अध्याय 2 - अदृश्य जीव-जगत | कक्षा 8 विज्ञान नोट्स (Handwritten Notes)
कक्षा 8 विज्ञान अध्याय 2 "अदृश्य जीव-जगत" के पूर्ण हैंडरिटन नोट्स — कोशिका, सूक्ष्मजीव, किण्वन, विघटन व सभी हल किए गए प्रश्न-अभ्यास एक जगह।
जिज्ञासा • कक्षा 8 • विज्ञान अध्याय 2 अदृश्य जीव-जगत हमारी आँखों की क्षमता से परे
? पूर्ण नोट्स + हल किए गए प्रश्न-अभ्यास + याद रखने के सरल तरीके। अगर आपने अध्याय 1 के नोट्स अभी तक नहीं पढ़े, तो पहले वहाँ से शुरुआत करें। कक्षा 8 विज्ञान के सभी मुफ़्त नोट्स, क्विज़ और एक्टिविटी के लिए Bhanu Classes Bhogpur पेज ज़रूर देखें।
? परिचय — कोशिका की खोज
मानव नेत्र केवल एक निश्चित आकार से बड़ी वस्तुओं को ही देख सकते हैं। बहुत छोटी वस्तुएँ हमारी आँखों से अदृश्य रहती हैं। इस अध्याय में हम जानेंगे कि वैज्ञानिकों ने किस प्रकार लेंस और सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार करके इस अदृश्य संसार को देखना संभव बनाया।
▸ लेंस की खोज
बहुत समय पूर्व लोगों ने पाया कि काँच का एक वक्रित टुकड़ा (मसूर की दाल के आकार जैसा — बीच से मोटा, किनारों से पतला) छोटी वस्तुओं को बड़ा करके दिखा सकता है। इसी कारण इसे 'लेंस' (Lens) कहा गया — यह शब्द लैटिन के 'लेंटिल' (मसूर) से बना है।
? क्रियाकलाप 2.1 — जल से भरा फ्लास्क
गोल पेंदे वाले फ्लास्क को जल से भरकर, कॉर्क से बंद करके एक खुली पुस्तक पर रखने पर, फ्लास्क के माध्यम से देखने पर पुस्तक के अक्षर बड़े दिखाई देते हैं। जल से भरा फ्लास्क एक आवर्धक लेंस (Magnifying Lens) की भाँति कार्य करता है।
▸ रॉबर्ट हुक और माइक्रोग्राफिया (1665)
? परिभाषा: कोशिका (Cell)
जीवन की सबसे छोटी इकाई, जिसे सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने कॉर्क के पतले टुकड़े में देखे गए छोटे-छोटे रिक्त स्थानों (मधुमक्खी के छत्ते जैसे प्रकोष्ठों) को देखकर 'कोशिका' नाम दिया।
वर्ष 1665 में वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक ने 'माइक्रोग्राफिया' नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने अपने सूक्ष्मदर्शी से देखी गई अत्यंत छोटी वस्तुओं के आवर्धित चित्र प्रस्तुत किए। उनका सूक्ष्मदर्शी वस्तुओं को उनके वास्तविक आकार से 200–300 गुना बड़ा दिखा सकता था।
वर्ष 1660 के दशक में डच वैज्ञानिक एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने अधिक परिष्कृत लेंस बनाकर उपयोगी सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया। वे जीवाणु व रक्त कोशिकाओं को स्पष्ट रूप से देखने और वर्णन करने वाले प्रथम व्यक्ति थे — इसीलिए उन्हें 'सूक्ष्मजैविकी (Microbiology) का जनक' कहा जाता है।
2.1 कोशिका क्या है?
सभी सजीव कोशिकाओं से बने होते हैं। सूक्ष्मदर्शी की सहायता से हम कोशिका की मूल संरचना का अवलोकन कर सकते हैं।
▸ क्रियाकलाप 2.2 — प्याज की झिल्ली का अध्ययन
? विधि व अवलोकन
प्याज के कंद से पतली, पारदर्शी झिल्ली निकालकर सैफ्रेनीन (लाल अभिरंजक) से रंगा जाता है, ग्लिसरीन की बूँद डालकर स्लाइड पर रखा जाता है और कवरस्लिप लगाकर सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है। इससे आयताकार, सघन रूप से व्यवस्थित कोशिकाएँ दिखाई देती हैं — जैसे ईंट से बनी दीवार।
▸ क्रियाकलाप 2.3 — मानव कपोल (गाल) की कोशिकाएँ
? विधि व अवलोकन
टूथपिक से कपोल के भीतरी भाग को धीरे से खुरचकर, स्लाइड पर मेथिलीन ब्लू (नीला अभिरंजक) व ग्लिसरीन डालकर सूक्ष्मदर्शी से देखने पर बहुभुजाकार कोशिकाएँ दिखाई देती हैं।
▸ कोशिका के तीन मूल भाग
- कोशिका झिल्ली (Cell Membrane): कोशिका की सबसे बाहरी परत; कोशिकाद्रव्य व केंद्रक को घेरे रहती है; सरंध्र होती है; पदार्थों के प्रवेश व अपशिष्ट के निकास को नियंत्रित करती है।
- केंद्रक (Nucleus): मध्यभाग में स्थित गोल संरचना, पतली झिल्ली से ढका; कोशिका की सभी गतिविधियों व वृद्धि को नियंत्रित करता है।
- कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm): कोशिका झिल्ली व केंद्रक के बीच का स्थान; कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा व खनिज लवण उपस्थित; अधिकांश जैव प्रक्रम यहीं होते हैं।
- कोशिका भित्ति (Cell Wall): कुछ कोशिकाओं (जैसे प्याज) में कोशिका झिल्ली के बाहर अतिरिक्त परत; कोशिका को मजबूती व दृढ़ता प्रदान करती है।
▸ जंतु कोशिका बनाम पादप कोशिका
- कोशिका भित्ति — जंतु कोशिका में अनुपस्थित; पादप कोशिका में उपस्थित (मजबूती प्रदान करती है)।
- हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) — जंतु कोशिका में अनुपस्थित; पादप कोशिका में उपस्थित — पर्णहरित के कारण हरा रंग व प्रकाश संश्लेषण में सहायक।
- रसधानी (Vacuole) — जंतु कोशिका में प्रायः अनुपस्थित या छोटी; पादप कोशिका में एक बड़ी केंद्रीय रसधानी उपस्थित — पदार्थों का संग्रहण, अपशिष्ट निष्कासन व दृढ़ता।
- लवक (प्लास्टिड) — जंतु कोशिका में अनुपस्थित; पादप कोशिका में उपस्थित (छड़ाकार संरचनाएँ)।
? परिभाषा: लवक (Plastids)
पौधे के सभी भागों की कोशिकाओं में पाई जाने वाली छड़ाकार संरचनाएँ। हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) में पर्णहरित होता है जो प्रकाश संश्लेषण में सहायता करता है; अहरित लवक पदार्थों के भंडारण में सहायक होते हैं।
? परिभाषा: रसधानी (Vacuole)
पादप कोशिका में पाया जाने वाला बड़ा खाली दिखने वाला स्थान, जो महत्वपूर्ण पदार्थों के संग्रहण, अपशिष्ट निष्कासन, कोशिका के आकार बनाए रखने तथा पौधे को दृढ़ता व अवलंब प्रदान करने में सहायता करता है।
2.1.1 कोशिकाओं के आकार और संरचना में विभिन्नता
कोशिका का विशिष्ट आकार, आमाप और संरचना उसे अपना विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है — अर्थात 'रचना कार्य से संबंधित होती है' (Structure is related to function)।
- पेशी कोशिका (Muscle cell): तर्कुरूपी (Spindle shaped), पतली व लचीली — संकुचन व शिथिलन द्वारा गति उत्पन्न करती है (जैसे भोजन नली में भोजन को आगे बढ़ाना)।
- तंत्रिका कोशिका / न्यूरॉन (Nerve cell): बहुत लंबी और शाखित — शरीर के विभिन्न भागों तक संदेश तीव्रता से पहुँचाती है।
- कपोल की कोशिका: पतली व चपटी — सुरक्षात्मक परत बनाती है।
2.2 सजीवों के शरीर में संगठन के स्तर
बहुकोशिकीय जीवों का शरीर सरल इकाइयों से मिलकर एक जटिल संरचना बनाता है — ठीक जैसे ईंटें मिलकर एक दीवार बनाती हैं।
कोशिका → ऊतक → अंग → अंग-तंत्र → जीव
- कोशिका (Cell): जीवन की मूल इकाई।
- ऊतक (Tissue): समान कोशिकाओं का समूह जो एक विशेष कार्य करता है।
- अंग (Organ): विभिन्न ऊतकों के मिलने से बनी संरचना (जैसे — आमाशय)।
- अंग-तंत्र (Organ System): कई अंगों के मिलने से बनी संरचना जो शरीर का प्रमुख कार्य करती है (जैसे — पाचन तंत्र)।
- जीव (Organism): सभी अंग-तंत्रों के मिलने से बना संपूर्ण सजीव।
? परिभाषा: बहुकोशिकीय जीव (Multicellular organism)
ऐसे जीव जिनका शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है — एक एकल कोशिका 'अंडे' से बार-बार विभाजित होकर पूर्ण जीव बनता है। उदाहरण — मानव सहित सभी जंतु व पौधे।
2.3 सूक्ष्मजीव क्या हैं?
? परिभाषा: सूक्ष्मजीव (Microorganism)
ऐसे छोटे जीव जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता, केवल सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है। ('सूक्ष्म' = बहुत छोटा, 'जीव' = जीवित प्राणी)। ये जल, मृदा, वायु और यहाँ तक कि हमारे शरीर के अंदर भी पाए जाते हैं।
▸ क्रियाकलाप 2.4 व 2.5 — तालाब जल व मृदा निलंबन का अवलोकन
? विधि व अवलोकन
तालाब के जल अथवा मृदा को जल में मिलाकर बने निलंबन की एक बूँद स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी से देखने पर अनेक छोटे गतिशील सूक्ष्मजीव (जैसे अमीबा, पैरामीशियम, शैवाल, कवक, जीवाणु) दिखाई देते हैं।
▸ सूक्ष्मजीवों के प्रकार
- प्रोटोजोआ: अमीबा, पैरामीशियम — एककोशिकीय, गतिशील।
- शैवाल (Algae): क्लोरेला, स्पाइरुलाइना — हरित वर्णक द्वारा स्वयं भोजन बनाते हैं।
- कवक (Fungi): यीस्ट, ब्रेड फफूँद, मशरूम — एककोशिकीय या बहुकोशिकीय, पर्णहरित रहित।
- जीवाणु (Bacteria): लैक्टोबैसिलस, राइजोबियम — एककोशिकीय, केंद्रक रहित (केंद्रकाभ)।
? परिभाषा: विषाणु (Virus)
सूक्ष्मदर्शीय और अकोशिकीय कण, जो केवल जीवित कोशिका में प्रवेश करने पर ही गुणन (प्रजनन) करते हैं। ये पौधों, जंतुओं अथवा जीवाणु कोशिकाओं को संक्रमित कर रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
2.4 सूक्ष्मजीव हमें कैसे प्रभावित करते हैं?
सूक्ष्मजीव सर्वत्र — जल, मृदा, वायु और खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं। इसीलिए भोजन कुछ समय बाहर रखने पर सूक्ष्मजीवों से संक्रमित होकर सड़ जाता है (जैसे नींबू, टमाटर, संतरा पर पाउडर/रुई जैसी वृद्धि)।
परंतु अचार व मुरब्बों में अधिक नमक अथवा चीनी मिलाई जाती है, जो 'परिरक्षक' (Preservative) का कार्य करती है — यह जीवाणुओं को पनपने नहीं देती।
2.4.1 पर्यावरण स्वच्छता में महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीव
▸ क्रियाकलाप 2.7 — खाद बनाना
? विधि व अवलोकन
फलों व सब्जियों के छिलकों को मृदा की परतों के साथ पात्र में रखकर 2–3 सप्ताह पश्चात देखने पर वे गहरे रंग की खाद में बदल जाते हैं। मिट्टी में उपस्थित कवक व जीवाणु पादप अपशिष्ट पर क्रिया करके इसे पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदल देते हैं — इसे 'विघटन' (Decomposition) कहते हैं।
? परिभाषा: विघटन (Decomposition)
सूक्ष्मजीवों द्वारा मृत जीवों व अपशिष्ट पदार्थों के जटिल पदार्थों को सरल पोषक तत्वों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया, जिससे पोषक तत्व पुनः मिट्टी में लौट आते हैं।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों, विशेषकर वेदों (अथर्ववेद) में 'कृमि' शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ विभिन्न सूक्ष्मजीव (दृश्य व अदृश्य दोनों) है।
▸ बायोगैस के स्रोत के रूप में सूक्ष्मजीव
कुछ जीवाणु ऑक्सीजन रहित वातावरण में पादप व जंतु अपशिष्ट को विघटित करने की क्षमता रखते हैं। इस प्रक्रिया में निर्मुक्त गैसों के मिश्रण (मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड व मीथेन) को 'बायोगैस' कहते हैं, जो खाना पकाने, तापन, बिजली उत्पादन व वाहन चलाने में ईंधन के रूप में उपयोग होती है।
▸ वैज्ञानिक परिचय — आनंद मोहन चक्रवर्ती (1938–2020)
वर्ष 1971 में उन्होंने एक विशेष जीवाणु विकसित किया जो तेल रिसाव को विघटित कर पर्यावरण स्वच्छ बनाने में सहायक था। वर्ष 1980 में उनकी खोज को पेटेंट प्राप्त हुआ — यह दर्शाता है कि प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग कैसे किया जा सकता है।
2.4.2 सूक्ष्मजीव और भोजन
▸ क्रियाकलाप 2.8 — खमीर (यीस्ट) और आटा
? विधि व अवलोकन
आटे में चीनी व चूर्णित खमीर मिलाकर गुनगुने पानी से गूँधकर गरम स्थान पर रखने पर (कटोरा 'क') 4–5 घंटे बाद आटा फूल कर ऊपर उठ जाता है, जबकि बिना खमीर वाला आटा (कटोरा 'ख') वैसा ही रहता है।
खमीर एक प्रकार का कवक है। यह श्वसन क्रिया द्वारा भोजन (चीनी) को विघटित करके ऊर्जा प्राप्त करता है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड गैस निर्मुक्त होती है — यही गैस बुलबुले बनाकर आटे को फुला देती है। इस प्रक्रिया में थोड़ी मात्रा में एल्कोहल भी बनती है। इसी गुण का उपयोग ब्रेड, केक आदि बनाने में होता है।
▸ क्रियाकलाप 2.9 — दही जमना
? विधि व अवलोकन
गुनगुने दूध (कटोरा 'क') और ठंडे दूध (कटोरा 'ख') में एक-एक चम्मच दही मिलाकर गरम व ठंडे स्थान पर रखने पर — कटोरा 'क' का दूध कुछ घंटों में दही में बदल कर खट्टा हो जाता है, जबकि कटोरा 'ख' का दूध दही में नहीं बदलता।
दही में उपस्थित लैक्टोबैसिलस जीवाणु दूध की शर्करा (लैक्टोज) से भोजन प्राप्त कर गुणन करता है और दूध को किण्वित करके दही बनाता है, जिसमें लैक्टिक अम्ल बनता है (जो खट्टापन देता है)। ये जीवाणु गरम स्थितियों में अच्छी तरह पनपते हैं।
? परिभाषा: किण्वन (Fermentation)
सूक्ष्मजीवों (जैसे यीस्ट, लैक्टोबैसिलस) द्वारा शर्करा को विघटित कर ऊर्जा, गैस (CO₂) व अन्य उत्पाद (एल्कोहल/अम्ल) बनाने की प्रक्रिया — जिसका उपयोग ब्रेड, इडली, डोसा, भटूरे व दही बनाने में होता है।
▸ राइजोबियम व मूल ग्रंथिकाएँ
सेम, मटर व मसूर जैसे फलीदार (दलहनी) पौधों की जड़ों में फूले हुए भाग होते हैं जिन्हें 'मूल ग्रंथिकाएँ' कहते हैं। इनमें राइजोबियम जीवाणु रहते हैं, जो वायु से नाइट्रोजन अवशोषित कर पौधों के लिए उपयोगी बनाते हैं — इससे मिट्टी की उर्वरता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
2.4.3 अद्भुत सूक्ष्म शैवाल
? परिभाषा: सूक्ष्म शैवाल (Micro-algae)
सूक्ष्मदर्शीय पौधे जैसे जीव, जो सूर्य के प्रकाश से स्वयं भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं — पृथ्वी की कुल ऑक्सीजन आपूर्ति का आधे से अधिक भाग इन्हीं से प्राप्त होता है।
उदाहरण: स्पाइरुलाइना, क्लोरेला, डायटम — इनका उपयोग स्वास्थ्य पूरक, दवाओं, जल शुद्धिकरण व जैव-ईंधन बनाने में किया जाता है। स्पाइरुलाइना विटामिन B12 का अच्छा स्रोत है और इसके शरीर के भार का 60% से अधिक भाग प्रोटीन होता है — इसीलिए इसे 'सुपरफूड' कहा जाता है।
2.5 कोशिका को जीवन की मूल इकाई क्यों माना जाता है?
- एककोशिकीय (Unicellular): जीवाणु, प्रोटोजोआ, यीस्ट — एक ही कोशिका में सभी जीवन-क्रियाएँ संपन्न होती हैं।
- बहुकोशिकीय (Multicellular): पौधे, जंतु, फफूँदी — अनेक कोशिकाएँ मिलकर कार्य करती हैं, एक-दूसरे से सहयोग करती हैं।
? परिभाषा: केंद्रकाभ (Nucleoid)
जीवाणु कोशिका में सुस्पष्ट केंद्रक व केंद्रकीय झिल्ली नहीं होती — इसके स्थान पर आनुवंशिक पदार्थ एक अनियमित क्षेत्र 'केंद्रकाभ' में रहता है। यही विशेषता जीवाणु को पौधों व जंतुओं की कोशिकाओं से अलग करती है।
कवक की कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के अतिरिक्त कोशिका भित्ति भी होती है परंतु उनमें हरित लवक नहीं होता, इसलिए वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं भोजन नहीं बना सकते।
एक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कोशिका को लगभग 10,00,000 गुना तक आवर्धित कर सकता है, जिससे कोशिका के भीतर की अधिक बारीक संरचनाएँ भी देखी जा सकती हैं।
⭐ स्मरणीय बिंदु (Key Points)
- सूक्ष्मजीव छोटे आकार के जीव हैं, जिन्हें सूक्ष्मदर्शी के बिना नहीं देखा जा सकता।
- सूक्ष्मजीव सभी प्रकार के वातावरणों में — यहाँ तक कि पौधों व जंतुओं के शरीर में भी — रह सकते हैं।
- जीवाणु व प्रोटोजोआ एककोशिकीय होते हैं; कवक एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय दोनों हो सकते हैं; पादप व जंतु बहुकोशिकीय होते हैं।
- कोशिका जीवन की मूलभूत इकाई है।
- सामान्य कोशिका में कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य व केंद्रक होते हैं। पादप, कवक व जीवाणु कोशिकाओं में अतिरिक्त कोशिका भित्ति होती है। जीवाणु में सुस्पष्ट केंद्रक नहीं होता।
- कोशिकाओं का आकार व आमाप उनके कार्य से संबंधित होता है।
- जीवाणु, कवक व प्रोटोजोआ — सूक्ष्मजीवों के प्रमुख प्रकार हैं।
- विषाणु आकार में छोटे परंतु अकोशिकीय होते हैं और केवल परपोषी जीव के भीतर ही प्रजनन करते हैं।
- सूक्ष्मजीव अपशिष्ट को सरल पदार्थों में विघटित कर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं।
- राइजोबियम जैसे जीवाणु फलीदार पौधों की मूल ग्रंथिकाओं में रहकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करते हैं।
- यीस्ट का उपयोग ब्रेड, केक बनाने में; लैक्टोबैसिलस का उपयोग दही जमाने व किण्वन में होता है।
? जिज्ञासा बनाए रखें — हल किए गए प्रश्न
- कोशिका के विभिन्न भागों को उपयुक्त स्थानों पर वर्गीकृत कीजिए — दिए गए भाग: केंद्रक, कोशिकाद्रव्य, हरित लवक, कोशिका भित्ति, कोशिका झिल्ली, केंद्रकाभ।
हल —
कोशिका झिल्ली: जंतु ✓, पादप ✓, जीवाणु ✓ (तीनों में समान)
कोशिकाद्रव्य: जंतु ✓, पादप ✓, जीवाणु ✓ (तीनों में समान)
केंद्रक: जंतु ✓, पादप ✓, जीवाणु ✗
केंद्रकाभ: जंतु ✗, पादप ✗, जीवाणु ✓ (केवल जीवाणु में)
हरित लवक: जंतु ✗, पादप ✓ (केवल पादप में), जीवाणु ✗
कोशिका भित्ति: जंतु ✗, पादप ✓, जीवाणु ✓
अर्थात — कोशिका झिल्ली व कोशिकाद्रव्य तीनों कोशिकाओं में समान होते हैं; हरित लवक केवल पादप कोशिका में; केंद्रकाभ केवल जीवाणु कोशिका में पाया जाता है; केंद्रक जंतु व पादप दोनों में होता है परंतु जीवाणु में नहीं। - आनंदी का प्रयोग — गुब्बारा फुलना
(i) सही उत्तर — (ग) यीस्ट ने परखनली 'ख' के भीतर एक गैस उत्पन्न की जिससे गुब्बारा फूल गया। स्पष्टीकरण: यीस्ट (खमीर) चीनी के घोल में श्वसन/किण्वन क्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करता है, जिससे गुब्बारा फूल जाता है।
(ii) आनंदी क्या जानना चाहती है — वह यह सिद्ध करना चाहती है कि गुब्बारे में भरी गैस वास्तव में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ही है। जब यह गैस चूने के पानी (Lime water) में प्रवाहित की जाती है और हिलाई जाती है, तो चूने का पानी दूधिया (मटमैला/Milky) हो जाता है — यह कार्बन डाइऑक्साइड की पुष्टि करने की मानक जाँच है। - गेहूँ व सेम के किसान — नाइट्रोजन उर्वरक
गेहूँ एक अदलहनी (गैर-फलीदार) फसल है, इसकी जड़ों में मूल ग्रंथिकाएँ नहीं होतीं, इसलिए किसान को अच्छी उपज के लिए बाहर से नाइट्रोजन युक्त रासायनिक उर्वरक डालना पड़ा।
सेम एक दलहनी (फलीदार) फसल है, जिसकी जड़ों में मूल ग्रंथिकाएँ होती हैं जिनमें राइजोबियम जीवाणु रहते हैं। ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्वयं स्थिर करके मिट्टी को समृद्ध बनाते हैं, इसलिए दूसरे किसान को अलग से नाइट्रोजन उर्वरक डालने की आवश्यकता नहीं पड़ी। - स्नेहल के दो गड्ढे — 'क' और 'ख'
स्नेहल यह जाँचने का प्रयास कर रही है कि सूखे पत्तों (कार्बन-समृद्ध शुष्क पदार्थ) को गीले रसोई अपशिष्ट (फल-सब्जियों के छिलके) के साथ मिलाने से विघटन (खाद बनने) की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है — अर्थात सूखे पत्तों की उपस्थिति में सूक्ष्मजीवों द्वारा अपशिष्ट कितनी तेज़ी और प्रभावी ढंग से खाद में बदलता है, गड्ढा 'ख' (बिना सूखे पत्तों के) की तुलना में। - सूक्ष्मजीवों की पहचान
(i) मैं प्रत्येक प्रकार के वातावरण में और आपकी आँत में रहता हूँ। → जीवाणु (Bacteria)
(ii) मैं पावरोटी और केक को मुलायम व फूला हुआ बनाता हूँ। → यीस्ट / खमीर (Yeast)
(iii) मैं दलहनी फसलों की जड़ों में रहता हूँ और पोषक तत्व प्रदान करता हूँ। → राइजोबियम (Rhizobium) - प्रयोग — सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए तापमान, वायु व नमी
उद्देश्य: यह जाँचना कि सूक्ष्मजीवों (जैसे फफूँद) की वृद्धि के लिए इष्टतम तापमान, वायु और नमी आवश्यक है या नहीं।
सामग्री: ब्रेड के 4 समान टुकड़े, 4 वायुरोधी/खुले पात्र, पानी, रेफ्रिजरेटर।
विधि (चार सेट, एक-एक चर बदलते हुए):
• सेट A (नियंत्रण): ब्रेड को थोड़ा नम करके, खुले पात्र में, कमरे के सामान्य तापमान (गरम/आर्द्र स्थान) पर रखें।
• सेट B (तापमान चर): ब्रेड को नम करके रेफ्रिजरेटर (ठंडे स्थान) में रखें।
• सेट C (नमी चर): सूखी ब्रेड को खुले पात्र में गरम स्थान पर रखें (नमी न डालें)।
• सेट D (वायु चर): नम ब्रेड को वायुरोधी (सील बंद) पात्र में गरम स्थान पर रखें।
सभी सेटों को 3–5 दिनों तक प्रतिदिन बिना छुए अवलोकन करें और फफूँद/वृद्धि की मात्रा नोट करें।
अपेक्षित निष्कर्ष: सेट A में सबसे अधिक फफूँद वृद्धि दिखेगी (गरम, नम व वायु — तीनों उपलब्ध)। सेट B, C व D में वृद्धि कम या नगण्य होगी — यह सिद्ध करता है कि सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए उपयुक्त तापमान, नमी और वायु तीनों आवश्यक हैं। - ब्रेड के 2 स्लाइस — सिंक के पास बनाम रेफ्रिजरेटर
अवलोकन: सिंक के पास (गरम व आर्द्र स्थान पर) रखी ब्रेड स्लाइस पर 3 दिन बाद फफूँद (रुई जैसी हरी/काली वृद्धि) स्पष्ट दिखाई देती है, जबकि रेफ्रिजरेटर में रखी ब्रेड स्लाइस पर बहुत कम अथवा कोई वृद्धि दिखाई नहीं देती।
कारण: सिंक के पास का वातावरण गरम व नमीयुक्त होता है, जो फफूँद (कवक) के बीजाणुओं के अंकुरण व वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थिति प्रदान करता है। रेफ्रिजरेटर का निम्न तापमान सूक्ष्मजीवों की उपापचय क्रियाओं व वृद्धि दर को धीमा कर देता है, जिससे ब्रेड अधिक समय तक ताज़ा रहती है। - दही का एक दिन बाहर रखने पर अधिक खट्टा होना
संभावित स्पष्टीकरण 1: दही में उपस्थित लैक्टोबैसिलस जीवाणु समय के साथ दूध की शर्करा (लैक्टोज) पर लगातार क्रिया करते रहते हैं और अधिक लैक्टिक अम्ल उत्पन्न करते हैं, जिससे दही और अधिक खट्टा हो जाता है।
संभावित स्पष्टीकरण 2: कमरे के गरम तापमान पर बाहर रखे जाने से जीवाणुओं की वृद्धि व गुणन दर तेज़ हो जाती है (जीवाणु गरम स्थितियों में अच्छी तरह पनपते हैं), जिससे कम समय में अधिक लैक्टिक अम्ल बनकर दही अधिक खट्टा हो जाता है। - चित्र 2.15 — यीस्ट व चूने के पानी का व्यवस्थापन
(फ्लास्क 'क' में चीनी का गुनगुना घोल + यीस्ट; एक नली द्वारा जुड़ी परखनली 'ख' में चूने का पानी है।)
(i) फ्लास्क 'क' में चीनी के घोल का क्या होता है? फ्लास्क 'क' में उपस्थित यीस्ट चीनी के घोल में श्वसन (किण्वन) क्रिया करता है — चीनी को विघटित कर ऊर्जा प्राप्त करता है, जिसके फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड गैस व थोड़ी मात्रा में एल्कोहल उत्पन्न होते हैं। घोल में बुलबुले बनते दिखाई देते हैं (झाग/किण्वन)।
(ii) चार घंटे पश्चात परखनली 'ख' में क्या दिखेगा? परखनली 'ख' में रखा चूने का पानी दूधिया (मटमैला) हो जाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फ्लास्क 'क' में यीस्ट द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड गैस नली के माध्यम से चूने के पानी में प्रवाहित होती है और उससे अभिक्रिया करके कैल्शियम कार्बोनेट का सफेद अवक्षेप बनाती है।
(iii) यदि फ्लास्क 'क' में यीस्ट न डाला जाए तो क्या होगा? यीस्ट के अभाव में किण्वन क्रिया नहीं होगी, कोई कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न नहीं होगी, और परिणामस्वरूप परखनली 'ख' में रखा चूने का पानी साफ़ (स्वच्छ) ही बना रहेगा — उसमें कोई परिवर्तन नहीं दिखेगा।
? खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें — संक्षिप्त बिंदु
- भारत में बायोगैस उत्पादन का लंबा इतिहास रहा है — सबसे पुराने संयंत्रों में से एक 1850 के दशक के अंत में स्थापित हुआ था। भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा बायोगैस कार्यक्रम चलाया जाता है।
- भारत के विभिन्न भागों में किण्वित सोयाबीन व बाँस के किण्वित प्ररोह जैसे पारंपरिक किण्वित खाद्य पदार्थ खाए जाते हैं — इनके पीछे उत्तरदायी सूक्ष्मजीवों व पोषण-महत्व की जानकारी एकत्र करें।
- आवर्धक काँच व सूक्ष्मदर्शी की सहायता से मशरूम (एक वृहत कवक) के विभिन्न भागों का अध्ययन किया जा सकता है।
- किसी स्थानीय उद्यमी से मशरूम की खेती के चरणों के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
? NCERT की मूल पाठ्यपुस्तक यहाँ से देखें: ncert.nic.in/textbook.php
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