त्रिशरण जैसी बौद्ध शिक्षाओं का भी परिचय दिया गया है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
पाँचों पाठों को एक साथ देखें तो ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक की विषय-विविधता और भी स्पष्ट होती है — संविधान, प्राचीन ज्ञान-परंपरा, आयुर्वेद और नारी-शक्ति के पश्चात् यह पंचम पाठ बौद्धधर्म एवं भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को संस्कृत के माध्यम से प्रस्तुत करता है, जो कक्षा 9 के विद्यार्थियों को भारत की बहुधार्मिक व नैतिक परंपरा से भी परिचित कराता है।
पाठ का सार — साञ्ची स्तूप की यात्रा
पाठ का आरंभ एक विद्यालयी शैक्षणिक-भ्रमण के दृश्य से होता है, जिसमें अध्यापिका और विद्यार्थी (वसुधारा, मैत्रेय, तेञ्जिन, अरुणा, लावण्या) साञ्ची स्तूप की यात्रा पर हैं। मैत्रेय बताता है कि सम्राट अशोक ने इस स्तूप का निर्माण करवाया था, और अध्यापिका जोड़ती हैं कि यूनेस्को द्वारा भी साञ्ची स्तूप को विश्व धरोहर (वैश्विक सम्पदा) घोषित किया गया है। यह स्तूप बौद्धधर्म के सिद्धांतों और भगवान गौतम बुद्ध के उपदेशों के प्रचार हेतु निर्मित किया गया था। विद्यार्थी तेञ्जिन के इस प्रश्न पर कि क्या गौतम बुद्ध के उपदेश आधुनिक काल में भी उपयोगी हैं, अध्यापिका उत्तर देती हैं कि बुद्ध के उपदेश सार्वकालिक (timeless) और सार्वभौमिक (universal) हैं। सांसारिक मोह-माया की उपेक्षा कर घोर तपस्या से बोध प्राप्त कर गौतम भगवान बुद्ध बने, और वे करुणा की साक्षात् प्रतिमा थे।
व्याघ्री-जातक — बोधिसत्त्व की करुणा-कथा
विद्यार्थियों के आग्रह पर अध्यापिका जातकमाला की प्रसिद्ध व्याघ्री-जातक कथा सुनाती हैं, जो बुद्ध के पूर्वजन्म (बोधिसत्त्व के रूप में) की करुणा दर्शाती है। कथा के अनुसार बोधिसत्त्व एक कुलीन परिवार में जन्मे और अपनी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता व ज्ञान-जिज्ञासा से अल्प समय में अठारह विद्या-स्थानों में पारंगत हुए। संन्यास ग्रहण कर वे वन में विचरण करते थे, और उनके स्नेह-करुणा भाव से हिंसक पशु भी परस्पर बिना कलह के रहते थे।
एक बार अपने शिष्य अजित के साथ वन में भ्रमण करते हुए बोधिसत्त्व ने एक व्याघ्री (बाघिन) को देखा, जो प्रसव-पीड़ा से क्लांत, भूख से व्याकुल तथा दुर्बल थी, और भूख की पीड़ा से अपने ही शावकों को खाने का प्रयास कर रही थी। बोधिसत्त्व ने तुरंत अजित को कहीं से भोजन खोजने भेजा। अजित के जाने के बाद बोधिसत्त्व ने विचार किया कि जब उनका अपना शरीर मौजूद है, तो किसी अन्य प्राणी का मांस लाने की क्या आवश्यकता? यह सोचकर कि आत्मा अमर है और शरीर नश्वर व परोपकार के लिए ही है, बोधिसत्त्व ने योगबल से अपने प्राण त्याग दिए, जिससे उनका शरीर गुफा में गिर पड़ा। व्याघ्री ने अपने शावकों को हानि पहुँचाने से रुककर बोधिसत्त्व के शरीर से अपनी भूख शांत की। पाठ के अनुसार ऐसा करुणामय बोधिसत्त्व ही अगले जन्म में भगवान बुद्ध के रूप में जगत-कल्याण करने वाले बने।
चित्र विवरण: बोधिसत्त्व की करुणा — भूखी व्याघ्री की रक्षा हेतु आत्म-त्याग की कथा का मूल भाव।
पञ्चशील — गृहस्थ जीवन के पाँच सिद्धांत
भगवान बुद्ध ने गृहस्थों के नैतिक जीवन के निर्वाह हेतु पाँच शील (सिद्धांत) बताए, जिन्हें पालि भाषा में उपदिष्ट किया गया है:
- पाणातिपाता वेरमणि — किसी भी जीव की हत्या न करना (अहिंसा)
- अदिन्नादाना वेरमणि — चोरी न करना (अस्तेय)
- कामेसु मिच्छाचारा वेरमणि — व्यभिचार का आचरण न करना (सदाचार)
- मुसावादा वेरमणि — झूठ न बोलना (सत्य)
- सुरामेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणि — मद्य व मादक पदार्थों का सेवन न करना (अमादकता)
इन पाँच शीलों के पालन से ही संसार में शांतिमय जीवन तथा आदर्श समाज की रचना संभव है — यही पाठ का शीर्षक-संदेश भी है।
चित्र विवरण: अहिंसा, अस्तेय, सदाचार, सत्य और अमादकता — गृहस्थ जीवन के पाँच शील।
चार आर्य सत्य
बुद्ध ने मनुष्यों के दुःख-निवारण हेतु चार आर्य सत्यों (चत्वारि आर्यसत्यानि) का उपदेश दिया:
- दुःख — संसार दुःखमय है; जन्म, जरा, व्याधि, मरण, वियोग आदि सभी दुःख-स्वरूप हैं।
- दुःख-समुदय — तृष्णा (इच्छा या आसक्ति) ही दुःख का मूल कारण है।
- दुःख-निरोध — तृष्णा के नाश से दुःख का निरोध सम्भव है; यही निर्वाण (मोक्ष) है।
- दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा — दुःख-निरोध की ओर ले जाने वाला मार्ग ही चौथा आर्य सत्य है, अर्थात् अष्टांगिक मार्ग।
अष्टांगिक मार्ग
चौथे आर्य सत्य (मार्ग) का विस्तृत रूप अष्टांगिक मार्ग है, जिसमें आठ अंग सम्मिलित हैं:
- सम्यक् दृष्टि — वस्तुओं का यथार्थ ज्ञान
- सम्यक् संकल्प — शुद्ध व हितकर विचार
- सम्यक् वाक् — सत्य, प्रिय व हितकर वचन
- सम्यक् कर्म — सदाचारयुक्त कर्म
- सम्यक् आजीव — धर्मसम्मत जीविकोपार्जन
- सम्यक् व्यायाम — शुभ कर्मों की सिद्धि हेतु प्रयत्न
- सम्यक् स्मृति — चित्त की जागरूकता
- सम्यक् समाधि — ध्यान द्वारा चित्त की एकाग्रता
चित्र विवरण: दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्म, आजीव, व्यायाम, स्मृति और समाधि — अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग।
त्रिशरण
बौद्धधर्म की मूल भावना त्रिशरण के सिद्धांत में प्रकट होती है — "बुद्धं शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि॥" अर्थात् साधक बुद्ध (जागृत गुरु), धर्म (सत्य) और संघ (भिक्षु-समुदाय) की शरण ग्रहण करता है। करुणा, मैत्री, अहिंसा और मध्यम मार्ग का आचरण ही बौद्धधर्म के नैतिक जीवन के मूल तत्त्व हैं।
पालि भाषा के कुछ नियम
पाठ के व्याकरण-प्रकरण "अत्र इदम् अवधेयम्" में पालि भाषा की कुछ विशेषताएँ भी बताई गई हैं, जिनके कारण यह भाषा संस्कृत से भिन्न होती है:
- संस्कृत के विपरीत पालि में हलन्त (व्यंजनान्त) पद नहीं होते — जैसे संस्कृत का "आर्यसत्यम्" पालि में "अरियसच्चं" बनता है।
- संस्कृत में स्वर-वर्ण से पूर्व अनुस्वार नहीं होता, परन्तु पालि में स्वर-वर्ण से पूर्व भी अनुस्वार होता है — जैसे "दुक्खं अरियसच्चं"।
- संस्कृत में विसर्ग का ओकार-आदेश केवल कुछ विशेष स्थितियों में होता है तथा वाक्य के अंत में कभी नहीं होता, जबकि पालि में विसर्ग (अः) का सदैव ओकार-आदेश होता है — जैसे संस्कृत का "सम्यक् सङ्कल्पः" पालि में "सम्मासङ्कप्पो" बनता है।
बौद्धधर्म का परिचय और विपश्यना
"स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में बौद्धधर्म की व्यापक जानकारी दी गई है। बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध ने पालि भाषा का प्रयोग कर धर्म-प्रचार किया। अनुयायियों की संख्या की दृष्टि से बौद्धधर्म वर्तमान में विश्व का चतुर्थ सबसे बड़ा धर्म है, और चीन, जापान, वियतनाम, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, भूटान, श्रीलंका आदि देशों में इसकी व्यापकता है। बौद्धों का प्रमुख धर्मग्रन्थ त्रिपिटक है, जिसके तीन भाग हैं — सुत्तपिटक (बुद्ध के उपदेश), विनयपिटक (भिक्षुओं का आचरण व मठों के नियम), और अभिधम्मपिटक (दार्शनिक विचार)। आर्यशूर द्वारा रचित जातकमाला में व्याघ्री-जातक सहित चौंतीस जातक-कथाएँ संकलित हैं, तथा अश्वघोष ने संस्कृत में बुद्धचरितम् और सौन्दरानन्दमहाकाव्यम् की रचना की।
पाठ विपश्यना ध्यान-पद्धति का भी परिचय देता है — यह भगवान बुद्ध द्वारा खोजी गई एक प्राचीन ध्यान-विधि है, जिसमें साधक अपनी श्वास-प्रश्वास तथा शरीर की विविध संवेदनाओं का तटस्थ भाव से निरीक्षण करता है। इसका मूल आत्म-निरीक्षण में निहित है।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| स्तूपः | बौद्धों का स्मृति-स्थल | Sacred Buddhist monument |
| वैश्विकसम्पद् | विश्व की साझी धरोहर | Global heritage |
| सार्वकालिकाः | जो सदैव प्रासंगिक हो | Timeless |
| सार्वभौमिकाः | सभी समाजों पर लागू | Universal |
| बोधिसत्त्वः | भगवान बुद्ध (पूर्वजन्म में) | The Lord Buddha |
| अभिवर्धमानः | बढ़ता हुआ | Growing up |
| ज्ञानकौतूहलात् | ज्ञान की जिज्ञासा से | Out of curiosity for knowledge |
| कृतप्रव्रज्यापरिचयः | संन्यास से परिचित | Familiar with renunciation |
| नचिरेण | शीघ्र ही | Soon, in no time |
| क्लान्ता | थकी हुई, व्याकुल | Exhausted, weary |
| क्षुत्पीडां | भूख की पीड़ा | Hunger pangs |
| ससम्भ्रमम् | चिन्तित होकर | With concern |
| जडम् | निर्जीव | Non-living |
| मृषावादात् | झूठ बोलने से | From speaking lies |
| प्राणातिपातात् | जीव-हत्या से | From killing living beings |
पाठ में "बोधिसत्त्वः" व "कृतप्रव्रज्यापरिचयः" (बहुव्रीहि), "ज्ञानकौतूहलात्" व "विद्यास्थानेषु" (षष्ठी-तत्पुरुष), "प्रकृतिमेधावित्वात्" (तृतीया-तत्पुरुष), और "अकौसीद्यात्" (नञ्-तत्पुरुष) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- एक-पद में तथा पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखना — जैसे जातक-कथाओं में बुद्ध के नाम, भूखी बाघिन, बोधिसत्त्व के प्राणोत्सर्ग तथा बौद्धधर्म के प्रवर्तक से जुड़े प्रश्न
- दिए गए पदों (व्यायामः, भीतिः, साधनम्, आहारः, सृष्टिः) का उपयोग कर अष्टांगिक मार्ग से संबंधित घोष-वाक्य (नारे) रचना
- रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करना
- दिए गए पदों का सन्धि-विच्छेद करना
- समस्त पदों का विग्रह लिखना
पाठ के साथ "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में बौद्धधर्म का परिचय व विपश्यना-विधि विस्तार से दी गई है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को "जीव-करुण्य" विषय पर एक लघु-नाटक अभिनीत करने, प्रसिद्ध बौद्ध मठों व विश्वविद्यालयों पर सचित्र परियोजना-कार्य बनाने, तथा भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ-स्थलों — लुम्बिनी (जन्म-स्थान), बोधगया (ज्ञान-प्राप्ति स्थान), सारनाथ (प्रथम उपदेश-स्थान) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण-स्थान) — को सही स्थान से मिलाने का कार्य दिया गया है।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: साञ्ची स्तूप का निर्माण किसने करवाया था?
उत्तर: सम्राट अशोक ने साञ्ची स्तूप का निर्माण करवाया था।
प्रश्न 2: साञ्ची स्तूप को यूनेस्को द्वारा क्या घोषित किया गया है?
उत्तर: यूनेस्को द्वारा साञ्ची स्तूप को वैश्विक सम्पदा (विश्व धरोहर) के रूप में घोषित किया गया है।
प्रश्न 3: व्याघ्री-जातक कथा में बोधिसत्त्व ने क्या किया?
उत्तर: बोधिसत्त्व ने भूखी व्याघ्री को अपने ही शावकों को खाने से बचाने के लिए अपना शरीर योगबल से त्याग दिया।
प्रश्न 4: पञ्चशील में कौन-कौन से पाँच सिद्धांत सम्मिलित हैं?
उत्तर: अहिंसा (हत्या न करना), अस्तेय (चोरी न करना), सदाचार (व्यभिचार न करना), सत्य (झूठ न बोलना), और अमादकता (मद्य-मादक पदार्थों का सेवन न करना)।
प्रश्न 5: चार आर्य सत्य कौन-से हैं?
उत्तर: दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निरोध, और दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा (अष्टांगिक मार्ग) — ये चार आर्य सत्य हैं।
प्रश्न 6: दुःख का मूल कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: तृष्णा (इच्छा या आसक्ति) को दुःख का मूल कारण बताया गया है।
प्रश्न 7: अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग कौन-से हैं?
उत्तर: सम्यक् दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्म, आजीव, व्यायाम, स्मृति और समाधि — ये आठ अंग हैं।
प्रश्न 8: त्रिशरण में साधक किन तीन की शरण ग्रहण करता है?
उत्तर: साधक बुद्ध, धर्म और संघ — इन तीनों की शरण ग्रहण करता है।
प्रश्न 9: पालि भाषा संस्कृत से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: पालि में हलन्त पद नहीं होते, स्वर-वर्ण से पूर्व अनुस्वार होता है, और विसर्ग का सदैव ओकार-आदेश होता है — जबकि संस्कृत में ये नियम भिन्न हैं।
प्रश्न 10: बौद्धों का प्रमुख धर्मग्रन्थ कौन-सा है और उसके कितने भाग हैं?
उत्तर: त्रिपिटक बौद्धों का प्रमुख धर्मग्रन्थ है, जिसके तीन भाग हैं — सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक।
प्रश्न 11: विपश्यना क्या है?
उत्तर: विपश्यना भगवान बुद्ध द्वारा खोजी गई एक प्राचीन ध्यान-पद्धति है, जिसमें साधक अपनी श्वास व शरीर की संवेदनाओं का तटस्थ भाव से निरीक्षण करता है।
प्रश्न 12: भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ-स्थल कौन-से हैं?
उत्तर: लुम्बिनी (जन्म-स्थान), बोधगया (ज्ञान-प्राप्ति स्थान), सारनाथ (प्रथम उपदेश-स्थान), और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण-स्थान)।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- बोधिसत्त्व की करुणा-कथा हमें परोपकार व निःस्वार्थ त्याग की भावना सिखाती है।
- पञ्चशील का पालन ही शांतिमय जीवन और आदर्श समाज की नींव है।
- चार आर्य सत्य दुःख के स्वरूप, कारण, निवारण और मार्ग को क्रमबद्ध रूप से समझाते हैं।
- अष्टांगिक मार्ग का पालन सम्यक् दृष्टि से लेकर सम्यक् समाधि तक जीवन के हर पक्ष को दिशा देता है।
- बौद्धधर्म के उपदेश सार्वकालिक व सार्वभौमिक हैं, तथा आज भी विश्व के करोड़ों अनुयायियों का मार्गदर्शन करते हैं।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ बौद्धधर्म, करुणा और नैतिक जीवन-मूल्यों की मूल समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। कक्षा 9 के अन्य विषयों की व्याख्या के लिए विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 भी देख सकते हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से जुड़ी बुनियादी अवधारणाएँ समझाई गई हैं।


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