Class 8 संस्कृत पाठ 11: सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) (दीपकम्)

कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" के ग्यारहवें पाठ "सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)" का सारांश, श्लोक अर्थ, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, व्याकरण नियम और सभी अभ्यास प्रश्नों के सरल हल।

Sep 15, 2026 - 12:08
0 2
Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 11 Notes Banner
"Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 11 Notes" लिखा हुआ बैनर, जिसमें जलता हुआ दीया और देवनागरी अक्षरों वाली खुली किताब का चित्र बना है।

कक्षा 8 की संस्कृत पुस्तक "दीपकम्" का ग्यारहवाँ पाठ "सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)" पिछले पाठ की वीरवर-कथा का समापन भाग है। इस लेख में पाठ की पूरी कहानी, शब्दार्थ, महत्वपूर्ण श्लोक, व्याकरण-बिंदु और सभी अभ्यास प्रश्नों के हल सरल भाषा में दिए गए हैं।

पाठ का उद्देश्य क्या है?

इस पाठ का उद्देश्य पिछले पाठ में अधूरी छूटी वीरवर की कथा को पूर्ण करना है, और छात्रों को त्याग, स्वामिभक्ति और सर्वोच्च समर्पण की पराकाष्ठा दिखाना है। कहानी बताती है कि किसी श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए छोटी-छोटी वस्तुओं या सुखों का त्याग करना बुद्धिमानी है — और वीरवर का पूरा परिवार अपने स्वामी की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार हो जाता है। साथ ही राजा शूद्रक भी दिखाते हैं कि एक अच्छा स्वामी भी अपने सेवक के लिए उतना ही त्याग करने को तत्पर रहता है। यह कथा मूलतः "मृच्छकटिकम्" नाटक पर आधारित है, जिसके रचयिता राजा शूद्रक स्वयं माने जाते हैं।

कथा सरल शब्दों में

पिछले पाठ में जहाँ कथा रुकी थी, वहाँ से आगे बढ़ते हुए राजलक्ष्मी वीरवर को बताती है कि राजा शूद्रक की आयु अब केवल तीन दिन शेष है। दीर्घायु का एकमात्र उपाय यह है कि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु देवी सर्वमंगला को हँसते हुए भेंट कर दे — तभी राजा सौ वर्ष और जिएगा। यह कठिन उपाय बताकर राजलक्ष्मी अदृश्य हो जाती है, और राजा गुप्त रूप से यह सारा संवाद सुन लेते हैं।

वीरवर घर जाकर अपनी नींद से जगी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती को यह पूरी बात बताता है। यह सुनते ही पुत्र शक्तिधर आनंदित होकर कहता है — "पिताजी, मैं जानता हूँ कि मैं ही आपकी सबसे प्रिय वस्तु हूँ। स्वामी की रक्षा के लिए यदि मुझे अर्पित किया जाए तो मैं धन्य हो जाऊँगा।" वह प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत करता है — "धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्, सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति" (बुद्धिमान को दूसरों के लिए धन और जीवन त्याग देना चाहिए; विनाश निश्चित होने पर उचित कारण से त्याग करना श्रेष्ठ है)। पत्नी वेदरता स्वामी के वेतन के ऋण को चुकाने की बात करती है, और पुत्री वीरवती भी खुशी-खुशी अपने ऐसे पिता और भाई पर गर्व करते हुए इस त्याग में साथ देने को तैयार हो जाती है।

पूरा परिवार देवी सर्वमंगला के मंदिर जाता है। वीरवर देवी की पूजा कर पहले अपने पुत्र शक्तिधर को अर्पित करता है, फिर स्वयं को भी अर्पित कर देता है, और उसे देखकर पत्नी और पुत्री भी वही करती हैं — सब कुछ राजा शूद्रक छिपकर देख रहे होते हैं। यह देखकर राजा भी सोचते हैं कि "मेरे जैसे साधारण जीव तो जन्मते-मरते ही रहते हैं, पर वीरवर जैसा त्यागी संसार में न कभी हुआ, न होगा" — और वे स्वयं भी अपना सब कुछ देवी को अर्पित करने के लिए तैयार हो जाते हैं। राजा के इस अद्भुत त्याग-भाव और सेवक के प्रति स्नेह को देखकर देवी सर्वमंगला प्रत्यक्ष प्रकट होती हैं, राजा को दुःसाहस से रोकती हैं, और वीरवर के पूरे परिवार को जीवनदान देकर सबको पुनर्जीवित कर देती हैं। अगले दिन जब वीरवर फिर से सेवा में हाजिर होता है, तो राजा पूछते हैं कि क्या हुआ — वीरवर विनम्रता से केवल इतना कहता है कि "वह रोती हुई स्त्री मेरे सामने से अदृश्य हो गई, और कोई बात नहीं।" वीरवर की इस निष्ठा और नम्रता से अत्यंत प्रसन्न होकर राजा शूद्रक उसे संपूर्ण कर्णाट प्रदेश उपहार में दे देते हैं।

महत्वपूर्ण श्लोक और भावार्थ

श्लोक सरल भावार्थ
धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
बुद्धिमान व्यक्ति को दूसरों की भलाई के लिए धन और जीवन तक त्याग देना चाहिए — जब विनाश निश्चित हो, तब उचित कारण से त्याग करना ही श्रेष्ठ है।
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥
मेरे जैसे साधारण जीव तो जन्म लेते और मर जाते हैं, पर वीरवर जैसा त्यागी इस संसार में न पहले कभी हुआ है, न आगे होगा।

महत्वपूर्ण शब्दार्थ

संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
दुःसाध्यम् अत्यंत कठिन
प्राबोधयत् जगाया
परार्थे दूसरों की भलाई के लिए
उत्सृजेत् त्याग देना चाहिए
समर्पितवान् समर्पित कर दिया
क्षुद्रजन्तवः छोटे प्राणी
प्रत्यक्षीभूतया प्रत्यक्ष प्रकट होकर
भृत्यवात्सल्येन सेवक के प्रति स्नेह से
सत्त्वोत्कर्षेण सत्त्वगुण की पराकाष्ठा से
सानन्दम् आनंद के साथ

व्याकरण एवं विशेष बिंदु

संधि: स्वावासम् = स्व + आवासम्। तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा। जानाम्यहम् = जानामि + अहम्। धन्योऽहम् = धन्यः + अहम्। जीवितञ्चैव = जीवितम् + च + एव।

समास: गृहीतस्वामिवर्तनस्य — तत्पुरुष समास (गृहीतं स्वामिवर्तनम्)। भृत्यवात्सल्येन — तत्पुरुष समास (भृत्ये वात्सल्यम्)।

प्रत्यय: "विधाय" और "प्रणिपत्य" में ल्यप् प्रत्यय है (उपसर्गयुक्त धातु + ल्यप्)। "समर्पितवान्" में क्तवतु प्रत्यय है (भूतकालिक कृदंत, पुल्लिंग)।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सभी प्रश्नों के हल

प्रश्न 1: एकपदेन उत्तरं लिखत

प्रश्न उत्तर
राज्ञः शूद्रकस्य आयुः केवलं कति दिनानि आसीत्? दिनत्रयम्
वीरवरस्य सर्वप्रियं वस्तु कः आसीत् इति शक्तिधरः वदति? सः स्वयम् (शक्तिधरः)
प्रथमं देव्यै कः समर्पितः? शक्तिधरः
देवी सर्वमङ्गला काम् धृत्वा राजानं वारयति? राज्ञः करम्
राजा वीरवराय किं प्रायच्छत्? समग्रकर्णाटप्रदेशम्

प्रश्न 2: पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत

  • राजलक्ष्मी वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारं ददाति, तदा राजा शूद्रकः वर्षशतं पुनर्जीविष्यति।
  • शक्तिधरः वदति यत् सः एव पितुः प्रियतमः अस्ति, अतः स्वामिजीवितरक्षार्थं विनियुक्तः भवितुं सः धन्यः मन्यते।
  • वीरवरः प्रथमं स्वपुत्रं शक्तिधरं देव्यै समर्पितवान्, ततः स्वयम् अपि आत्मानं समर्पितवान्।
  • वीरवरस्य त्यागं दृष्ट्वा राजा अपि स्वस्य राज्यं जीवितं च देव्यै समर्पयितुम् उद्यतः अभवत्।
  • देवी सर्वमङ्गला राज्ञः सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च प्रीता अभवत्, अतः सा वीरवरं सपरिवारं जीवनदानं दत्तवती।
  • वीरवरस्य त्यागभावं दृष्ट्वा प्रसन्नः राजा तस्मै समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।

प्रश्न 3: बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

प्रश्न सही उत्तर
प्रस्तुत पाठ मूलतः किस नाटक से लिया गया है? मृच्छकटिकम्
मृच्छकटिकम् के रचयिता कौन माने जाते हैं? राजा शूद्रकः
वीरवर के बाद दूसरा कौन देवी को समर्पित हुआ? वीरवरः स्वयम्
'तच्छ्रुत्वा' पद का संधि-विच्छेद क्या है? तत् + श्रुत्वा
'गृहीतस्वामिवर्तनस्य' में कौन-सा समास है? तत्पुरुष समास
देवी सर्वमंगला ने राजा को क्या करने से रोका? साहसेन (आत्म-बलिदान से)

प्रश्न 4: घटनाक्रम के अनुसार वाक्य सजाइए

  1. राजलक्ष्मी वीरवरं दुःसाध्यम् उपायं सूचयति।
  2. वीरवरः स्वगृहं गत्वा पत्नी-पुत्र-दुहित्रे राजलक्ष्मीसंवादं वर्णयति।
  3. शक्तिधरः स्वयं देव्यै समर्पितः भवितुम् इच्छति।
  4. वीरवरः पुत्रं, स्वयं, पत्नीं दुहितरं च देव्यै समर्पयति।
  5. देवी प्रत्यक्षा भूत्वा राजानं वारयति, सर्वान् जीवनदानं ददाति।
  6. प्रसन्नः राजा वीरवराय कर्णाटप्रदेशं ददाति।

प्रश्न 5: रिक्तस्थान पूर्ति (पाठ के आधार पर)

अपूर्ण वाक्य सही शब्द
धनानि जीवितञ्चैव ______ प्राज्ञ उत्सृजेत्। परार्थे
सन्निमित्ते वरं ______ विनाशे नियते सति। त्यागः
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः ______। क्षुद्रजन्तवः
वत्स! प्रसन्ना भवामि त्वां, अलं ______। साहसेन

परियोजनाकार्यम्

  • वीरवर के परिवार के त्याग और राजा शूद्रक के त्याग की तुलना करते हुए पाँच वाक्य लिखें कि दोनों में क्या समानता है।
  • "सन्निमित्ते वरं त्यागः" — इस विचार को अपने दैनिक जीवन के किसी उदाहरण से जोड़कर एक छोटा अनुच्छेद लिखें।

परीक्षा हेतु त्वरित सुझाव

  • पूरे परिवार के त्याग का क्रम याद रखें — पहले पुत्र शक्तिधर, फिर वीरवर स्वयं, फिर पत्नी और पुत्री।
  • दोनों प्रमुख श्लोक ("धनानि जीवितञ्चैव..." और "जायन्ते च म्रियन्ते च...") अर्थ सहित कंठस्थ करें — ये व्याख्या में बार-बार पूछे जाते हैं।
  • पाठ 10 और 11 को जोड़कर पूरी कहानी का सार एक साथ दोहराएँ, क्योंकि परीक्षा में दोनों भागों से मिलाकर प्रश्न आ सकते हैं।
  • अंत में राजा द्वारा वीरवर को कर्णाट प्रदेश देने का प्रसंग और उसका कारण (निष्ठा और नम्रता) ठीक से समझें।

Naina Saini

"Naina Saini is an Editorial Intern at Aapbiti, specializing in publishing and managing education-focused news articles. Operating under the direct mentorship and guidance of Shakti Rao Mani, the Product Owner of aapbiti.com, Naina is dedicated to delivering accurate, timely, and engaging academic updates. Her role focuses on keeping readers informed about educational trends, exams, admissions, and key academic policies."

Comments (0)

User