NCERT कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान अध्याय 5: 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज (State and Society up to 1000 CE) व्याख्या और नोट्स

कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान (NCERT) के अध्याय 5 'State and Society up to 1000 CE' के सरल हिंदी नोट्स। इसमें वैदिक काल से लेकर चोल साम्राज्य तक के प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था की संक्षिप्त व्याख्या दी गई है।

Jul 24, 2026 - 16:13
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NCERT Class 9 Social Science Chapter 5 State and Society up to 1000 CE Hindi Notes
एक शैक्षणिक इन्फोग्राफिक या चित्र जिसमें प्राचीन भारतीय साम्राज्यों (जैसे मौर्य, गुप्त और चोल) का मानचित्र, कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत के सात अंग और चोल काल की लोकतांत्रिक 'कुडवोलई' चुनाव प्रणाली को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया गया है।

NCERT की नई किताब "Understanding Society: India and Beyond – Part 1" का अध्याय 5 — State and Society up to 1000 CE (1000 ईस्वी तक राज्य और समाज) कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान का सबसे विस्तृत इतिहास अध्याय है। इसमें वैदिक काल की कबीलाई व्यवस्था से लेकर मौर्य, गुप्त और चोल साम्राज्यों तक की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक यात्रा को समझाया गया है। इस पृष्ठ पर पूरे अध्याय की सरल हिंदी में गहराई से व्याख्या दी गई है।

विवरण जानकारी
कक्षा 9
अध्याय 5 — State and Society up to 1000 CE
पाठ्यपुस्तक Understanding Society: India and Beyond – Part 1 (NCERT)
समय-सीमा वैदिक काल (लगभग 2000 BCE) से लेकर चोल साम्राज्य (लगभग 1000 CE)
मुख्य विषय राज्य, प्रशासन, वर्ण-जाति, महिलाओं की भूमिका, अर्थव्यवस्था, शिक्षा
परीक्षा महत्व प्रशासनिक ढांचा व अवधारणाएं 3–5 अंक

वैदिक काल — राज्य और समाज की शुरुआत

प्रारंभिक वैदिक समाज जनों (janas) यानी कबीलों में बंटा था, जो रक्त-संबंध (kinship) पर आधारित थे। ऋग्वेद में लगभग तीस जनों का उल्लेख मिलता है, जिनमें यदु, तुर्वश, पुरु, अनु और द्रुह्यु — इन पांच को मिलाकर पंचजन कहा जाता था। इसी दौर में 'भरत' नाम पहली बार ऋग्वेद में आता है, जो भरत कुल द्वारा शासित जन के लिए प्रयुक्त हुआ। उस समय रजा (rājā) मुख्यतः कबीले का मुखिया होता था, जो युद्ध में नेतृत्व करता और सदस्यों की रक्षा करता था।

राजा की शक्ति असीमित नहीं थी — तीन सभाएं उसकी शक्ति को संतुलित करती थीं।

सभा कार्य
सभा (Sabhā) छोटी संस्था, मुख्यतः न्यायिक कार्य, चुनिंदा कुलीन सदस्य
समिति (Samiti) बड़ी संस्था, नीति व राजनीतिक मामलों पर निर्णय, व्यापक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व
विधाता (Vidhata) सामान्य जन-समूह, युद्ध व राजनीतिक विषयों पर चर्चा का मंच

जनपद से महाजनपद तक

लगभग 1000 से 600 ईसा पूर्व के बीच कबीलाई पहचान धीरे-धीरे भूमि-आधारित पहचान में बदल गई। इसी प्रक्रिया से जनपद (जहां जन ने पहला कदम रखा) बने, और आगे चलकर 600 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच महाजनपद उभरे। इतिहास में कुल सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, जिनमें बिहार में स्थित मगध उपजाऊ मैदानों और मज़बूत शासकों के कारण सबसे शक्तिशाली बनकर उभरा और आगे चलकर मौर्य साम्राज्य की नींव बना। उत्तर भारत में इस दौर की राजनीतिक व्यवस्था दो रूपों में थी — राजतंत्र (rājyas) और गणराज्य (gaṇas या saṁghas)। दक्षिण भारत में तमिलकम के चोल, पांड्य, चेर और सतियपुत्र राज्य फल-फूल रहे थे, जिनका ज़िक्र अशोक के अभिलेखों में भी मिलता है।

चक्रवर्ती सम्राट और अखिल-भारतीय राजनीतिक कल्पना

प्राचीन भारतीय शासकों की राजनीतिक कल्पना केवल अपने राज्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप तक फैली थी — इसे जम्बूद्वीप, भारतवर्ष, अश्वमेध यज्ञ और चक्रवर्ती क्षेत्र जैसे शब्दों से व्यक्त किया गया। अर्थशास्त्र में पृथ्वी को "हिमालय और समुद्र के बीच का क्षेत्र" बताया गया है, जिसे चक्रवर्ती क्षेत्र भी कहा गया। 11वीं सदी में चोल शासक राजेंद्र प्रथम ने गंगा तट तक विजय पाने पर गंगईकोंड की उपाधि धारण की — यह उसी अखिल-भारतीय राजनीतिक आदर्श की निरंतरता दिखाता है।

कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत

राज्य को कौटिल्य ने एक जैविक इकाई माना, जो सात अंगों (सप्तांग) से मिलकर बनती है। यह सिद्धांत बताता है कि इनमें से कोई भी अंग कमज़ोर हो तो शासन प्रभावित होता है।

अंग अर्थ
स्वामी राजा
अमात्य मंत्री व उच्च अधिकारी
जनपद राज्य क्षेत्र व वहां की जनसंख्या
दुर्ग किलाबंद नगर
कोष राजकोष
दंड सेना व कानून-व्यवस्था बल
मित्र मित्र राज्य

राजा अकेले शासन नहीं करता था, बल्कि मंत्री-परिषद की सलाह से काम करता था, जिसमें कोषाध्यक्ष, मुख्य कर-संग्राहक, मुख्य विधि सलाहकार और सेनापति शामिल होते थे। अशोक के एक अभिलेख से पता चलता है कि सम्राट की अनुपस्थिति में मंत्री-परिषद स्वतंत्र रूप से जनहित में निर्णय ले सकती थी।

साम्राज्यों का प्रशासन — केंद्र से गांव तक

मौर्य, गुप्त, पल्लव, चालुक्य और चोल — सभी साम्राज्यों में राज्य को प्रांत, ज़िले और गांवों में बांटा जाता था। लगभग 300 से 800 ईस्वी के बीच सत्ता के विकेंद्रीकरण का दौर रहा। उत्तर भारत में प्रांतों को भुक्ति और दक्षिण में मंडलम कहा जाता था, जबकि सबसे छोटी इकाई हमेशा गांव ही रहती थी।

चोल साम्राज्य की ग्राम-सभाओं की स्वायत्तता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित उत्तरमेरूर अभिलेख (10वीं सदी, राजा परांतक प्रथम के काल का) ग्राम-चुनाव की कुडवोलई (मतपत्र-घट) प्रणाली का वर्णन करता है, जिसमें योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़-पत्रों पर लिखकर घड़े में डाले जाते और एक बालक द्वारा सार्वजनिक रूप से निकाले जाते थे। पल्लव शासकों ने गांवों को कर-मुक्त भूमि अनुदान दिए, जिन्हें ब्रह्मदेय गांव कहा गया, जबकि चालुक्यों ने ब्राह्मण बस्तियों को अग्रहारम नाम से भूमि दी।

वर्ण और जाति — व्यवस्था कैसे बदली

प्रारंभिक वैदिक काल में सामाजिक पहचान जन्म पर नहीं, बल्कि व्यवसाय, क्षेत्र, गोत्र और भाषा जैसे कई कारकों पर आधारित थी। ऋग्वेद की एक प्रसिद्ध ऋचा में एक ऋषि कहते हैं कि वे स्वयं कवि हैं, उनके पिता वैद्य और माता अनाज पीसने का काम करती हैं — यह दिखाता है कि उस दौर में व्यवसाय जन्म से बंधे नहीं थे। पुरुषसूक्त (ऋग्वेद, मंडल 10) में सबसे पहले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — इन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, जो शुरुआत में कार्य-आधारित विभाजन था।

समय के साथ अंतर्विवाह, प्रवासी समुदायों के अंतर्विवाही (endogamous) बनने और क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण जाति व्यवस्था उभरी। वर्णों की संख्या चार तक सीमित रही, पर जातियों की संख्या लगातार बढ़ती गई। मौर्य, शुंग, सातवाहन और गुप्त जैसे कई राजवंश विविध सामाजिक पृष्ठभूमि से आए, जो सामाजिक गतिशीलता का प्रमाण है।

महिलाओं की भूमिका

वैदिक काल में महिलाएं सभा जैसी संस्थाओं में भाग लेती थीं और अपाला, विश्ववारा, घोषा व लोपामुद्रा जैसी ऋषिकाओं ने ऋग्वेद के कई सूक्तों की रचना की। गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त ने वाकाटक राज्य में स्वयं के नाम से भूमि-अनुदान जारी किए। चोल काल में सेम्बियन महादेवी जैसी महिलाओं ने मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया। संगम साहित्य में महिलाओं को खेती, पशुपालन, कताई और नमक उत्पादन जैसे कार्यों में सक्रिय दिखाया गया है।

अर्थव्यवस्था — कृषि, सिंचाई और व्यापार

भूमि पर आधारित कर आमतौर पर उपज का छठा हिस्सा (1/6) होता था। सिंचाई के लिए बांध और जलाशय बनाए गए — जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के गवर्नर पुष्यगुप्त ने गुजरात में सुदर्शन झील पर बांध बनवाया था, जिसकी मरम्मत बाद में रुद्रदामन प्रथम और स्कंदगुप्त ने भी करवाई। चोल शासक करिकाल द्वारा बनवाया गया ग्रांड एनिकट (कल्लनई) बांध आज भी उपयोग में है।

व्यापार के लिए दक्षिणापथ और उत्तरापथ नामक दो प्रमुख मार्ग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक विकसित हो चुके थे। मुज़िरिस, कावेरीपट्टिनम और अरिकमेडु जैसे बंदरगाह रोम तक व्यापार जोड़ते थे। व्यापारियों और शिल्पकारों के संगठन श्रेणियां (guilds) बैंकिंग और साख का भी काम करती थीं — नासिक गुफा अभिलेख के अनुसार श्रेणियां जमा राशि पर तय ब्याज देती थीं, जिससे बौद्ध विहारों का रखरखाव होता था।

शिक्षा और गुरुकुल परंपरा

प्राचीन भारत में शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य, इंद्रिय-नियंत्रण और सभी प्राणियों के प्रति आदर जैसे मूल्यों की समग्र शिक्षा थी। छात्र वेदों के साथ-साथ व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, चिकित्सा और खगोलशास्त्र भी सीखते थे। गुरु-शिष्य परंपरा को पवित्र माना जाता था, और गुरुकुल में छात्र गुरु के परिवार के सदस्य जैसे रहते थे। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे केंद्र देश-विदेश से छात्रों को आकर्षित करने वाले प्रमुख शिक्षा केंद्र बन गए।

अध्याय 5 सारांश — त्वरित दोहराई

अवधारणा मुख्य बात
जन से जनपद कबीलाई पहचान से भूमि-आधारित पहचान (1000–600 BCE)
16 महाजनपद मगध सबसे शक्तिशाली, मौर्य साम्राज्य की नींव
सप्तांग सिद्धांत स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र
प्रशासन स्तर प्रांत (भुक्ति/मंडलम) → ज़िला → गांव
उत्तरमेरूर अभिलेख कुडवोलई मतपत्र प्रणाली से ग्राम-चुनाव
वर्ण से जाति चार वर्ण स्थिर, जातियों की संख्या बढ़ती गई
व्यापार मार्ग दक्षिणापथ, उत्तरापथ
शिक्षा केंद्र तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: जनपद और महाजनपद में क्या अंतर है?

जनपद भूमि-आधारित छोटी राजनीतिक इकाई थी, जबकि महाजनपद इससे बड़ी और अधिक जटिल प्रशासनिक व्यवस्था वाली इकाई थी। कुल सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।

प्रश्न: कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत क्या बताता है?

यह सिद्धांत राज्य को सात परस्पर-जुड़े अंगों — राजा, मंत्री, राज्यक्षेत्र, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र-राष्ट्र — का संगठित ढांचा मानता है।

प्रश्न: उत्तरमेरूर अभिलेख किस बारे में है?

यह चोल काल का 10वीं सदी का अभिलेख है, जो कुडवोलई (मतपत्र-घट) प्रणाली से ग्राम-सभा चुनाव की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण देता है।

प्रश्न: वर्ण और जाति में क्या अंतर था?

वर्ण चार तक सीमित एक कार्य-आधारित वर्गीकरण था, जबकि जाति अंतर्विवाह और क्षेत्रीय कारकों से उभरी और इसकी संख्या लगातार बढ़ती गई।

NCERT कक्षा 9वीं के अन्य अध्यायों के लिए हमारा मुख्य पेज देखें।

Frequently Asked Questions

श्रेणियां व्यापारियों और शिल्पकारों के संगठन थे। ये न केवल व्यापार और उत्पादन का संचालन करती थीं, बल्कि बैंक की तरह जमा राशि पर ब्याज देने और ऋण देने का कार्य भी करती थीं।

ऋग्वेद में उल्लेखित पांच प्रमुख कबीलों (जनों) के समूह को 'पंचजन' कहा जाता था। इनमें यदु, तुर्वश, पुरु, अनु और द्रुह्यु शामिल थे।

पल्लव शासकों द्वारा ब्राह्मणों को दिए गए कर-मुक्त भूमि अनुदानों को 'ब्रह्मदेय' कहा जाता था, जबकि चालुक्य शासकों द्वारा दी गई ब्राह्मण बस्तियों को 'अग्रहारम' कहा जाता था।

ये दोनों संस्थाएं राजा की शक्ति को संतुलित और नियंत्रित करती थीं। 'सभा' समाज के कुलीन व बुजुर्ग लोगों की छोटी संस्था थी जो मुख्यतः न्यायिक कार्य करती थी, जबकि 'समिति' आम जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली बड़ी संस्था थी जो नीतिगत फैसले लेती थी।
Naina Saini

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