Class 8 संस्कृत पाठ 5: गीता सुगीता कर्तव्या (दीपकम्)

कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" के पांचवें पाठ "गीता सुगीता कर्तव्या" के सभी आठ श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, व्याकरण नियम और अभ्यास प्रश्नों के हल।

Aug 22, 2026 - 11:30
Updated: 18 hours ago
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कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" का पाँचवाँ पाठ "गीता सुगीता कर्तव्या" श्रीमद्भगवद्गीता के आठ प्रेरणादायक श्लोकों का संकलन है। इस लेख में पाठ की भूमिका, सभी आठ श्लोकों का सरल अर्थ, शब्दार्थ, व्याकरण-बिंदु और सभी अभ्यास प्रश्नों के हल आसान भाषा में दिए गए हैं।

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पाठ का उद्देश्य क्या है?

इस पाठ का उद्देश्य छात्रों को श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व और उसके कुछ प्रमुख उपदेशों से परिचित कराना है। शीर्षक का अर्थ है — "गीता को अच्छी तरह गाना/पढ़ना चाहिए, फिर अन्य शास्त्रों के विस्तार की क्या आवश्यकता?" पाठ के माध्यम से छात्र सीखते हैं कि क्रोध कैसे विनाश की ओर ले जाता है, स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसा होता है, सच्चा ज्ञान कैसे मिलता है, और सत्य-प्रिय-हितकारी वचन बोलना ही सबसे बड़ा तप है।

पाठ की शुरुआत — गीता जयंती और पिता-पुत्र संवाद

कुरुक्षेत्र में गीता जयंती महोत्सव मनाया जा रहा है। रमेश नाम का बालक अपने पिता के साथ वहाँ जाता है। कथावाचक गीता की महिमा बताते हुए कहते हैं कि "गीता को अच्छी तरह गाना चाहिए, जो स्वयं भगवान विष्णु के मुखकमल से निकली है।" यह सुनकर रमेश पिता से पूछता है कि गीता क्या है। पिता समझाते हैं कि महाभारत युद्ध में जब अर्जुन अपने ही परिजनों को देखकर युद्ध से विमुख हो गया था, तब श्रीकृष्ण ने उसे कर्तव्य-पालन का जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है — जिसमें अमृत के समान उपदेश भरे हैं। "गीता को अच्छी तरह पढ़ना" का अर्थ है उसका सही ढंग से अभ्यास करना और उसके उपदेशों को जीवन में उतारना।

आठों श्लोक और सरल अर्थ

श्लोक सरल भावार्थ
1. दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
जो दुःख में विचलित नहीं होता, सुख में लालसा नहीं रखता, और राग, भय व क्रोध से मुक्त है — ऐसा व्यक्ति ही "स्थितधी" (स्थिर बुद्धि वाला मुनि) कहलाता है।
2. क्रोधादभवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
क्रोध से मोह (भ्रम) पैदा होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है।
3. तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
उस ज्ञान को गुरु के आगे नतमस्तक होकर, बार-बार प्रश्न पूछकर और सेवा करके प्राप्त करो — तत्वदर्शी ज्ञानी गुरु तुम्हें वह ज्ञान अवश्य देंगे।
4. श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
जो श्रद्धावान, समर्पित और इंद्रियों को वश में रखने वाला होता है, वही ज्ञान पाता है — और ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त कर लेता है।
5. अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
जो किसी से द्वेष नहीं रखता, सबसे मित्रता और करुणा रखता है, ममता व अहंकार से मुक्त है, सुख-दुःख में समान रहता है और क्षमाशील है — वही ईश्वर का प्रिय भक्त है।
6. सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
जो सदा संतुष्ट, आत्मसंयमी और दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसने अपना मन-बुद्धि ईश्वर को समर्पित कर दिया है — वही सच्चा भक्त प्रिय है।
7. यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
जिससे कोई व्याकुल नहीं होता और जो स्वयं भी संसार से व्याकुल नहीं होता, और जो हर्ष, क्रोध, भय व चिंता से मुक्त है — वह भी ईश्वर को प्रिय है।
8. अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
जो वचन किसी को व्याकुल न करे, सत्य हो, प्रिय और हितकारी हो — तथा शास्त्रों का स्वाध्याय और अभ्यास — इसे ही "वाणी का तप" (वाङ्मय तप) कहा गया है।

महत्वपूर्ण शब्दार्थ

संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
अनुद्विग्नमनाः अविचलित मन वाला
विगतस्पृहः इच्छारहित
सम्मोहः भ्रम, मोह
स्मृतिविभ्रमः स्मरणशक्ति का भ्रमित होना
प्रणिपातेन नतमस्तक होकर, विनम्रता से
संयतेन्द्रियः संयमित इंद्रियों वाला
अद्वेष्टा द्वेष न करने वाला
निरहङ्कारः अहंकाररहित
दृढनिश्चयः दृढ़ निश्चय वाला
उद्वेगः व्याकुलता, बेचैनी
वाङ्मयं तपः वाणी का तप

व्याकरण: अत्र इदम् अवधेयम्

सप्तमी विभक्ति (आधार अर्थ में): जब किसी क्रिया का आधार बताना हो, तो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है — जैसे "दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत्" (दुखों में विचलित न हो), "सुखेषु विगतस्पृहः भवेत्" (सुखों में इच्छारहित हो)।

पञ्चमी विभक्ति (उत्पत्ति/कारण अर्थ में): जब किसी बात के कारण या उत्पत्ति को बताना हो, तो पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है — जैसे "क्रोधात् सम्मोहः भवति" (क्रोध से मोह होता है), "सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति" (मोह से स्मृति-भ्रम होता है), "स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति" (स्मृति-नाश से बुद्धि-नाश होता है)।

अभ्यास प्रश्नों के हल

प्रश्न 1: एकपदेन उत्तरं लिखत

प्रश्न उत्तर
श्रद्धावान् जनः किं लभते? ज्ञानम्
कस्मात् सम्मोहः जायते? क्रोधात्
सम्मोहात् किं जायते? स्मृतिविभ्रमः
अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान्? श्रीकृष्णः
हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति? परमेश्वरस्य

प्रश्न 2: पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत

  • अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियं हितकारि, स्वाध्यायम्, अभ्यसनं चैव वाङ्मयं तपः उच्यते।
  • वीतराग-भय-क्रोध-रहितः स्थितधीः उच्यते।
  • जनः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
  • संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् मनुष्यः ज्ञानं लब्ध्वा उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति।
  • प्रणिपातं, परिप्रश्नं, सेवां च — इति त्रयः उपायाः उपदेशप्राप्तये भवन्ति।

प्रश्न 3: दिए गए पदों से वाक्य/रिक्तस्थान पूर्ति

अपूर्ण वाक्य सही शब्द
अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं ______ तपः उच्यते। वाङ्मयं
सततं सन्तुष्टः दृढनिश्चयः च ______ भवति। स्थितधीः
अनुद्विग्नमनाः मुनिः ______ उच्यते। योगी
तद् आत्मज्ञानं प्रणिपातेन परिप्रश्नेन ______ च विद्धि। सेवया
सम्मोहात् ______ भवति। स्मृतिविभ्रमः

प्रश्न 4: श्लोक-पूर्ति करें

अपूर्ण पंक्ति सही शब्द
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः ______। संयतेन्द्रियः
______ चैव वाङ्मयं तपः उच्यते। स्वाध्यायाभ्यसनं
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा ______। दृढनिश्चयः
______ भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। क्रोधात्
तद्विद्धि ______ परिप्रश्नेन सेवया। प्रणिपातेन

प्रश्न 5: पदों को स्त्रीलिंग में बदलिए

पुल्लिंग स्त्रीलिंग
गुणवान् गुणवती
आयुष्मान् आयुष्मती
क्षमावान् क्षमावती
ज्ञानवान् ज्ञानवती
श्रीमान् श्रीमती

प्रश्न 6: स्तम्भ-मेलन

पद सही अर्थ
सर्वभूतानाम् सर्वेषां प्राणिनाम् (सभी प्राणियों का)
अनुद्विग्नमनाः यस्य मनः विचलितं न भवति
स्थितधीः स्थिरमतिमान् (स्थिर बुद्धि वाला)
परिप्रश्नेन पुनः पुनः प्रश्नकरणेन
संयतेन्द्रियः इन्द्रियसंयमी

प्रश्न 7: श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में पाँच वाक्य

  • श्रीमद्भगवद्गीता महाभारतस्य भीष्मपर्वणः अंशः अस्ति।
  • गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं च श्लोकाः सन्ति।
  • युद्धकाले श्रीकृष्णः मोहग्रस्तं अर्जुनं यत् उपादिशत् तत् एव गीतायां निबद्धम्।
  • अस्याः उपदेशाः सार्वकालिकाः सार्वभौमिकाः च सन्ति।
  • गीतायां जीवन-मूल्य-सम्बद्धानाम् उपदेशानां सुन्दरं संकलनम् अस्ति।

परीक्षा हेतु त्वरित सुझाव

  • आठों श्लोक अर्थ सहित कंठस्थ करें — व्याख्या और भावार्थ दोनों तरह के प्रश्न आते हैं।
  • क्रोध → सम्मोह → स्मृतिभ्रंश → बुद्धिनाश → विनाश की शृंखला ज़रूर याद रखें, यह बार-बार पूछी जाती है।
  • सप्तमी और पञ्चमी विभक्ति के प्रयोग वाले उदाहरण अलग नोट करें।
  • "स्थितधीः", "योगी", "मद्भक्तः" जैसे गुणों की सूची (दुःख में अविचलित, क्रोधरहित, संतुष्ट आदि) एक तालिका बनाकर याद करें।

Naina Saini

"Naina Saini is an Editorial Intern at Aapbiti, specializing in publishing and managing education-focused news articles. Operating under the direct mentorship and guidance of Shakti Rao Mani, the Product Owner of aapbiti.com, Naina is dedicated to delivering accurate, timely, and engaging academic updates. Her role focuses on keeping readers informed about educational trends, exams, admissions, and key academic policies."

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