NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 3: Vaidyavrittishchaturvidha | वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा की सम्पूर्ण हिंदी व्याख्या
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के तीसरे पाठ 'वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें आयुर्वेद की परिभाषा, चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ, वैद्य के चार कर्तव्य, आत्रेय की कथा और श्लोकों के मूल स्रोत — चित्रों सहित — शामिल हैं।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का तृतीय पाठ "वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा" आयुर्वेद और वैद्य (चिकित्सक) के आचार-कर्तव्यों का परिचय देता है। पिछले पाठों से भिन्न, यह पाठ किसी एक ग्रंथ पर आधारित नहीं, बल्कि चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, वैद्यकीयसुभाषितम् और अष्टाङ्गहृदयम् — इन चार प्राचीन आयुर्वेद-ग्रंथों से संकलित श्लोकों पर आधारित है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति के अंतर्गत संस्कृत एक मान्यता-प्राप्त भारतीय भाषा है, जिसे कक्षा 9 के अधिकांश विद्यार्थी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में पढ़ते हैं। NCERT की कक्षा 9 की अन्य नई पाठ्यपुस्तकों — जैसे गणित मंजरी — की तरह ही ऋषिकुल्या भी वर्तमान पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
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पाठ का सार — स्वास्थ्य और धर्मसाधन
पाठ का प्रारंभ एक कक्षा-दृश्य से होता है। आचार्य कक्षा में प्रवेश करते हैं और देखते हैं कि अनन्या नामक छात्रा उत्साहरहित दिखाई दे रही है। पूछने पर अनन्या बताती है कि उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसी अवसर पर आचार्य महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध उक्ति उद्धृत करते हैं — "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" — अर्थात् शरीर ही धर्म-साधना का प्रथम और मुख्य साधन है। पाठ स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यक्ति धर्माचरण करना चाहता है, तो पहले उसका शरीर स्वस्थ होना आवश्यक है। इसी प्रसंग से पाठ आयुर्वेद के परिचय की ओर बढ़ता है।
आयुर्वेद की परिभाषा
चरकसंहिता (सूत्रस्थानम् 1/41) के एक श्लोक में आयुर्वेद की परिभाषा दी गई है:
"हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानञ्च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥"
इसके अनुसार जिस शास्त्र में जीवन के हितकर व अहितकर पक्ष, सुख व दुःख, आयु तथा आयु की मात्रा (काल-सीमा) का वर्णन किया गया हो, वही आयुर्वेद कहलाता है। इस प्रकार आयुर्वेद केवल रोग-उपचार का शास्त्र नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन-शैली और दीर्घायु का विज्ञान है।
चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ
सुश्रुतसंहिता (34/15,16) के अनुसार चिकित्सा के चार अनिवार्य अंग (पाद) बताए गए हैं:
"वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः। एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः॥ गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक्। व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत्॥"
अर्थात् वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक — ये चार चिकित्सा के आधार-स्तंभ हैं। पाठ के अनुसार यदि इनमें से तीन घटक गुणवान् (योग्य) हों, तो चौथा गुणवान् वैद्य अल्प समय में ही बड़े-से-बड़े रोग को भी ठीक कर सकता है।
चित्र विवरण: वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक — चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ, एक-दूसरे से जुड़े हुए।
स्वस्थ जीवन के उपाय
पाठ में स्वास्थ्य-रक्षा के व्यावहारिक उपाय भी बताए गए हैं। वैद्यकीयसुभाषितम् (10/20) का एक श्लोक जल-सेवन के संतुलन पर बल देता है:
"अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं निरम्बुपानाच्च स एव दोषः। तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि॥"
अर्थात् अधिक जल पीने से भोजन ठीक से नहीं पचता, और बिल्कुल जल न पीने से भी वही दोष उत्पन्न होता है। अतः पाचन-अग्नि को बढ़ाने के लिए व्यक्ति को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार जल पीना चाहिए।
इसी क्रम में अष्टाङ्गहृदयम् (4.36) एक निरोग व्यक्ति के गुण बताता है:
"नित्यं हिताहार-विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः। दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः॥"
अर्थात् जो व्यक्ति सदैव हितकर आहार-विहार का पालन करता है, सोच-समझकर कार्य करता है, इन्द्रिय-विषयों में आसक्त नहीं होता, दानशील, समभावी, सत्यनिष्ठ, क्षमाशील तथा विश्वसनीय लोगों की संगति करने वाला होता है — वही व्यक्ति रोगरहित रहता है।
वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा — वैद्य के चार कर्तव्य
पाठ का शीर्षक-श्लोक चरकसंहिता (सूत्रस्थानम् 9/26) से लिया गया है:
"मैत्री कारुण्यमार्त्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्। प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा॥"
यह श्लोक वैद्य के आचरण के चार आयाम बताता है — दुःखी (रोगी) व्यक्तियों के प्रति मैत्री और करुणा, स्वस्थ हो सकने वाले (साध्य रोग वाले) व्यक्तियों के प्रति प्रीति (प्रसन्नता), तथा पहले से स्वस्थ व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा (तटस्थ, संतुलित भाव)। पाठ के चित्रों में इसी भावना को दैनिक जीवन के दृश्यों — अस्पताल में रोगी की सेवा, वृद्धजनों का सम्मान, चिकित्सक द्वारा परीक्षण आदि — के माध्यम से दिखाया गया है।
चित्र विवरण: वैद्य की चार वृत्तियाँ — करुणा, सहायता, प्रसन्नता और संतुलन — एक केंद्रीय भाव से जुड़ी हुई।
आत्रेय की कथा — हर वनस्पति में गुण है
पाठ के अभ्यास-खंड में एक प्रसिद्ध कथा दी गई है। प्राचीन काल में आयुर्वेदाचार्य आत्रेय ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें वन से ऐसी कोई वनस्पति लाने को कहा, जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। सभी शिष्य किसी-न-किसी वनस्पति को अनुपयुक्त मानकर ले आए, परन्तु आचार्य का प्रिय शिष्य जीवितराम खाली हाथ लौटा। उसने कहा कि उसने सम्पूर्ण प्रकृति में खोजा, परन्तु उसे ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। यह सुनकर गुरु अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे परीक्षा में सफल घोषित किया। इस कथा का सार यह है कि प्रकृति की प्रत्येक वनस्पति में कोई-न-कोई औषधीय गुण अवश्य विद्यमान होता है।
चित्र विवरण: एक साधारण-सा दिखने वाला पत्ता भी अपने भीतर औषधीय गुण छिपाए रखता है।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| निरुत्साहा | उत्साह से रहित | Unenthusiastic |
| अस्वस्थता | रुग्णता | Sickness |
| वैद्यः | चिकित्सक | Physician |
| व्याधिः | बीमारी | Disease |
| व्याधि-उपसृष्टः | बीमार व्यक्ति | Sick person |
| भेषजम् | दवाई | Medicine |
| परिचारकः | सेवक | Attendant |
| अम्बुः | पानी | Water |
| वह्निः | आग (पाचन-अग्नि) | Fire (digestive) |
| हिताहारः | शरीर के लिए उपयोगी आहार | Food beneficial for the body |
| विहारसेवी | उचित दिनचर्या का पालक | Follower of a proper routine |
| समीक्ष्यकारी | सोच-समझकर कार्य करने वाला | A prudent person |
| असक्तः | आसक्ति रहित | Free from attachment |
| समः | समान भाव वाला, निष्पक्ष | Unbiased |
| आप्तः | विश्वसनीय | Trustworthy |
| कारुण्यम् | दयाभाव | Compassion, mercy |
| आर्त्तेषु | दुःखी लोगों के प्रति | Towards the distressed |
| उपेक्षणम् | उदासीनता, संतुलित भाव | Equanimity, indifference |
| वृत्तिः | आचरण, प्रवृत्ति | Conduct, practice |
पाठ में "निरुत्साहा" (बहुव्रीहि), "अस्वस्थता" (नञ्-तत्पुरुष), "व्याधि-उपसृष्टः" (तत्पुरुष), "हिताहारः" (कर्मधारय), और "विहारसेवी" (बहुव्रीहि) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
श्लोकों के स्रोत — प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ
इस पाठ की एक विशेषता यह है कि यह किसी एक मूल ग्रंथ पर आधारित नहीं, अपितु पाँच भिन्न-भिन्न प्राचीन आयुर्वेद-ग्रंथों से संकलित श्लोकों पर आधारित है। पाठ के "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में प्रत्येक श्लोक का स्रोत स्पष्ट रूप से उद्धृत किया गया है:
| ग्रंथ | संदर्भ | विषय |
|---|---|---|
| चरकसंहिता, सूत्रस्थानम् | 1/41 | आयुर्वेद की परिभाषा |
| सुश्रुतसंहिता | 34/15,16 | चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ |
| वैद्यकीयसुभाषितम् | 10/20 | जल-सेवन का संतुलन |
| अष्टाङ्गहृदयम् | 4.36 | निरोग व्यक्ति के लक्षण |
| चरकसंहिता, सूत्रस्थानम् | 9/26 | वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा |
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- पाठ पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखना — जैसे कालिदास की उक्ति, चिकित्सा के चार पाद, तथा अत्यधिक जल-पान से होने वाले दोष से जुड़े प्रश्न
- रिक्त स्थानों की पूर्ति करना
- रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करना
- उपसर्ग-पदों की तालिका पूर्ण करना (जैसे उपसृष्टः, परिचारकः, विपच्यते आदि के उपसर्ग पहचानना)
- आत्रेय की कथा पढ़कर उस पर आधारित पाँच प्रश्नों के उत्तर देना
पाठ के साथ "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में सभी पाँच श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ तथा मूल ग्रंथ-स्रोत भी दिया गया है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को अंतर्जाल की सहायता से पाँच आयुर्वेदाचार्यों व उनके ग्रंथों के नाम खोजने, दस रोगों के निदान हेतु प्रयुक्त आयुर्वेदिक औषधियों की सूची बनाने, तथा कक्षा में दो समूहों में स्वास्थ्य-सम्बन्धी संवाद-अभ्यास करने का कार्य दिया गया है।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: महाकवि कालिदास ने धर्मसाधन के विषय में क्या कहा है?
उत्तर: कालिदास ने कहा है — "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" अर्थात् शरीर ही धर्म-साधना का प्रथम और मुख्य साधन है।
प्रश्न 2: चरकसंहिता के अनुसार आयुर्वेद की परिभाषा क्या है?
उत्तर: जिस शास्त्र में जीवन के हितकर-अहितकर पक्ष, सुख-दुःख, आयु और उसकी मात्रा का वर्णन हो, वही आयुर्वेद कहलाता है।
प्रश्न 3: चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ (पाद) कौन-से हैं?
उत्तर: वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक — ये चार आधार-स्तंभ हैं।
प्रश्न 4: गुणवान् वैद्य किस प्रकार बड़े रोग को भी ठीक कर सकता है?
उत्तर: यदि वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक — तीनों गुणवान् हों, तो चौथा गुणवान् वैद्य अल्प समय में ही बड़े रोग को भी ठीक कर सकता है।
प्रश्न 5: अत्यधिक जल पीने से क्या दोष होता है?
उत्तर: अत्यधिक जल पीने से भोजन ठीक से नहीं पचता; बिल्कुल जल न पीने से भी वही दोष होता है — इसलिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार जल पीना चाहिए।
प्रश्न 6: अष्टाङ्गहृदयम् के अनुसार निरोग व्यक्ति के क्या लक्षण हैं?
उत्तर: जो सदैव हितकर आहार-विहार का पालन करे, सोच-समझकर कार्य करे, इन्द्रिय-विषयों में आसक्त न हो, दानशील, समभावी, सत्यनिष्ठ और क्षमाशील हो — वही व्यक्ति निरोग रहता है।
प्रश्न 7: वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा में कौन-कौन-से चार भाव सम्मिलित हैं?
उत्तर: दुःखी व्यक्तियों के प्रति मैत्री व करुणा, साध्य रोगियों के प्रति प्रीति, और स्वस्थ व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा (संतुलित भाव)।
प्रश्न 8: वैद्य को स्वस्थ (प्रकृतिस्थ) व्यक्तियों के प्रति कैसा भाव रखना चाहिए?
उत्तर: उपेक्षा का भाव, अर्थात् तटस्थ और संतुलित भाव — क्योंकि उन्हें तत्काल चिकित्सकीय ध्यान की आवश्यकता नहीं होती।
प्रश्न 9: आचार्य आत्रेय ने अपने शिष्यों को क्या कार्य सौंपा था?
उत्तर: उन्होंने शिष्यों को वन से ऐसी वनस्पति लाने को कहा था जिसमें कोई औषधीय गुण न हो।
प्रश्न 10: जीवितराम खाली हाथ क्यों लौटा?
उत्तर: क्योंकि उसे सम्पूर्ण प्रकृति में ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें कोई औषधीय गुण न हो — अर्थात् हर वनस्पति में कुछ-न-कुछ औषधीय गुण अवश्य होता है।
प्रश्न 11: यह पाठ किन ग्रंथों से संकलित श्लोकों पर आधारित है?
उत्तर: यह पाठ चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, वैद्यकीयसुभाषितम् और अष्टाङ्गहृदयम् — इन चार प्राचीन आयुर्वेद-ग्रंथों से संकलित श्लोकों पर आधारित है।
प्रश्न 12: वैद्यकीयसुभाषितम् के अनुसार पाचन-अग्नि बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार जल पीना चाहिए, न कि एक साथ अधिक मात्रा में।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- शरीर ही धर्म-साधना का प्रथम साधन है, अतः स्वास्थ्य की रक्षा अनिवार्य है।
- आयुर्वेद केवल रोग-उपचार तक सीमित नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन-शैली और दीर्घायु का विज्ञान है।
- चिकित्सा के चार आधार-स्तंभ — वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक — सभी का गुणवान् होना आवश्यक है।
- वैद्य को रोगी की स्थिति के अनुसार मैत्री, करुणा, प्रीति और उपेक्षा — इन चार भावों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए।
- प्रकृति की प्रत्येक वनस्पति में कोई-न-कोई औषधीय गुण अवश्य विद्यमान होता है।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ आयुर्वेद और स्वस्थ जीवन-शैली की मूल समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। शरीर और उसकी क्रियाओं को विज्ञान की दृष्टि से समझने के लिए विद्यार्थी कक्षा 9 विज्ञान का जनन: जीवन कैसे जारी रहता है अध्याय भी देख सकते हैं, तथा प्राचीन भारत की सामाजिक पृष्ठभूमि के लिए इतिहास का 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज अध्याय भी उपयोगी रहेगा।


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