NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 1: Aham Asmi Bharatasya Samvidhanam | अहमस्मि भारतस्य संविधानम् की सम्पूर्ण व्याख्या
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के पहले पाठ 'अहमस्मि भारतस्य संविधानम्' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें संविधान के चार आधारस्तंभ, तीन अंग, मौलिक अधिकार, मूल कर्तव्य, शब्दावली, व्याकरण और अभ्यास — चित्रों सहित — शामिल हैं।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का प्रथम पाठ "अहमस्मि भारतस्य संविधानम्" भारत के संविधान को स्वयं संविधान की वाणी में विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करता है। पाठ में संविधान स्वयं प्रथम पुरुष में बोलते हुए अपने चार आधारस्तंभों, तीन अंगों, मौलिक अधिकारों और मूल कर्तव्यों का परिचय देता है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली, व्याकरण बिंदु और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति के अंतर्गत संस्कृत एक मान्यता-प्राप्त भारतीय भाषा है, जिसे कक्षा 9 के अधिकांश विद्यार्थी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में पढ़ते हैं। NCERT की कक्षा 9 की अन्य नई पाठ्यपुस्तकों — जैसे गणित मंजरी — की तरह ही ऋषिकुल्या भी वर्तमान पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
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पाठ का सार — विद्यालय-भ्रमण से संविधान तक
पाठ की शुरुआत एक विद्यालय-भ्रमण के दृश्य से होती है। स्थान है संविधान सदन — जो पुरातन संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में स्थित है। छात्राएँ गार्गी, यशिका, श्रेया, पावनी तथा छात्र अथर्व वहाँ पहुँचते हैं और गौरवपूर्ण वातावरण देखकर आपस में वार्तालाप करते हैं।
गार्गी आश्चर्य से यशिका को बताती है कि यही वह पवित्र संविधान-सदन है, जहाँ राष्ट्र के भाग्य-विधाताओं की सभा हुई थी और भारत की "आत्मा" ने संविधान का रूप धारण किया। यशिका सहमति जताते हुए आगे रखे "संविधान-ग्रन्थम्" की ओर संकेत करती है। अथर्व कहता है कि यह ग्रन्थ मानो स्वयं अपने विषय में कुछ कहना चाहता है, और श्रेया आश्चर्यचकित होकर बताती है कि उसे भी मानो ग्रन्थ की वाणी सुनाई दे रही है। पावनी सबसे मौन रहकर सुनने का आग्रह करती है — और तभी संविधान प्रथम पुरुष में बोलना आरम्भ करता है।
संविधान स्वयं को "भारतस्य आत्मा" अर्थात् भारत की आत्मा, राष्ट्र की नियमसंहिता तथा जीवन का मार्गदर्शक बताता है। वह स्वयं को राष्ट्रीय चेतना का प्रतिरूप कहता है, और बताता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित उदात्त विचार प्रतिपद उसमें समाहित हैं — जैसे ऋग्वेद का यह प्रसिद्ध मंत्र:
"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥"
अर्थात् सब मिलकर चलें, मिलकर बोलें और सबके मन एक-से विचार वाले हों, जैसे प्राचीन काल में देवगण अपना-अपना भाग मिलकर ग्रहण करते थे। पाठ की यह आत्मकथात्मक शैली — जिसमें संविधान स्वयं "अहम् अस्मि..." कहकर अपना परिचय देता है — इसे कक्षा 9 के अन्य गद्य-पाठों से अलग बनाती है, और अमूर्त संवैधानिक अवधारणाओं को विद्यार्थियों के लिए अधिक सुगम बनाती है।
संविधान के चार आधारस्तंभ — न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता
संविधान अपने भाषण में चार आधारस्तंभ गिनाता है, जिनके सहारे वह देश के लोकतंत्र को सुदृढ़ करने का दावा करता है। राष्ट्र की एकता, अखंडता, न्याय और शांति की स्थापना ही इसका मूल लक्ष्य बताया गया है।
| संस्कृत शब्द | अंग्रेज़ी | भावार्थ |
|---|---|---|
| न्यायः | Justice | सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय सुनिश्चित करना |
| स्वतन्त्रता | Liberty | विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता |
| समता | Equality | प्रतिष्ठा और अवसर की समानता |
| बन्धुता | Fraternity | व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाला भाईचारा |
पाठ के अनुसार संविधान समय, संदर्भ और आवश्यकता के अनुरूप संशोधनों (संशोधनैः) के माध्यम से स्वयं को निरंतर नवीन बनाए रखता है, और स्वयं को विश्व का सबसे सुदृढ़ तथा सबसे बड़ा लिखित संविधान बताता है। "सर्वमतसमभावः" अर्थात् सभी मतों के प्रति समान भाव ही इसका परम स्वभाव है, और सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक न्याय इसका मंत्र है। पाठ यह भी जोड़ता है कि व्यक्ति की गरिमा (व्यक्तिगरिमा) और राष्ट्रीय एकता, दोनों संविधान के हृदय की अंतर्भूत भावनाएँ हैं।
चित्र विवरण: संविधान के चार आधारस्तंभ — न्यायः, स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता — जिनके सहारे भारत के लोकतंत्र को सुदृढ़ किया गया है।
शासन के तीन अंग — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका
भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे का आधार बताते हुए संविधान अपने तीन अंगों की व्याख्या करता है — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। पाठ के अनुसार संविधान स्वयं इन तीनों अंगों के माध्यम से कार्य करता है।
| अंग | कार्य |
|---|---|
| विधायिका (Legislature) | नीतियों और कानूनों का निर्माण करती है |
| कार्यपालिका (Executive) | बनी हुई नीतियों का क्रियान्वयन करती है |
| न्यायपालिका (Judiciary) | नागरिकों के न्याय व अधिकारों की रक्षा करती है — जनपद न्यायालय, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के रूप में संरचित |
पाठ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह व्यवस्था संसदीय-शासन पद्धति पर आधारित है, जिसमें नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजते हैं, और इस व्यवस्था में जनता ही सर्वोच्च स्थान रखती है। इसी कारण पाठ जनमत के महत्व को अत्यधिक बताता है, क्योंकि श्रेष्ठ नेताओं के चयन से ही उत्तम समाज का निर्माण संभव है।
चित्र विवरण: संविधान के तीन अंग — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — अपने-अपने कार्यों सहित, जो मिलकर भारत के लोकतंत्र का संचालन करते हैं।
मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 32
संविधान नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों (मौलिकाधिकाराः) से भी अवगत कराता है, जिससे प्रत्येक नागरिक गौरव के साथ अपना जीवन जी सके। पाठ के अनुसार अनुच्छेद 32 में वर्णित वैधानिक उपचार के अधिकार के माध्यम से संविधान नागरिकों की रक्षा करता है।
इसी क्रम में महोपनिषद् की प्रसिद्ध उक्ति "उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्" का उल्लेख करते हुए सभी नागरिकों की उन्नति की भावना व्यक्त की गई है। इस उक्ति का अर्थ है कि उदार हृदय वालों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार के समान है, और यही भावना सभी नागरिकों के कल्याण की मूल प्रेरणा बताई गई है। संविधान केंद्र सरकार और राज्य सरकारों — दोनों को अधिकार प्रदान करता है, जिससे देश का संघीय ढाँचा सुनिश्चित होता है। पाठ इसे विचार-स्वातन्त्र्य और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक भी बताता है, और इस भावना को वेद की उक्ति "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" (श्रेष्ठ विचार सभी दिशाओं से हमारे पास आएँ) से जोड़ता है।
पाठ में यह भी कहा गया है कि संविधान अपनी उपासना-पद्धति चुनने की स्वतंत्रता (स्वातन्त्र्य) का पोषक है, और प्रतिष्ठा तथा अवसर की समता ही इसकी दृष्टि है। इसकी दृष्टि में सभी भारतीय समान माने गए हैं।
मूल कर्तव्य — अनुच्छेद 51(क) की ग्यारह बातें
पाठ के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 51 के खंड (क) में नागरिकों के ग्यारह मूल कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें पाठ की परियोजना-गतिविधि में सूचीबद्ध भी किया गया है:
| क्रम | मूल कर्तव्य | Duty |
|---|---|---|
| 1 | संविधान का आदर करना | Respect the Constitution |
| 2 | स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित करने वाले आदर्शों का सम्मान करना | Cherish the ideals of the freedom struggle |
| 3 | देश की एकता और अखंडता बनाए रखना | Uphold unity and integrity of India |
| 4 | देश की रक्षा करना | Defend the country |
| 5 | भाईचारे की भावना विकसित करना | Promote the spirit of common brotherhood |
| 6 | भारत की सम्मिश्रित संस्कृति का महत्व समझना | Value India's composite culture |
| 7 | पर्यावरण की रक्षा करना | Protect the environment |
| 8 | वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना | Develop scientific temper |
| 9 | सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना | Safeguard public property |
| 10 | उत्कृष्टता की ओर निरंतर प्रयास करना | Strive towards excellence |
| 11 | शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना | Provide opportunities for education |
पाठ के अनुसार इन कर्तव्यों का पालन ही राष्ट्र की प्रगति और उत्तम समाज-निर्माण के लिए आवश्यक बताया गया है, और यही भाव प्रसिद्ध सूक्ति "धर्मो रक्षति रक्षितः" (जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है) में भी झलकता है।
चित्र विवरण: अनुच्छेद 51(क) में वर्णित नागरिकों के ग्यारह मूल कर्तव्य, जिन्हें पाठ में सूचीबद्ध किया गया है।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में संविधान से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। पूरी सूची नीचे दी गई है:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| संविधानम् | सम्यक् विधान | Constitution |
| नियमसंहिता | नियमों का संग्रह | Code of rules |
| लोकतन्त्रम् | जनतंत्र | Democracy |
| प्रतिपदम् | प्रत्येक पद में | In every single word |
| समाहिताः | समाहित / निहित | Inherent / included |
| जीवनमार्गदर्शकः | जीवन का मार्ग दिखाने वाला | Guide for life's path |
| संगच्छध्वम् | मिलकर चलो | May you walk together |
| संवदध्वम् | मिलकर एक स्वर से बोलो | Speak together |
| वः / वो | आपका | Yours |
| मनांसि | मनों को | Minds |
| संजानानाः | एक विचार वाले होकर | Being amicable, sharing the same ideas |
| उपासते | श्रद्धापूर्वक कर्तव्य-निर्वहण करते हैं | Devotedly performing duties |
| विधायिका | विधि-नियमों का निर्माण करने वाली सभा | Legislature |
| न्यायपालिका | न्याय की रक्षा करने वाली परिषद् | Judiciary |
| नागरिकाणाम् | नागरिकों का | Of the people |
| संशोधनैः | संशोधनों के द्वारा | By amendments |
| लोकतन्त्रात्मकस्य | लोकतन्त्रात्मक का (बहुव्रीहि समास) | Of democratic |
| निर्भीकाः | भयरहित | Without fear |
| निरामयाः | रोगमुक्त, स्वस्थ (बहुव्रीहि समास) | Free from disease |
पाठ में "लोकतन्त्रात्मकस्य" और "निरामयाः" जैसे बहुव्रीहि समास के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
व्याकरण बिंदु — आत्मनेपद और परस्मैपद का नियम
पाठ के व्याकरण-प्रकरण "अत्र इदम् अवधेयम्" में दो धातुओं — गम् और वद् — के आत्मनेपद तथा परस्मैपद प्रयोग का नियम समझाया गया है, जो "संगच्छध्वम्" और "संवदध्वम्" जैसे मंत्र-पदों को समझने के लिए आवश्यक है।
सम् + गम् धातु का नियम
गम् धातु स्वयं परस्मैपदी होती है, परंतु "सम्" उपसर्ग लगने पर यह अकर्मक प्रयोग में आत्मनेपदी बन जाती है, जबकि सकर्मक प्रयोग में परस्मैपदी ही रहती है। जैसे "पिता पुत्रेण सह संगच्छते" (अकर्मक, आत्मनेपद) और "बालः ग्रामं सङ्गच्छति" (सकर्मक, परस्मैपद)। इसी नियम के अनुसार मंत्र में प्रयुक्त "संगच्छध्वम्" आत्मनेपदी रूप है, क्योंकि वहाँ इसका प्रयोग अकर्मक है।
वद् धातु का सामान्य नियम
वद् धातु के लिए सामान्य नियम यह है कि कोई भी उपसर्ग लगे या न लगे, सकर्मक प्रयोग में यह परस्मैपदी और अकर्मक प्रयोग में आत्मनेपदी होती है। जैसे "अध्यापकः कक्षायां वदते" (अकर्मक, आत्मनेपद) की तुलना में "अध्यापकः कक्षायां श्लोकं वदति" (सकर्मक, परस्मैपद)। इसी आधार पर पाठ में "संवदध्वम्" का प्रयोग भी आत्मनेपदी माना गया है। ध्यान दें कि गम् का नियम केवल "सम्" उपसर्ग तक सीमित है, जबकि वद् का नियम किसी भी उपसर्ग — या उपसर्ग रहित रूप — पर समान रूप से लागू होता है।
दोनों नियमों का सार नीचे तालिका में दिया गया है:
| धातु | प्रयोग | पद | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| सम् + गम् | अकर्मक | आत्मनेपद | पिता पुत्रेण सह संगच्छते |
| सम् + गम् | सकर्मक | परस्मैपद | बालः ग्रामं सङ्गच्छति |
| वद् | अकर्मक | आत्मनेपद | अध्यापकः कक्षायां वदते |
| वद् | सकर्मक | परस्मैपद | अध्यापकः कक्षायां श्लोकं वदति |
अभ्यास और गतिविधियाँ
सात प्रकार के अभ्यास
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत सात प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं, जो पठन-बोध, शब्द-ज्ञान और व्याकरण-कौशल की जाँच करते हैं:
- पाठ पर आधारित पाँच प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्यों में लिखना — जैसे संविधान के चार स्तंभों, कार्यपालिका के कार्यों, अनुच्छेद 51(क) और संविधान की संकल्पना से जुड़े प्रश्न
- दी गई शब्द-मंजूषा (वेदोक्तिम्, एकपञ्चाशत्तमे, भद्राणि, संविधानम्, अङ्गानि) से उचित शब्द चुनकर पाँच रिक्त स्थान भरना
- छह विग्रह-वाक्यों — जीवनस्य मार्गदर्शकः, दिनं दिनं प्रति, आधारस्य शिला, धर्मस्य उपासना, हृदः मन्दिरम्, संविधानस्य संशोधनम् — के समस्त पद (समास) लिखना
- रेखांकित पदों के आधार पर चार वाक्यों से प्रश्न-निर्माण करना
- छह संधि-युक्त पदों — भारतस्यात्मा, राष्ट्रियैकता, मौलिकाधिकारान्, सर्वकारस्योपरि, सर्वेऽपि, कोऽपि — का सन्धि-विच्छेद करना
- पाठ पर आधारित छह कथनों (जैसे संविधान की विश्व में स्थिति, विधायिका का कार्य, संशोधन की संभावना) को सत्य या असत्य चुनना
- "बंधुता" मूल्य से जुड़ी एक व्यावहारिक स्थिति — अन्य राज्य से आए भिन्न मातृभाषा वाले नए छात्र की — पढ़कर तीन विकल्पों में से उचित समाधान चुनना
परियोजना और गतिविधि-आधारित कार्य
पाठ के साथ दो अतिरिक्त खंड भी दिए गए हैं। "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में विद्यार्थियों को भारत की शासन-व्यवस्था का चित्र बनाने तथा अनुच्छेद 51(क) के मूल कर्तव्यों की सूची तैयार करने को कहा गया है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के पोस्टर बनाना, आधिकारिक पोर्टल के क्यूआर-कूट से संविधान पढ़ना, तथा "वैदिकसूक्ति-संवाद-गोष्ठी" नामक समूह-चर्चा शामिल है।
इस समूह-चर्चा में शिक्षक श्यामपट्ट पर संवैधानिक मूल्यों और प्राचीन वैदिक सूक्तियों की जोड़ियाँ लिखते हैं, जिन पर विद्यार्थी लघु-समूहों में चर्चा करते हैं:
| संवैधानिक मूल्य | वैदिक सूक्ति |
|---|---|
| संगच्छध्वं संवदध्वम् — लोकतान्त्रिक समता व बंधुता | एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति |
| उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् — वैश्विक कल्याण, भ्रातृभाव | धर्मो रक्षति रक्षितः |
| आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः — वैचारिक स्वतंत्रता | आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः |
| समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् — समता | सर्वं खल्विदं ब्रह्म |
| समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि | माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः |
चर्चा के अंत में प्रत्येक समूह अपने निष्कर्ष को संस्कृत के एक वाक्य में प्रस्तुत करता है — जैसे पाठ में दिया उदाहरण: "संगच्छध्वम् इति भावनया समाजे समता आगच्छति।"
पाठ में दिए गए निर्देशानुसार, विद्यार्थी भारत सरकार के विधायी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से संविधान को आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध सभी 22 भारतीय भाषाओं में भी पढ़ सकते हैं।
पाठ से मुख्य सीख
पाठ के अंत में संविधान एक निर्भीक और सुशासन-युक्त समाज की कामना करते हुए यह शांति-मंत्र उच्चारण करता है: "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥" अर्थात् सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी शुभ देखें और कोई भी दुःखी न हो। छात्र इस भावना का उत्तर "जयतु भारतम्! जयतु संविधानम्!" कहकर देते हैं।
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- संविधान भारत की आत्मा और जीवन का मार्गदर्शक है, जो न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर आधारित है।
- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर लोकतंत्र को सुचारू रूप से संचालित करते हैं।
- मौलिक अधिकार और मूल कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं, और दोनों मिलकर नागरिक जीवन को संतुलित करते हैं।
- सम् + गम् और वद् धातुओं का आत्मनेपद-परस्मैपद प्रयोग अकर्मक या सकर्मक प्रयोग पर निर्भर करता है।
- पाठ की आत्मकथात्मक शैली और प्राचीन वैदिक सूक्तियों का समावेश संस्कृत-अध्ययन को भारतीय संवैधानिक मूल्यों से जोड़ता है।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ भारतीय संविधान की मूल भावना की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। कक्षा 9 के अन्य विषयों की व्याख्या के लिए विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 भी देख सकते हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से जुड़ी बुनियादी अवधारणाएँ समझाई गई हैं।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: पाठ के आरंभिक दृश्य में विद्यार्थी किस स्थान पर पहुँचते हैं?
उत्तर: पुरातन संसद भवन में स्थित संविधान सदन, जहाँ केंद्रीय कक्ष में "संविधान-ग्रन्थम्" रखा हुआ है — यहीं से गार्गी, यशिका, अथर्व, श्रेया और पावनी की बातचीत शुरू होती है।
प्रश्न 2: संविधान अनुच्छेद 32 के माध्यम से नागरिकों को क्या प्रदान करता है?
उत्तर: वैधानिक उपचार का अधिकार, जिसके माध्यम से संविधान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
प्रश्न 3: न्यायपालिका की संरचना पाठ में किन तीन स्तरों में बताई गई है?
उत्तर: जनपद न्यायालय, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय।
प्रश्न 4: "उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्" उक्ति का पाठ में क्या भावार्थ बताया गया है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि उदार हृदय वालों के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार के समान है — यही भावना सभी नागरिकों के कल्याण की मूल प्रेरणा बताई गई है।
प्रश्न 5: पाठ में बहुव्रीहि समास के कौन-से दो उदाहरण दिए गए हैं?
उत्तर: "लोकतन्त्रात्मकस्य" (लोकतन्त्रम् आत्मा यस्य) और "निरामयाः" (निर्गताः आमयाः येभ्यः ते)।
प्रश्न 6: संविधान के तीन अंग कौन-से हैं?
उत्तर: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — पाठ के अनुसार संविधान इन्हीं तीन अंगों के माध्यम से कार्य करता है।
प्रश्न 7: संविधान स्वयं को विश्व के संदर्भ में कैसा बताता है?
उत्तर: वह स्वयं को विश्व का सबसे सुदृढ़ तथा सबसे बड़ा (बृहत्तम) लिखित संविधान बताता है।
प्रश्न 8: "सर्वमतसमभावः" का क्या अर्थ है?
उत्तर: सभी मतों (धर्मों) के प्रति समान भाव। पाठ के अनुसार यही संविधान का परम स्वभाव बताया गया है, और इसकी दृष्टि में सभी भारतीय समान माने गए हैं।
प्रश्न 9: पाठ के अनुसार संविधान केंद्र और राज्य सरकारों के लिए क्या करता है?
उत्तर: वह दोनों को अधिकार प्रदान करता है, जिससे देश का संघीय ढाँचा सुनिश्चित होता है।
प्रश्न 10: "वद्" धातु आत्मनेपदी कब होती है?
उत्तर: जब इसका प्रयोग अकर्मक हो, चाहे कोई भी उपसर्ग लगे या न लगे — जैसे "अध्यापकः कक्षायां वदते"। सकर्मक प्रयोग में यह परस्मैपदी होती है, जैसे "अध्यापकः कक्षायां श्लोकं वदति"।
प्रश्न 11: पाठ में "जीवनमार्गदर्शकः" शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: जीवन का मार्ग दिखाने वाला — संविधान स्वयं को इसी रूप में वर्णित करता है।
प्रश्न 12: पाठ के अंत में संविधान कौन-सा शांति-मंत्र उच्चारण करता है?
उत्तर: "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥" — अर्थात् सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी शुभ देखें और कोई दुःखी न हो।


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