Class 8 संस्कृत पाठ 4: प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः (दीपकम्)
कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" के चौथे पाठ "प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः" की कहानी (गोपबन्धु दास का जीवन), शब्दार्थ, पूर्वरूप संधि के नियम और सभी अभ्यास प्रश्नों के सरल हल।
कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" का चौथा पाठ "प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः" ओडिशा के महान समाजसेवी, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गोपबन्धु दास के जीवन पर आधारित है। इस लेख में पाठ की कहानी, शब्दार्थ, व्याकरण-बिंदु और सभी अभ्यास प्रश्नों के हल सरल भाषा में दिए गए हैं।
पाठ का उद्देश्य क्या है?
इस पाठ का उद्देश्य छात्रों को गोपबन्धु दास जैसे महापुरुष के जीवन से परिचित कराना है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, रोगियों और बाढ़-पीड़ितों की सेवा तथा देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। पाठ छात्रों को करुणा, त्याग, देशप्रेम और निःस्वार्थ सेवा का महत्व सिखाता है — साथ ही "पूर्वरूप संधि" जैसा महत्वपूर्ण व्याकरण-नियम भी सिखाया जाता है।
पाठ की शुरुआत — बाढ़ पर चर्चा
पाठ की शुरुआत एक कक्षा-चर्चा से होती है। आचार्य और छात्र ओडिशा के केन्द्रापड़ा ज़िले में महानदी में आई भयंकर बाढ़ पर बात करते हैं, जिसमें घर तबाह हो गए, लोग भूख और बीमारी से जूझ रहे हैं, और कई पालतू पशु भी बह गए। आचार्य बताते हैं कि ऐसे दुखी लोगों की सहायता करनी चाहिए, जैसे "उत्कलमणि" गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा करके आज भी लोगों का सम्मान पाया है। इसी प्रसंग से गोपबन्धु के जीवन की कहानी शुरू होती है।
कथा सरल शब्दों में
एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादी वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन पर बुलाया। सभी अतिथि हाथ-पैर धोकर बैठे और केले के पत्तों पर स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। हँसते हुए गोपबन्धु ने कहा कि भोजन बड़ी कठिनाई से मिलता है, इसलिए इसे प्रेम से खाना चाहिए। सब हँस ही रहे थे कि तभी बाहर से एक भूखे भिखारी बालक की करुण पुकार सुनाई दी, जिसने तीन दिन से कुछ नहीं खाया था। यह सुनकर गोपबन्धु का हृदय द्रवित हो गया और उनकी आँखों में आँसू आ गए। बिना कुछ सोचे उन्होंने अपने लिए परोसा गया भोजन उठाया और उस भूखे बालक को खिला दिया।
गोपबन्धु दास एक महान समाजसेवी, सत्यवादी वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध "पंचमित्रों" में से एक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म ओडिशा के पुरी जिले के सुआण्डो गाँव में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही वे गरीबों और रोगियों की सेवा करते थे। वे बिना फीस लिए छात्रों को पढ़ाते थे, निरक्षरता दूर करने का प्रयास करते थे, और स्वयं सूत कातकर स्वदेशी वस्त्र बनाते थे। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और दो वर्ष जेल में भी रहे।
जेल में रहते हुए उन्होंने ओड़िया भाषा में कई प्रेरणादायक पुस्तकें लिखीं। अपने मरणासन्न पुत्र को छोड़कर भी वे बाढ़-पीड़ितों की सेवा के लिए घर से निकल पड़े थे — यही उनके त्याग की सबसे बड़ी मिसाल है। वे सत्यवादी वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा संघ, सत्यवादी मुद्रणालय और "समाज" नामक प्रसिद्ध दैनिक समाचार-पत्र के संस्थापक भी थे, जो आज भी सौ वर्षों से प्रकाशित हो रहा है। उनके अपार त्याग को देखकर वैज्ञानिक प्रफुल्लचंद्र राय ने उन्हें "उत्कलमणि" (ओडिशा का रत्न) की उपाधि दी। यही कारण है कि यह देशभक्त महामना सदा प्रणाम के योग्य माना जाता है।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| जलप्लावः | बाढ़ |
| बुभुक्षितः | भूखा |
| दयाविगलितहृदयः | दया से पिघला हुआ हृदय |
| अश्रुपूर्णनयनः | आँसू भरी आँखों वाला |
| करुणध्वनिः | करुणा भरी आवाज़ |
| निःशुल्कम् | बिना फीस के |
| स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी | स्वतंत्रता सेनानी |
| कारावासः | जेल में रहना |
| मरणासन्नः | मृत्यु के निकट |
| उत्कलमणिः | ओडिशा का रत्न (उपाधि) |
| लोकसेवकः | समाजसेवक |
| महामनाः | उच्च विचारों वाला |
व्याकरण: पूर्वरूप संधि
जब किसी शब्द के अंत में "ए" या "ओ" स्वर हो, और उसके ठीक बाद वाले शब्द का पहला अक्षर "अ" हो, तो दोनों के मिलने पर पहले वाला स्वर ("ए"/"ओ") ही रहता है और "अ" के स्थान पर ऽ (अवग्रह चिह्न) लगा दिया जाता है। इसे पूर्वरूप संधि कहते हैं।
| मूल शब्द | संधि रूप |
|---|---|
| देशभक्तः + अयम् | देशभक्तोऽयम् |
| सर्वे + अपि | सर्वेऽपि |
| पशवः + अपि | पशवोऽपि |
| बुभुक्षितः + अस्मि | बुभुक्षितोऽस्मि |
| अश्रुपूर्णनयनः + अभवत् | अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सभी प्रश्नों के हल
प्रश्न 1: एकपदेन उत्तरं लिखत
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः? | गोपबन्धुः |
| गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान्? | भिक्षुकाय |
| मरणासन्नः कः आसीत्? | स्वपुत्रः |
| गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत्? | उत्कलमणिः |
| गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान्? | वर्षद्वयम् |
प्रश्न 2: पूर्णवाक्येन (एकवाक्येन) उत्तरं लिखत
- बहिः भिक्षुकस्य करुणध्वनिं श्रुत्वा दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत्।
- मरणासन्नं स्वपुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्।
- समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभूय वैज्ञानिकः प्रफुल्लचन्द्ररायः तस्मै उत्कलमणिः इति उपाधिं दत्तवान्।
- गोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्।
- गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्।
प्रश्न 3: दिए गए पदों से वाक्य बनाइए
| पद | वाक्य |
|---|---|
| सेवाम् | सः दरिद्राणां रोगिणां च सेवाम् अकरोत्। |
| सुस्वादूनि | अतिथये सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि। |
| सहायताम् | अस्माभिः दुःखितानां सहायताम् अवश्यं करणीया। |
| स्वदेशवस्त्राणि | देशभक्ताः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि धारयन्ति। |
| अन्यतमः | गोपबन्धुः पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत्। |
प्रश्न 4: श्लोक-पूर्ति करें
गोपबन्धु के प्रसिद्ध देशभक्ति-श्लोक की पंक्तियाँ: स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु। स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका, ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥ — अर्थात मेरा शरीर स्वदेश की मिट्टी में मिल जाए, देशवासी मेरे पीछे चलें, और स्वराज्य के मार्ग में जो गड्ढे हों, वे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।
प्रश्न 5: क्रियापद को स्त्रीलिंग में बदलिए
| पुल्लिंग | स्त्रीलिंग |
|---|---|
| प्राप्तवान् | प्राप्तवती |
| उपविष्टवान् | उपविष्टवती |
| भुक्तवान् | भुक्तवती |
| कृतवान् | कृतवती |
| गृहीतवान् | गृहीतवती |
प्रश्न 6: स्तम्भ-मेलन
| पद | सही जोड़ी |
|---|---|
| समाजः | दिनपत्रिका |
| उत्कलमणिः | गोपबन्धुः |
| आँ आँ ... इति | क्रन्दनध्वनिः |
| सुस्वादूनि | व्यञ्जनानि |
प्रश्न 7: घटनाक्रम के अनुसार वाक्य सजाइए
- अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः।
- दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् (भिक्षुकः क्रन्दति स्म)।
- गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत्।
- भिक्षुकं च तद्भोजितवान्।
- प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
योग्यताविस्तरः — गोपबन्धु दास का जीवन-परिचय
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 9 अक्टूबर 1877, सुआण्डो गाँव, पुरी, ओडिशा |
| माता-पिता | दैत्यारि दास (पिता), स्वर्णमयी देवी (माता) |
| सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना | 1909 — भारत का पहला मुक्त (निःशुल्क) विद्यालय |
| "समाज" पत्रिका का प्रकाशन | 1919 से आज तक निरंतर |
| "उत्कलमणि" उपाधि | 1924 में प्रफुल्लचंद्र राय द्वारा प्रदत्त |
| निधन | 17 जून 1928, साक्षीगोपाल |
परियोजनाकार्यम्
- अपने प्रदेश के किसी एक स्वतंत्रता सेनानी की सचित्र संक्षिप्त जीवनी लिखें।
- बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए अपनी ओर से एक कार्ययोजना (कैसे मदद करेंगे) बनाकर लिखें।
परीक्षा हेतु त्वरित सुझाव
- गोपबन्धु के जीवन की मुख्य घटनाएँ (भोजन वाला प्रसंग, बाढ़-सेवा, जेल-यात्रा, उपाधि) क्रम से याद रखें।
- देशभक्ति-श्लोक "स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः..." अर्थ सहित कंठस्थ करें।
- पूर्वरूप संधि के पाँच उदाहरण अलग से नोट कर बार-बार दोहराएँ।
- जीवन-परिचय की तिथियाँ (जन्म, विद्यालय-स्थापना, उपाधि, निधन) एक तालिका बनाकर याद करें।
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