Class 8 संस्कृत (Deepakam) पाठ 1: "संगच्छध्वं संवदध्वम्" के संपूर्ण नोट्स और व्याख्या

शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू NCERT की कक्षा 8 संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' के पहले पाठ 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' (ऋग्वेद संज्ञानसूक्त) के व्यवस्थित नोट्स। इसमें मंत्रों के सरल हिंदी भावार्थ, कठिन शब्दार्थ, व्याकरण बिंदु (जैसे गम् धातु, लोट् लकार, वैकल्पिक रूप) और अभ्यास प्रश्नों की पूरी जानकारी दी गई है।

Aug 19, 2026 - 17:44
Updated: 2 hours ago
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NCERT की कक्षा 8 संस्कृत पाठ्यपुस्तक दीपकम् के 2026-27 सत्र से लागू पहले पाठ "संगच्छध्वं संवदध्वम्" में विद्यार्थियों को अक्सर कठिनाई होती है क्योंकि यह पाठ गद्य नहीं बल्कि वैदिक मंत्रों की शैली में है। इस लेख में पाठ के तीनों मंत्रों का सरल हिंदी अर्थ, शब्दार्थ, व्याकरण बिंदु तथा पाठ्यपुस्तक में दिए गए सभी छह अभ्यास प्रश्नों को हल सहित दिया गया है, ताकि विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी आसानी से कर सकें।

अध्याय द्वितीय (Chapter 2)  ⇒

पाठ का परिचय

बिंदु विवरण
कक्षा 8
पुस्तक दीपकम् (2026-27 सत्र से लागू)
पाठ संख्या 1 (कुल 16 पाठों में से पहला)
पाठ का नाम संगच्छध्वं संवदध्वम्
स्रोत ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 191 (संज्ञानसूक्तम् / संघटनसूक्तम्)
विधा वैदिक पद्य (तीन मंत्र)

पाठ का सारांश और मुख्य उद्देश्य

पाठ का आरंभ एक कक्षा-संवाद से होता है, जिसमें विद्यार्थी आचार्य को बताते हैं कि उनकी टीम ने पादकंदुक (फुटबॉल) क्रीड़ा में विजय प्राप्त की क्योंकि उनके दल में आपसी सामंजस्य था, जबकि विपक्षी दल आपसी मनभेद के कारण हार गया। इसी प्रसंग से आचार्य ऋग्वेद के संज्ञानसूक्त के तीन मंत्र पढ़ाते हैं।

पाठ का मुख्य उद्देश्य यह सिखाना है कि समाज, परिवार, विद्यालय या राष्ट्र — किसी भी स्तर पर उन्नति तभी संभव है जब सभी लोग साथ मिलकर चलें, एक स्वर में बोलें, तथा उनके विचार, संकल्प और हृदय एक समान हों। मंत्रों में बार-बार "समान" शब्द का प्रयोग यही दर्शाता है कि आपसी मनभेद और वैमनस्य त्यागकर एकता तथा सहयोग से ही सामूहिक सफलता प्राप्त होती है।

तीनों मंत्र और सरल हिंदी भावार्थ

मंत्र 1

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

भावार्थ: हे मनुष्यो! तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और तुम्हारे मन आपस में एक समान हों — ठीक उसी प्रकार जैसे सृष्टि के आरंभ में देवता (ब्रह्मांडीय शक्तियां) अपने-अपने कार्य को समझ-बूझकर मिलकर संपन्न करते थे।

मंत्र 2

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥

भावार्थ: तुम्हारा विचार (मंत्र) समान हो, तुम्हारी सभा (समिति) समान हो, तुम्हारा मन और चित्त एक समान हों। मैं तुम्हारे लिए एक समान संकल्प का उच्चारण करता हूं और समान भाव से हवि अर्पित करता हूं।

मंत्र 3

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

भावार्थ: तुम्हारा संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय समान हों। तुम्हारा मन इस प्रकार एक समान हो कि तुम सब आपस में मिलकर सुखपूर्वक रह सको।

महत्वपूर्ण शब्दार्थ तालिका

संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
संगच्छध्वम् मिलकर चलो
संवदध्वम् एक स्वर में मिलकर बोलो
समवेतस्वरेण सम्मिलित ध्वनि से
मनांसि मनों को, चित्तों को
जानताम् जानें
देवाः ब्रह्मांडीय शक्तियां (सृष्टि की मूलभूत शक्तियां)
संजानानाः एक विचार वाले होकर
उपासते श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निर्वहण करते हैं
अभ्युदयम् लौकिक उन्नति
मन्त्रः चिंतन, विचार
समितिः समान सिद्धि, सभा
अभिमन्त्रये अभिमंत्रित करके प्रचारित करता हूं
हविषा प्रार्थनापूर्वक यज्ञाहुति द्वारा
जुहोमि दिव्य यज्ञ कर्म को साधता हूं
आकूतिः संकल्प
सुसहासति सुसंघटित हो
संहिता मूल वैदिक मंत्र पाठ
निरवहन् निर्वाह किया

व्याकरण के महत्वपूर्ण बिंदु

1. गम् धातु और सम् उपसर्ग

गम् धातु सामान्यतः परस्मैपदी है, जैसे — गम् + ति = गच्छति। किंतु जब इसके साथ "सम्" उपसर्ग जुड़ता है, तो यह आत्मनेपदी बन जाती है — सम् + गच्छति = सङ्गच्छते। इसीलिए पाठ के शीर्षक में संगच्छध्वम् आत्मनेपद रूप में प्रयुक्त हुआ है।

2. लोट् लकार (आज्ञार्थ) के रूप — गम् धातु

परस्मैपदम्
पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमपुरुष गच्छतु गच्छताम् गच्छन्तु
मध्यमपुरुष गच्छ गच्छतम् गच्छत
उत्तमपुरुष गच्छानि गच्छाव गच्छाम
आत्मनेपदम् (सम् + गम्)
पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमपुरुष सङ्गच्छताम् सङ्गच्छेताम् सङ्गच्छन्ताम्
मध्यमपुरुष सङ्गच्छस्व सङ्गच्छेथाम् सङ्गच्छध्वम्
उत्तमपुरुष सङ्गच्छै सङ्गच्छावहै सङ्गच्छामहै

लोट् लकार का प्रयोग: आज्ञार्थ में (यूयम् उत्तिष्ठत), आमंत्रणार्थ में (भवन्तः आगच्छन्तु), तथा आशीर्वादार्थ में (विजयी भव) होता है।

3. अस्मद् और युष्मद् के वैकल्पिक रूप

विभक्ति बड़ा रूप लघु वैकल्पिक रूप
द्वितीया (अस्मद्) शाधि मां त्वां प्रपन्नम् शाधि मा त्वा प्रपन्नम्
चतुर्थी (अस्मद्) देहि मह्यं वरदे वरम् देहि मे वरदे वरम्
षष्ठी (अस्मद्) त्वमेव सर्वं मम देवदेव त्वमेव सर्वं मे देवदेव
द्वितीया (युष्मद्) अहं त्वां मोक्षयिष्यामि अहं त्वा मोक्षयिष्यामि
चतुर्थी (युष्मद्) नमः तुभ्यम् (नमस्तुभ्यम्) नमः ते (नमस्ते)
षष्ठी (युष्मद्) शिष्यः तव अहम् शिष्यः ते अहम्

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सभी अभ्यास प्रश्नों के हल

अभ्यास 1 — संज्ञानसूक्तं स्वरं पठत स्मरत लिखत च

यह मौखिक अभ्यास है। विद्यार्थी शिक्षक के मार्गदर्शन में तीनों मंत्रों (ऊपर दिए गए) का शुद्ध उच्चारण, स्वर तथा मात्रा के साथ बार-बार पाठ करें, मंत्रों को कंठस्थ करें, तथा नोटबुक में शुद्ध लेखन का अभ्यास करें।

अभ्यास 2 — पूर्णवाक्य में उत्तर लिखें

(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत्?
सर्वेषां मनः समानम्, सामञ्जस्ययुक्तं तथा एकरूपं भवेत्।

(ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः?
सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य अभिप्रायः अस्ति यत् सर्वे मनुष्याः मिलित्वा अग्रे गच्छन्तु, परस्परं सम्यक् विचारविनिमयं कृत्वा एकस्वरेण वदन्तु, तथा परस्परं मनोभावान् सम्यक् जानन्तु।

(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः?
सर्वे वैमनस्यं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः।

(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति?
अस्मिन् पाठे एकता, सहयोग, सामूहिकता तथा संगठन की प्रेरणा अस्ति, जिससे परिवार, समाज और राष्ट्र सभी की उन्नति संभव हो।

अभ्यास 3 — रेखांकित पदों पर आधारित प्रश्ननिर्माण

(क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति। → कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति?

(ख) वयम् ईश्वरं नमामः। → वयं कं नमामः?

(ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः। → वयं कथं जीवामः?

(घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते। → कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते?

(ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि। → अहं कस्मै श्रमं करोमि?

(च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः। → अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः?

(छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः। → वेदस्य अपरं नाम किम्?

(ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति। → मन्त्राः कुत्र भवन्ति?

अभ्यास 4 — रिक्तस्थान पूर्ति

(क) सङ्गच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते।

(ख) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।

(ग) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति

अभ्यास 5 — भावानुसार शब्द-मेल

(क) संगच्छध्वम् — मिलित्वा चलत
(ख) संवदध्वम् — एकस्वरेण वदत
(ग) मनः — चित्तम्
(घ) उपासते — सेवन्ते
(ङ) वसूनि — धनानि
(च) विश्वानि — समस्तानि
(छ) आकूतिः — सङ्कल्पः

अभ्यास 6 — लट् लकार से लोट् लकार में परिवर्तन

उदाहरण: बालिकाः नृत्यन्ति → बालिकाः नृत्यन्तु।

(क) बालकाः हसन्ति → बालकाः हसन्तु।

(ख) युवां तत्र गच्छथः → युवां तत्र गच्छताम्।

(ग) यूयं धावथ → यूयं धावत।

(घ) आवां लिखावः → आवां लिखाव।

(ङ) वयं पठामः → वयं पठाम।

परियोजना कार्य हेतु सुझाव

1. सूक्त के भावार्थ पर चर्चा: मित्रों के साथ मातृभाषा में यह चर्चा करें कि एकता और सहयोग से जीवन में क्या-क्या लाभ होते हैं, तथा कक्षा या घर के किसी अनुभव से इसे जोड़ें।

2. ऋग्वेद के पांच अन्य सूक्तों के नाम: शिक्षक के मार्गदर्शन में खोजकर लिखें — जैसे नासदीय सूक्तम्, पुरुष सूक्तम्, हिरण्यगर्भ सूक्तम्, वाक् सूक्तम्, विश्वकर्मा सूक्तम्। (यह सूची संदर्भ हेतु है, विद्यार्थी पुस्तकालय या शिक्षक की सहायता से पुष्टि अवश्य करें)

3. कक्षा में एकता स्थापित करने के उपाय: शिक्षक के साथ मिलकर सामूहिक गतिविधियां, समूह-कार्य, तथा आपसी सहयोग की योजनाएं बनाएं।

योग्यताविस्तरः — वेद संबंधी सामान्य ज्ञान

श्रेणी नाम
चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद
प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय, शतपथ, सामविधान, गोपथ
प्रसिद्ध उपनिषद ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, छांदोग्य, बृहदारण्यक आदि
उपवेद आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, अर्थवेद/स्थापत्यवेद
वेदांग शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प
षड्दर्शन न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदांत)
ऋग्वेद के मंत्र 10,552 (दश सहस्राणि, पंच शतानि, द्विपंचाशत्)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीपकम् पुस्तक में कुल कितने पाठ हैं?

NCERT की कक्षा 8 संस्कृत पुस्तक दीपकम् में कुल 16 पाठ हैं, जिनमें संगच्छध्वं संवदध्वम् पहला पाठ है।

पाठ किस वेद से संकलित है?

यह पाठ ऋग्वेद के दसवें मंडल के 191वें सूक्त से संकलित है, जिसे संज्ञानसूक्त भी कहते हैं।

पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

सभी लोगों को वैमनस्य त्यागकर एकता और सामूहिकता के साथ जीवन जीना चाहिए, तभी समाज और राष्ट्र की प्रगति संभव है।

पाठ में सबसे अधिक किस लकार का प्रयोग हुआ है?

पाठ में लोट् लकार (आज्ञार्थ) का प्रयोग प्रमुखता से हुआ है, क्योंकि संगच्छध्वम् और संवदध्वम् जैसे मुख्य शब्द इसी लकार में हैं।

पहले कक्षा 8 में कौन-सी पुस्तक पढ़ाई जाती थी?

पहले कक्षा 8 में रुचिरा पुस्तक पढ़ाई जाती थी। नए पाठ्यक्रम में दीपकम् पुस्तक लागू होने के बाद यह सूक्त पहले पाठ के रूप में शामिल किया गया है।

Frequently Asked Questions

इस सूक्त के ऋषि संवनन आंगिरस (Samvananah Angirasah) हैं।

पहले मंत्र के देवता अग्नि और शेष अन्य मंत्रों के देवता संज्ञान (सामंजस्य/एकता) हैं।

इस प्रसिद्ध मंत्र में अनुष्टुप् (Anustubh) छंद का प्रयोग हुआ है।

वैदिक काल में "समितिः" का अर्थ जनसामान्य की सामूहिक सभा या परिषद से था, जहाँ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णय लिए जाते थे।

"हविषा" का अर्थ 'यज्ञ की आहुति' या 'हवन सामग्री' होता है।

इसे सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के कारण "संगठन-सूक्तम्" या "ऐक्य-सूक्तम्" भी कहा जाता है।
Naina Saini

"Naina Saini is an Editorial Intern at Aapbiti, specializing in publishing and managing education-focused news articles. Operating under the direct mentorship and guidance of Shakti Rao Mani, the Product Owner of aapbiti.com, Naina is dedicated to delivering accurate, timely, and engaging academic updates. Her role focuses on keeping readers informed about educational trends, exams, admissions, and key academic policies."

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