Class 8 संस्कृत पाठ 2: अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (दीपकम्)
कक्षा 8 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक "दीपकम्" के द्वितीय पाठ "अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका" की पूरी कहानी, श्लोक अर्थ, व्याकरण नियम (ल्यप् प्रत्यय और विसर्ग संधि) और सभी अभ्यास प्रश्नों के सरल समाधान।
कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" का दूसरा पाठ "अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका" हितोपदेश के मित्रलाभ प्रकरण पर आधारित है। इस लेख में पाठ की पूरी कहानी, दोनों श्लोकों का अर्थ, व्याकरण के नियम और पुस्तक में दिए गए सभी अभ्यास प्रश्नों के हल बहुत सरल भाषा में दिए गए हैं, ताकि छात्र परीक्षा की तैयारी आसानी से कर सकें।
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पाठ का उद्देश्य क्या है?
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य छात्रों को यह सिखाना है कि एकजुटता (संहति) में कितनी शक्ति होती है — छोटे से छोटा प्राणी या वस्तु भी जब साथ मिलकर काम करती है, तो बड़ी से बड़ी विपत्ति भी टल जाती है। साथ ही पाठ यह भी सिखाता है कि संकट के समय घबराने के बजाय धैर्य रखना चाहिए, और जो हमारी शरण में आया है उसकी रक्षा सबसे पहले करनी चाहिए। कहानी के साथ-साथ छात्र ल्यप् प्रत्यय, विसर्ग संधि और समास जैसे व्याकरण के महत्वपूर्ण नियम भी सीखते हैं।
कथा सरल शब्दों में
कुछ मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखंड के केदार क्षेत्र की ओर घूमने जाते हैं। रास्ते में अचानक तेज़ बारिश होती है, पुल टूट जाता है और पहाड़ खिसकने लगता है। सब लोग डरकर ऊँची आवाज़ में ईश्वर से प्रार्थना करने लगते हैं। तभी समूह का नायक सबको धैर्य बंधाता है और कहता है कि आत्मविश्वास से असंभव कार्य भी पूरा हो सकता है। इसी बात को समझाने के लिए वह हितोपदेश की एक पुरानी कहानी सुनाता है।
चित्रग्रीव नाम का एक कबूतरों का राजा अपने साथियों के साथ उड़ते हुए एक सुनसान जंगल में पहुँचता है। वहाँ ज़मीन पर बिखरे चावल के दाने देखकर चित्रग्रीव को शक होता है कि सुनसान जंगल में दाने कहाँ से आए, पर भूखे साथी दाने चुगने उतर जाते हैं और एक शिकारी (व्याध) के बिछाए जाल में फँस जाते हैं। चित्रग्रीव तुरंत आदेश देता है कि सब कबूतर एक साथ, एक मन होकर जाल समेत ही उड़ जाएँ — क्योंकि संकट में घबरा कर रुक जाना कायरता की निशानी है।
सारे कबूतर जाल सहित उड़कर गंडकी नदी के किनारे रहने वाले अपने मित्र हिरण्यक (चूहों के राजा) के पास पहुँचते हैं। हिरण्यक सबसे पहले उन कबूतरों के बंधन काटता है जो उसकी शरण में आए हैं, और सबसे अंत में अपने घनिष्ठ मित्र चित्रग्रीव को मुक्त करता है — क्योंकि शरणागत की रक्षा पहले करना ही सही आचरण है। इसी घटना से नीतिवचन निकलता है कि छोटी वस्तुओं की एकता भी बड़ा काम कर देती है। कहानी सुनकर सारे मित्र निडर होकर एकजुट हो जाते हैं और मिलकर पुल बनाकर आगे की यात्रा पूरी करते हैं।
दोनों श्लोकों का अर्थ (परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण)
| श्लोक | सरल भावार्थ |
|---|---|
| अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥ (हितोपदेशः १.३६) |
छोटी-छोटी चीज़ों का समूह भी बड़ा काम कर सकता है — जैसे घास के तिनकों को मिलाकर बनाई रस्सी से मतवाले हाथी भी बाँधे जा सकते हैं। |
| विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ (हितोपदेशः १.३२) |
विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा-भाव, सभा में अच्छा बोलना, युद्ध में पराक्रम, यश पाने की इच्छा और शास्त्र पढ़ने में रुचि — ये सभी गुण महान लोगों में स्वाभाविक रूप से होते हैं। |
पदच्छेद और अन्वय (दोनों श्लोकों के)
श्लोक 1 — पदच्छेद: अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका। तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः। अन्वय: अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका। गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते।
श्लोक 2 — पदच्छेद: विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः। यशसि च अभिरुचिः, व्यसनम् श्रुतौ, प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम्। अन्वय: अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः; यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| संहतिः | एकजुटता, समूह |
| तण्डुलकणाः | चावल के दाने |
| व्याधः | शिकारी |
| विपत् | संकट |
| कापुरुषः | कायर पुरुष |
| आश्रितः | शरण में आया हुआ |
| अभ्युदयः | उन्नति |
| पुलकितः | रोमांचित, प्रसन्न |
व्याकरण: ल्यप् प्रत्यय और विसर्ग संधि
जब एक क्रिया के बाद तुरंत दूसरी क्रिया होती है, तो पहली क्रिया में सामान्यतः क्त्वा प्रत्यय (जैसे गत्वा, कृत्वा) लगता है। लेकिन अगर धातु से पहले कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा की जगह ल्यप् प्रत्यय आता है, जिसमें सिर्फ़ "य" शेष रहता है — जैसे आ+गम्+क्त्वा = आगत्य (न कि आगम्य्वा)।
| उपसर्ग + धातु | ल्यप् रूप |
|---|---|
| आ + गम् | आगत्य |
| अव + लोक् | अवलोक्य |
| उत् + स्था | उत्थाय |
| प्र + नम् | प्रणम्य |
विसर्ग संधि के नियम: (1) विसर्ग के बाद च/छ आए तो विसर्ग "श्" बनता है — कः+चित्=कश्चित्। (2) विसर्ग के बाद त/थ आए तो विसर्ग "स्" बनता है — चकितः+तूष्णीम्=चकितस्तूष्णीम्। (3) अ के बाद विसर्ग और फिर घोष वर्ण/ह/य/व/र/ल आए तो अ-विसर्ग मिलकर "ओ" बनता है — हिरण्यकः+नाम=हिरण्यको नाम। (4) दोनों ओर अ हो तो भी "ओ" बनता है — कुतः+अत्र=कुतोऽत्र।
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सभी प्रश्नों के हल
प्रश्न 1: एकपदेन उत्तरं लिखत
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति? | केदारक्षेत्रम् |
| सर्वत्र कः प्रसृतः? | भयम् |
| कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत्? | नायकः |
| कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति? | नायकः |
| कपोतराजस्य नाम किम्? | चित्रग्रीवः |
| व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान्? | तण्डुलकणान् |
| विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम्? | कापुरुषस्य |
| चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति? | गण्डकीतीरे |
| चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति? | स्नेहपूर्वक "सखे" कहकर |
| पूर्वं केषां पाशान् छिन्तु इति चित्रग्रीवः वदति? | आश्रित कपोतानाम् |
प्रश्न 2: पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
- यदा ते केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन्, तदा अकस्मात् वृष्टिः अभवत्, सेतुः भग्नः अभवत् तथा च पर्वतस्खलनम् अपि अभवत्।
- सर्वे उच्चस्वरेण ईश्वरं रक्षायै प्रार्थयन्त।
- नायकः उक्तवान् यत् धैर्येण तथा आत्मविश्वासेन असम्भवं कार्यम् अपि सम्पन्नं भवितुं शक्नोति।
- चित्रग्रीवः निरूपयति यत् निर्जने वने तण्डुलकणानां उपस्थितिः संदेहास्पदा अस्ति, अतः अत्र अवश्यमेव कश्चन उपद्रवः भवितुम् अर्हति।
- "अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका" इति नीतिवचनं प्रसिद्धम्।
- चित्रग्रीवः आदेशं दत्तवान् यत् सर्वे कपोताः एकचित्तीभूय जालेन सह एव आकाशे उड्डीयन्ताम्।
- हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य मित्रं ज्ञात्वा अपि प्रथमम् आश्रित-कपोतानां बन्धनं छेत्तुं तूष्णीं स्थितः, पश्चादेव चित्रग्रीवं मुक्तवान्।
- पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं वदति यत् भवतः बुद्ध्या एव वयं सर्वे रक्षिताः, भवान् एव अस्माकं जीवनदाता।
- कपोताः चित्रग्रीवस्य आदेशेन एकचित्तीभूय जालेन सह उड्डीय आत्मरक्षणं कृतवन्तः।
- नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि भयं त्यक्त्वा एकजुटतया सेतुं निर्माय स्वयात्रां पुनः आरब्धवन्तः।
प्रश्न 3: क्त्वा वाक्यों को ल्यप् में बदलिए
| मूल वाक्य | ल्यप् रूप में उत्तर |
|---|---|
| भक्तः मन्दिरम् आगच्छति। पूजां करोति। | भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति। |
| माता भोजनं निर्माति। पुत्राय ददाति। | माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति। |
| सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति। देवं नमति। | सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति। |
| रमा पुस्तकं स्वीकरोति। विद्यालयं गच्छति। | रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति। |
| अहं गृहम् आगच्छामि। भोजनं करोमि। | अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि। |
| तण्डुलकणान् विकिरति। जालं विस्तारयति। | तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति। |
| व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते। भूमौ अवतरति। | व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति। |
प्रश्न 4: उपसर्ग जोड़कर ल्यप् प्रयोग
दिए गए उपसर्ग — सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र
| मूल वाक्य | परिवर्तित उत्तर |
|---|---|
| माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति। | माता वस्त्राणि संक्षाल्य पचति। (सम् + क्षाल्) |
| शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति। | शिक्षकः श्लोकम् उपलिख्य पाठयति। (उप + लिख्) |
| रमा स्थित्वा गीतं गायति। | रमा उत्थाय गीतं गायति। (उत् + स्था) |
| शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति। | शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य पठति। (प्र + नम्) |
| लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति। | लेखकः आलोचनं विकृत्य लिखति। (वि + कृ) |
प्रश्न 5: रिक्तस्थान पूर्ति
| अपूर्ण वाक्य | सही शब्द |
|---|---|
| सर्वैः एकचित्तीभूय ______ उड्डीयताम्। | जालेन सह |
| जालापहारकान् तान् ______ पश्चाद् अधावत्। | व्याधः |
| अस्माकं मित्रं ______ नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे निवसति। | हिरण्यकः |
| हिरण्यकः कपोतानाम् ______ चकितस्तूष्णीं स्थितः। | आगमनं दृष्ट्वा |
| यतोहि विपत्काले ______ एव कापुरुषलक्षणम्। | विस्मयः |
प्रश्न 6: ल्यप्पद के साथ सही पद जोड़िए
| ल्यप्पद | सही जोड़ी |
|---|---|
| विकीर्य | तण्डुलकणान् |
| विस्तीर्य | जालम् |
| अवतीर्य | भूमौ |
| अवलोक्य | जालापहारकान् |
| एकचित्तीभूय | उड्डीयताम् |
| प्रत्यभिज्ञाय | तद्वचनम् |
प्रश्न 7: समासयुक्त पद
| विग्रह | समास |
|---|---|
| तण्डुलानां कणाः / तान् | तण्डुलकणाः / तण्डुलकणान् |
| जालस्य अपहारकाः / तान् | जालापहारकाः / जालापहारकान् |
| अवपातात् भयम् / तस्मात् | अवपातभयम् / अवपातभयात् |
| कापुरुषाणां लक्षणम् / तस्मिन् | कापुरुषलक्षणम् / कापुरुषलक्षणे |
प्रश्न 8: संधि-विच्छेद
| संधि-पद | विच्छेद |
|---|---|
| बालकोऽत्र | बालकः + अत्र |
| धैर्यमथाभ्युदये | धैर्यम् + अथ + अभ्युदये |
| भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् | भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् |
| नमस्ते | नमः + ते |
| उपायश्चिन्तनीयः | उपायः + चिन्तनीयः |
| हिरण्यकोऽप्याह | हिरण्यकः + अपि + आह |
| मूषकराजो गण्डकीतीरे | मूषकराजः + गण्डकीतीरे |
| अतस्त्वाम् | अतः + त्वाम् |
| कश्चित् | कः + चित् |
परियोजनाकार्यम् — प्रोजेक्ट कार्य का हल
1. दिए गए क्रियापदों से नए वाक्य:
- क्रियताम् — त्वया अद्य एव कार्यं क्रियताम्।
- निवसति — सः नगरे निवसति।
- आह — नायकः मित्रान् आह "मा भैष्ट"।
- छेत्स्यति — हिरण्यकः पाशान् छेत्स्यति।
- सम्भाषसे — त्वं कदा मया सह सम्भाषसे?
- अब्रवीत् — चित्रग्रीवः सर्वान् अब्रवीत् "एकचित्तीभूय उड्डीयताम्"।
- उपसर्पति — बालकः धीरे-धीरे मातुः समीपम् उपसर्पति।
- युज्यते — सत्कार्ये सदा प्रयत्नः युज्यते।
2. कथा से मिलने वाली शिक्षा: यह कथा हमें सिखाती है कि एकता में बल है, संकट में धैर्य नहीं खोना चाहिए, और जो हम पर निर्भर है (आश्रित) उसकी रक्षा अपने स्वार्थ से पहले करनी चाहिए। कक्षा में छात्र इस पर चर्चा कर सकते हैं कि आज के जीवन में मिलजुल कर काम करने से कौन-सी कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं — जैसे टीम वर्क, परिवार में सहयोग या मित्रों की मदद।
परीक्षा हेतु त्वरित सुझाव
- दोनों श्लोक अर्थ सहित कंठस्थ करें — इन पर सीधे प्रश्न आते हैं।
- क्त्वा और ल्यप् में अंतर तथा दस ल्यप् उदाहरण अलग नोट करें।
- विसर्ग संधि के चारों नियमों के दो-दो अपने उदाहरण खुद बनाएं।
- कहानी को अपने शब्दों में संक्षेप में कहने का अभ्यास करें ताकि पूर्णवाक्य प्रश्न आसान लगें।


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