NCERT Class 9 Science Chapter 13: पृथ्वी एक तंत्र के रूप में (Earth as a System) - सम्पूर्ण हिंदी व्याख्या
NCERT Class 9 Science (Exploration) के नए पाठ्यक्रम पर आधारित Chapter 13 "Earth as a System: Energy, Matter, and Life" की विस्तृत हिंदी व्याख्या। इस लेख में पृथ्वी के पाँचों मण्डल, सौर स्थिरांक, Albedo, ग्रहीय पवनें, महासागरीय धाराएँ, चारों मुख्य जैव भू-रसायन चक्र (जल, कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन) और अभ्यास के महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक हल आसान भाषा में प्रस्तुत किए गए हैं।
NCERT Class 9 Science Chapter 13 – पृथ्वी एक तंत्र के रूप में: ऊर्जा, पदार्थ और जीवन | सम्पूर्ण हिंदी व्याख्या 2026-27
NCERT Class 9 Science (Exploration) के Chapter 13 "Earth as a System: Energy, Matter, and Life" में पृथ्वी के पाँच परस्पर क्रियाशील मण्डलों — भूमण्डल, जलमण्डल, हिममण्डल, वायुमण्डल और जैवमण्डल — के आपसी संबंध को समझाया गया है। इस अध्याय में सौर विकिरण, पृथ्वी का असमान ताप, स्थानीय एवं ग्रहीय पवनें, महासागरीय धाराएँ, चार प्रमुख जैव भू-रसायन चक्र (जल, कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन) और मानव गतिविधियों के प्रभावों को विस्तार से बताया गया है। यह Chapter बोर्ड परीक्षा, Olympiad और पर्यावरण विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| Chapter Number | 13 |
| Chapter Name | Earth as a System: Energy, Matter, and Life |
| Subject | Science – Exploration (NCERT 2026-27) |
| Class | 9 |
| मुख्य Topics | पृथ्वी के मण्डल, सौर विकिरण, Albedo, पवनें, महासागरीय धाराएँ, बायोजियोकेमिकल चक्र, मानव प्रभाव |
| पाँच मण्डल | Geosphere, Hydrosphere, Cryosphere, Atmosphere, Biosphere |
| प्रमुख चक्र | जल चक्र, कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र |
| Solar Constant | 1.4 kWm⁻² (1400 J s⁻¹m⁻²) |
| पिछला Chapter | Chapter 12 – जीवन के पैटर्न: विविधता और वर्गीकरण |
Chapter 13 किस बारे में है और यह क्यों पढ़ें?
पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता ऊर्जा और पदार्थ के अनवरत प्रवाह पर निर्भर है। सूर्य इस ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है। इसके अलावा पृथ्वी का गर्म आंतरिक भाग और वायु, जल तथा चट्टानों में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ भी ऊर्जा और पदार्थ के प्रवाह को संचालित करती हैं। Chapter 13 इन सभी प्रक्रियाओं को एक एकीकृत पृथ्वी तंत्र (Earth System) के रूप में प्रस्तुत करता है।
पिछली कक्षाओं में आपने सूर्यप्रकाश से पवन और जल चक्र, पादपों द्वारा पोषक तत्वों का चक्रण, पृथ्वी के झुकाव से ऋतुएँ और मानव गतिविधियों से जलवायु पर प्रभाव — इन्हें अलग-अलग पढ़ा था। यह Chapter इन सभी प्रक्रियाओं को एक साथ एक तंत्र के रूप में समझाता है। पर्यावरण विज्ञान, जलवायु परिवर्तन, कृषि नीति और स्थायी विकास को समझने के लिए यह Chapter आधार-शिला है। परीक्षा में इससे Objective, Case Study और विस्तृत उत्तर — तीनों प्रकार के प्रश्न आते हैं।
पृथ्वी के पाँच मण्डल (Five Spheres of the Earth)
पृथ्वी को पाँच परस्पर क्रियाशील मण्डलों में बाँटा गया है। इनमें से किसी एक मण्डल में परिवर्तन आने पर शेष मण्डल भी प्रभावित होते हैं — यही Earth System Thinking का मूल है।
| मण्डल | परिभाषा | भारतीय उदाहरण |
|---|---|---|
| भूमण्डल (Geosphere) | ठोस चट्टानें, मिट्टी, भू-आकृतियाँ और पृथ्वी का आंतरिक भाग | दक्कन पठार, थार मरुस्थल |
| जलमण्डल (Hydrosphere) | महासागर, नदियाँ, झीलें और भूजल | गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र |
| हिममण्डल (Cryosphere) | जल का ठोस रूप — बर्फ और हिम | हिमालयी हिमनद, लद्दाख, ध्रुवीय हिम |
| वायुमण्डल (Atmosphere) | पृथ्वी को घेरने वाली वायु परत | पर्वतों और वनों की स्वच्छ हवा |
| जैवमण्डल (Biosphere) | सभी जीव-जंतु और उनके आवास | मैंग्रोव, वन, खेत, समुद्री प्लवक, प्रवाल भित्तियाँ |
इन मण्डलों की परस्पर निर्भरता का एक सजीव उदाहरण भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून है। अरब सागर का जल अधिक गर्म होने से वाष्पीकरण बढ़ता है, जो मानसून में उतार-चढ़ाव लाता है — कहीं बाढ़, कहीं सूखा। साथ ही वायुमण्डलीय तापमान में वृद्धि हिमनदों को तेज़ी से पिघलाती है, समुद्र का जलस्तर बढ़ता है और तटीय नगरों को खतरा उत्पन्न होता है जिससे जैवमण्डल में आवास-हानि होती है।
13.1 पृथ्वी का असमान ताप (Uneven Heating of the Earth)
सौर विकिरण पृथ्वी पर ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है। यह विद्युत चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) के रूप में निर्वात में प्रकाश की गति (3 × 10⁸ m s⁻¹) से यात्रा करके पृथ्वी तक पहुँचता है। ध्वनि तरंगों के विपरीत, EM तरंगों को माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
EM तरंगें गामा किरणों (उच्च ऊर्जा, लघु तरंगदैर्घ्य) से लेकर रेडियो तरंगों (निम्न ऊर्जा, दीर्घ तरंगदैर्घ्य) तक का विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum) बनाती हैं। सूर्य की 99% ऊर्जा पराबैंगनी (UV), दृश्य (Visible) और अवरक्त (Infrared) क्षेत्र में होती है — ये तीन क्षेत्र पृथ्वी की जलवायु और जीवन को आकार देते हैं।
- UV विकिरण (100–400 nm): ओज़ोन परत इसे मुख्यतः अवशोषित करती है। दृश्य प्रकाश की तुलना में इसकी ऊर्जा बहुत अधिक है। लंबे समय तक UV के संपर्क से आँखें और त्वचा क्षतिग्रस्त हो सकती हैं, कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। UV किरणें जल शोधकों में कीटाणु मारने और प्रतिदीप्त (fluorescent) बल्बों में भी उपयोगी हैं।
- दृश्य प्रकाश: पृथ्वी की सतह तक पहुँचकर प्रकाश-संश्लेषण के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।
- अवरक्त विकिरण (Infrared): पृथ्वी की सतह गर्म करता है; सतह इसे पुनः-विकिरण करती है।
पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा को Insolation कहते हैं। पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल में सूर्य की किरणों के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्रति इकाई समय में प्राप्त होने वाली औसत सौर ऊर्जा को सौर स्थिरांक (Solar Constant) कहते हैं। इसका मान लगभग 1.4 kWm⁻² (1400 J s⁻¹m⁻²) है। वायुमण्डलीय गैसों, बादलों और धूल-कणों द्वारा अवशोषण और प्रकीर्णन के बाद धरातल पर अधिकतम Insolation लगभग 1 kWm⁻² (स्वच्छ आकाश में) रहती है। भारत उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होने के कारण वर्षभर प्रचुर धूप प्राप्त करता है — यही दक्षिण-पश्चिम मानसून और विशाल सौर ऊर्जा क्षमता का आधार है।
Anna Mani — भारत की सौर विकिरण अग्रदूत
Anna Mani ने 1950 के दशक में पूरे भारत में Insolation का मानचित्रण किया। S. Rangarajan के साथ मिलकर 1982 में Solar Radiation Over India प्रकाशित किया — यह भारत का पहला Insolation Atlas था। उनके अग्रणी मापों ने भारत की विशाल सौर ऊर्जा क्षमता उजागर की, जो आज देशभर में बड़े पैमाने पर Solar Power Deployment के रूप में साकार हो रही है।
Example 13.1 — सौर ऊर्जा की गणना
यदि पृथ्वी की सतह पर Insolation 1 kWm⁻² हो, तो एक घंटे में 1 m² क्षेत्रफल पर कितनी ऊर्जा प्राप्त होगी?
हल: E = Intensity × Area × Time = 1000 J s⁻¹m⁻² × 1 m² × 3600 s = 3.6 × 10⁶ J
यह ऊर्जा 5 kg बर्फ को पिघलाने और उससे प्राप्त जल को 100°C तक गर्म करने के लिए पर्याप्त है — और एक घरेलू बिजली यूनिट (जो बिजली बिल पर दिखती है) के बराबर भी।
13.1.1 सौर विकिरण और सतह का ताप — Albedo क्या है?
विभिन्न सतहें सूर्य के प्रकाश को अलग-अलग मात्रा में अवशोषित और परावर्तित करती हैं। गहरी (dark) सतहें अधिक सूर्यप्रकाश अवशोषित करती हैं और हल्के रंग की सतहें अधिक परावर्तित करती हैं। किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण के अनुपात को Albedo कहते हैं (शब्द लैटिन के 'श्वेतता' से आया है)।
- उच्च Albedo सतहें अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं → ठंडी रहती हैं।
- निम्न Albedo सतहें अधिक ताप अवशोषित करती हैं → जल्दी गर्म होती हैं।
| पदार्थ | Albedo | प्रभाव |
|---|---|---|
| बर्फ (Snow) | 0.80 – 0.90 | अधिकांश विकिरण परावर्तित — ध्रुवीय क्षेत्र अत्यंत ठंडे |
| हिम (Ice) | 0.50 – 0.70 | उच्च Albedo |
| कुचली चट्टान (Crushed Rock) | 0.25 – 0.30 | मध्यम Albedo |
| हल्की मिट्टी (Light-coloured Soil) | 0.25 – 0.45 | मध्यम Albedo |
| काली मिट्टी (Black Soil) | 0.05 – 0.15 | निम्न Albedo — अधिक ताप अवशोषण |
| समुद्री जल (Ocean Water) | 0.06 – 0.10 | निम्न Albedo — अपेक्षाकृत गर्म |
सभी वस्तुएँ ताप का पुनः-विकिरण भी करती हैं। कंक्रीट के घर में रात को भी गर्मी रहती है क्योंकि दिन में अवशोषित ताप रात को पुनः-विकिरित होता है। मोटी मिट्टी और लकड़ी की दीवारों वाले पारंपरिक घर कम पुनः-विकिरण के कारण गर्मियों में भी ठंडे रहते हैं।
नगरीय ताप द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island Effect)
नगर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं — विशेषकर गर्मियों में और रात के समय। इस्पात, कंक्रीट, ईंट और डामर से बने भवन एवं सड़कें सौर विकिरण अवशोषित करके ताप रोकती हैं। इनसे पुनः-विकिरित ताप नगरों को आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म बनाता है। इससे एयर-कंडीशनिंग की माँग और बढ़ती है, जो शहरी पारितंत्र पर अतिरिक्त दबाव डालती है। ग्रामीण क्षेत्रों और वनों में वनस्पति की छाया और वाष्पोत्सर्जन तापमान कम रखते हैं। यह प्रभाव दर्शाता है कि मानव भूमि उपयोग स्थानीय जलवायु बदल सकता है।
13.1.2 अक्षांश और पृथ्वी की आकृति का प्रभाव
पृथ्वी की गोलाकार आकृति के कारण सूर्य की किरणें विभिन्न अक्षांशों पर अलग-अलग कोणों पर पड़ती हैं। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें एक छोटे क्षेत्र पर संकेंद्रित होती हैं → ताप अधिक → वर्षभर गर्म। ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें बड़े क्षेत्र पर फैलती हैं → ताप कम → अत्यधिक ठंड। यह असमान ताप भूमध्यरेखा और ध्रुवों के बीच तापमान-अंतर उत्पन्न करता है जो वैश्विक पवनों और महासागरीय धाराओं का मूल कारण है। इसके अलावा पृथ्वी की अक्ष का झुकाव ऋतुओं और दिन की बदलती अवधि के लिए उत्तरदायी है।
13.1.3 वायुमण्डल की संरचना और भूमिका
वायुमण्डल पृथ्वी के गुरुत्व द्वारा बँधी वायु की परत है। इसमें मुख्यतः नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) के साथ आर्गन, CO₂, जलवाष्प और अन्य गैसें हैं। यह जीवन की सुरक्षा दो प्रकार से करता है:
- आवक विकिरण का अवशोषण: ओज़ोन परत हानिकारक UV किरणें रोकती है। बादल और गैसें कुछ सूर्यप्रकाश को सतह तक पहुँचने से पहले ही अवशोषित कर लेती हैं।
- बाहर जाने वाले ताप को रोकना — Greenhouse Effect: पृथ्वी की सतह सूर्यप्रकाश अवशोषित करके अवरक्त (IR) विकिरण के रूप में ताप पुनः-विकिरित करती है। CO₂, CH₄ और जलवाष्प जैसी greenhouse गैसें यह ताप अवशोषित करती हैं और उसे अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं — इससे पृथ्वी जीवन के अनुकूल गर्म बनी रहती है। मानव गतिविधियों से अतिरिक्त CO₂ इस प्रभाव को बढ़ाकर वैश्विक ताप-वृद्धि का कारण बन रही है।
| परत (Layer) | ऊँचाई | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| क्षोभमण्डल (Troposphere) | 0 – 12 km | मौसम निर्माण; ऊँचाई के साथ तापमान घटता है (~6.5°C/km); भूमध्यरेखा पर ऊँचाई अधिक, ध्रुवों पर कम |
| समतापमण्डल (Stratosphere) | 12 – 50 km | ओज़ोन परत UV अवशोषित करती है; ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता है; वायु का ऊर्ध्वाधर मिश्रण नहीं → मौसम-घटनाएँ यहाँ नहीं होतीं |
| मध्यमण्डल (Mesosphere) | 50 – 80 km | तापमान पुनः घटता है |
| तापमण्डल (Thermosphere) | 80 – 700 km | अत्यधिक ऊँचा तापमान; संचार उपग्रह यहीं |
| बहिर्मण्डल (Exosphere) | 700 km से आगे | धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन; 100 km पर बाह्य अंतरिक्ष की सीमा |
ओज़ोन परत क्यों महत्वपूर्ण है?
ओज़ोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक UV विकिरण को अवशोषित करके जीवन की रक्षा करती है। 20वीं सदी के अंत में रेफ्रिजरेटर और एयरोसॉल में प्रयुक्त मानव-निर्मित रसायन Chlorofluorocarbons (CFCs) ने अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत को गंभीर रूप से नष्ट किया — इसे ओज़ोन छिद्र (Ozone Hole) कहा गया। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल द्वारा CFCs के उपयोग में वैश्विक कटौती की गई और अब ओज़ोन परत धीरे-धीरे ठीक हो रही है — यह अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग की सफलता का प्रमाण है।
13.2 असमान ताप से पवनें और महासागरीय धाराएँ (Uneven Heating Causes Wind and Ocean Currents)
वायु सदैव उच्च दाब से निम्न दाब की ओर प्रवाहित होती है। ये दाबांतर मुख्यतः सूर्य द्वारा पृथ्वी की सतह के असमान ताप के कारण उत्पन्न होते हैं।
13.2.1 स्थानीय पवनें — घाटी समीर और पर्वत समीर
पर्वतीय क्षेत्रों में ढलानें और घाटी की तली समान दर से गर्म और ठंडी नहीं होतीं। इससे दो प्रकार की स्थानीय पवनें (Local Winds) जन्म लेती हैं:
- घाटी समीर (Valley Breeze) — दिन में: सूर्य के प्रकाश में पर्वत की ढलानें घाटी की तली से जल्दी गर्म होती हैं। ढलान की गर्म हवा ऊपर उठती है और निम्न दाब का क्षेत्र बनाती है। घाटी से ठंडी हवा ढलान की ओर प्रवाहित होती है — यही घाटी समीर है।
- पर्वत समीर (Mountain Breeze) — रात में: सूर्यास्त के बाद ढलानें तेज़ी से ठंडी होती हैं जबकि घाटी की तली अपेक्षाकृत गर्म रहती है। ठंडी, सघन हवा ढलान से नीचे घाटी में बहती है — यही पर्वत समीर है।
शिमला, देहरादून और हिमालय की घाटियों में इन पवनों का दैनिक चक्र अनुभव किया जाता है। ये स्थानीय पवनें तापमान, नमी और मिट्टी तथा फसल के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं — कृषि के लिए ये विशेष महत्व रखती हैं।
13.2.2 ग्रहीय पवनें (Planetary Winds)
भूमध्यरेखा और ध्रुवों के बीच पृथ्वी के असमान ताप से दाब की बड़ी पेटियाँ (Pressure Belts) बनती हैं। इनसे उत्पन्न होने वाली वैश्विक पवनों को ग्रहीय पवनें (Planetary Winds) कहते हैं।
- भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी (Equatorial Low): तीव्र सौर ताप से गर्म हवा ऊपर उठती है। यह ऊँचाई पर ध्रुवों की ओर जाती है।
- उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी (Sub-tropical High, 30° N/S): ऊपर आई हवा ठंडी होकर नीचे आती है। यहाँ से कुछ हवा वापस भूमध्यरेखा की ओर और कुछ ध्रुवों की ओर बहती है।
- उपध्रुवीय निम्न दाब पेटी (Sub-polar Low, 60° N/S): उष्णकटिबंध की गर्म हवा और ध्रुवों की ठंडी हवा मिलती हैं → हवा ऊपर उठती है।
- ध्रुवीय उच्च दाब पेटी (Polar High, 90° N/S): अत्यधिक ठंड से हवा सघन होकर नीचे बैठती है।
पृथ्वी के घूर्णन के कारण ये पवनें सीधे न बहकर मुड़ी हुई दिशा में चलती हैं — उत्तरी गोलार्द्ध में दाहिनी ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर।
13.2.3 महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)
महासागरीय धाराएँ बड़े पैमाने पर समुद्री जल की निरंतर गति हैं। इन्हें प्रभावित करने वाले कारक हैं — ग्रहीय पवनें, तापमान और लवणता में अंतर, पृथ्वी का घूर्णन तथा महाद्वीपों का वितरण।
- उष्ण भूमध्यरेखीय जल सतह पर ध्रुवों की ओर बहता है।
- ठंडा, सघन जल गहरे स्तरों से भूमध्यरेखा की ओर लौटता है।
- लवणता का प्रभाव: कम लवणता वाला जल कम सघन होने से सतह पर रहता है। अधिक लवणता वाला भारी जल गहराई में जाता है।
- पृथ्वी के घूर्णन से ये जलराशियाँ Gyres बनाती हैं — उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्त (Counter-clockwise)। महाद्वीप इन पथों को अवरुद्ध और मोड़कर और अधिक संशोधित करते हैं।
महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की जलवायु संतुलित करती हैं और जीवन का समर्थन करती हैं। उदाहरण: North Atlantic Drift (Gulf Stream का विस्तार) यूरोप के उत्तर-पश्चिमी तट को सर्दियों में भी बर्फ-मुक्त रखती है — व्यापार और वाणिज्य को सहारा देती है। महासागरीय धाराएँ पोषक तत्वों का परिवहन करके विशाल समुद्री पारितंत्र का भी समर्थन करती हैं।
13.3 जैव भू-रसायन चक्र (Biogeochemical Cycles)
सजीव प्राणी अपने आसपास की वायु, जल, मिट्टी और चट्टानों के साथ निरंतर पदार्थ और ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। अजैविक (Abiotic) और जैविक (Biotic) घटकों के बीच पदार्थ और ऊर्जा की इस चक्रीय गति को जैव भू-रसायन चक्र (Biogeochemical Cycle) कहते हैं। इससे कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व पुनर्चक्रित होकर जीवन के लिए उपलब्ध बने रहते हैं। विभिन्न पारितंत्रों के बीच यह गतिशील संबंध पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है।
13.3.1 जल चक्र (Water Cycle)
जल नदियों, झीलों और महासागरों से वाष्पित होता है → बादल बनते हैं → वर्षा, ओले या बर्फ के रूप में सतह पर लौटता है → महासागर में मिलता है। कुछ जल मिट्टी और चट्टानों में रिसकर भूजल बनाता है। जल मिट्टी और चट्टानों से खनिज घोलता है, स्थलीय जीवों का आधार है और इन पोषक तत्वों को महासागर तक पहुँचाकर समुद्री जीवन का समर्थन करता है।
जलवायु परिवर्तन अब जल चक्र को प्रभावित कर रहा है:
- गर्म वायुमण्डल अधिक नमी धारण करता है → कुछ क्षेत्रों में तीव्र मानसून, अन्य में सूखा।
- हिमनद पिघलने से नदियों में अतिरिक्त जल, दीर्घकाल में समुद्र-स्तर वृद्धि → मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय नगरों को खतरा।
- तीव्र वर्षा से अधिक बहाव (Runoff) → मिट्टी कटाव।
- कम अंतःस्पंदन (Infiltration) → भूजल पुनर्भरण में कमी → शुष्क महीनों में कृषि कठिन।
इस प्रकार जल चक्र — हिममण्डल (हिमनद), जलमण्डल (नदियाँ, महासागर), वायुमण्डल (नमी), भूमण्डल (मिट्टी कटाव) और जैवमण्डल (फसल, मत्स्य पालन) — सभी मण्डलों को जोड़ता है।
13.3.2 कार्बन चक्र (Carbon Cycle)
कार्बन जीवन की रीढ़ है — प्रत्येक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और DNA अणु में कार्बन होता है। यह वायुमण्डल (CO₂ गैस), जैवमण्डल (पेड़-पौधे, जंतु), भूमण्डल (कार्बोनेट चट्टानें, जीवाश्म ईंधन) और जलमण्डल (घुला CO₂, समुद्री खोल) के बीच निरंतर चक्रित होता है।
कार्बन चक्र दो गति से चलता है:
- तीव्र चक्र (Fast Cycle — दिनों से वर्षों में): पादप प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) से वायुमण्डलीय CO₂ को ग्लूकोज़ में बदलते हैं। श्वसन और अपघटन से CO₂ पुनः वायुमण्डल में लौटती है। महासागर वायुमण्डलीय CO₂ अवशोषित कर कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट आयन बनाता है। Phytoplankton इनका उपयोग करते हैं; कुछ समुद्री जीव खोल बनाते हैं। मृत जीव समुद्री तल पर दीर्घकाल के लिए कार्बन-भंडार बन जाते हैं।
- मंद चक्र (Slow Cycle — लाखों वर्षों में): मृत जीव दबकर जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) बनते हैं। इनके दहन से कार्बन अत्यंत तीव्र गति से CO₂ के रूप में वायुमण्डल में लौट आता है।
1960 से मानव गतिविधियों — जीवाश्म ईंधन दहन और वनों की कटाई — ने वायुमण्डलीय CO₂ को 315 ppm से बढ़ाकर 420 ppm (लगभग 35% वृद्धि) कर दिया है। यह मानव सभ्यता के इतिहास में अभूतपूर्व वृद्धि है जिसे Keeling Curve में दर्शाया गया है। इसके sawtooth pattern में उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल के दौरान पादप-वृद्धि से CO₂ में मौसमी गिरावट दिखती है।
जबकि संतुलित CO₂ पृथ्वी को जीवन-अनुकूल गर्म रखती है, अत्यधिक CO₂ greenhouse effect बढ़ाकर वैश्विक ताप-वृद्धि, हिमनद पिघलाव, आर्कटिक समुद्री बर्फ घटाव, समुद्र-स्तर वृद्धि और अत्यधिक मौसमी घटनाएँ उत्पन्न करती है।
13.3.3 नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
नाइट्रोजन सभी जीवों में प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण के लिए अनिवार्य है। वायुमण्डल में नाइट्रोजन का सबसे बड़ा भंडार है, किंतु N₂ गैस अक्रिय (Non-reactive) है — पेड़-पौधे और जंतु इसे सीधे उपयोग नहीं कर सकते। इसे पहले घुलनशील यौगिकों में बदलना पड़ता है।
| चरण | प्रक्रिया | जिम्मेदार सूक्ष्मजीव/प्रक्रिया |
|---|---|---|
| नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) | N₂ → NH₃ (अमोनिया) | Rhizobium (दलहन की जड़ ग्रंथिकाओं में), Azotobacter (मिट्टी में); बिजली भी कुछ N₂ स्थिर करती है |
| नाइट्रीकरण — चरण 1 (Nitrification) | NH₃ → NO₂⁻ (नाइट्राइट) | Nitrosomonas |
| नाइट्रीकरण — चरण 2 | NO₂⁻ → NO₃⁻ (नाइट्रेट) | Nitrobacter |
| स्वांगीकरण (Assimilation) | पौधे मिट्टी से नाइट्रेट अवशोषित करते हैं; जंतु पौधे खाकर नाइट्रोजन पाते हैं | पादप और जंतु |
| अमोनीकरण (Ammonification) | कार्बनिक नाइट्रोजन → NH₃ | अपघटक बैक्टीरिया और फफूँद |
| विनाइट्रीकरण (Denitrification) | NO₃⁻ → N₂ (वायुमण्डल में वापस) | Pseudomonas |
Haber-Bosch प्रक्रिया (20वीं सदी की शुरुआत) में वायुमण्डलीय नाइट्रोजन से कृत्रिम रूप से अमोनिया बनाई जाती है। यह अधिकांश उर्वरकों का आधार है जिसे "वायु से रोटी (Bread from Air)" भी कहा जाता है। भारत की हरित क्रांति इसी पर टिकी थी। आज मानव शरीर में आधे से अधिक नाइट्रोजन परमाणु इसी प्रक्रिया से आते हैं। हालाँकि यह वैश्विक ऊर्जा का 1-2% उपयोग करती है और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी और जल का क्षरण भी हुआ है।
13.3.4 ऑक्सीजन चक्र (Oxygen Cycle)
वायुमण्डल में लगभग 21% मुक्त ऑक्सीजन (O₂) है। ऑक्सीजन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल और वसा सहित अधिकांश जैविक अणुओं का आवश्यक घटक है। यह भूपर्पटी में धातु ऑक्साइड व खनिजों के रूप में और CO₂ के रूप में वायु में भी पाई जाती है। ऑक्सीजन चक्र तीन मुख्य प्रक्रियाओं पर आधारित है:
- श्वसन (Respiration): सभी जीव O₂ उपभोग करते हैं और CO₂ छोड़ते हैं।
- दहन (Combustion): ईंधन दहन से O₂ उपभोग होती है और CO₂ निकलती है।
- प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis): पौधे सूर्यप्रकाश, जल और CO₂ से ग्लूकोज़ बनाकर O₂ छोड़ते हैं — यही O₂ की मुख्य आपूर्ति है।
उपभोग (श्वसन और दहन) और उत्पादन (प्रकाश-संश्लेषण) के बीच यह संतुलन वायुमण्डल, भूमि, महासागर और सजीव जीवों के बीच ऑक्सीजन का संचरण सुनिश्चित करता है और पृथ्वी के सभी मण्डलों में जीवन को बनाए रखता है।
13.4 पृथ्वी की प्रक्रियाओं पर मानव प्रभाव (Human Impact on Earth's Processes)
मानव गतिविधियाँ पृथ्वी के सभी मण्डलों और बायोजियोकेमिकल चक्रों को बाधित कर रही हैं। पिछले 50 वर्षों में पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणालियों में उल्लेखनीय परिवर्तन आए हैं।
- CO₂ वृद्धि और महासागर अम्लीकरण: अतिरिक्त वायुमण्डलीय CO₂ महासागर द्वारा अवशोषित होकर समुद्री जल को अम्लीय (Acidic) बनाती है — यह प्लवकों और प्रवाल भित्तियों को खतरे में डालती है। परंतु गर्म महासागर का जल CO₂ को उतने प्रभावी ढंग से अवशोषित नहीं कर पाता।
- Greenhouse गैसें और वैश्विक ताप-वृद्धि: जीवाश्म ईंधन के दहन और वनों की कटाई से प्राकृतिक carbon sinks (वन और महासागर) संतृप्त हो रहे हैं। भारत में जीवाश्म ईंधन अभी भी बड़े हिस्से की बिजली पैदा करते हैं, यद्यपि सौर ऊर्जा की तेज़ वृद्धि आशा जगाती है।
- यूट्रोफिकेशन (Eutrophication): खेती में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से नाइट्रेट नदियों और झीलों में मिलते हैं। इससे शैवाल की अनियंत्रित वृद्धि (Algal Bloom) होती है जो ऑक्सीजन समाप्त करके मछलियाँ मार देती है — यह जल निकायों और तटीय मत्स्य पालन को गंभीर खतरा है।
- वनों की कटाई (Deforestation) के बहु-आयामी प्रभाव:
- प्रकाश-संश्लेषण और वाष्पोत्सर्जन कम → स्थानीय वर्षा में कमी।
- Albedo बदलती है।
- वृक्षों की जड़ें न रहने से मिट्टी कटाव बढ़ता है।
- आवास नष्ट → जैव विविधता हानि।
- वाहन उत्सर्जन और भूमि-स्तरीय ओज़ोन: वाहनों का उत्सर्जन सूर्यप्रकाश से मिलकर धुंध (Smog) बनाता है और भूमि-स्तर पर ओज़ोन उत्पन्न करता है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। (समतापमण्डल में ओज़ोन जीवन-रक्षक है; भूमि-स्तर पर हानिकारक।)
वैश्विक सहयोग से समाधान संभव है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ओज़ोन पुनर्प्राप्ति का सफल उदाहरण है। Kyoto Protocol और Paris Agreement CO₂ उत्सर्जन कम करने के प्रयास हैं जो अपेक्षाकृत कम सफल रहे हैं। नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन), वृक्षारोपण, जल संरक्षण और टिकाऊ खेती से संतुलन पुनः स्थापित किया जा सकता है। भारत ने अरबों वृक्ष लगाए हैं और सौर ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार किया है। व्यक्तिगत स्तर पर संसाधनों की बचत, अपशिष्ट न्यूनीकरण और पुनर्चक्रण से भी योगदान हो सकता है। Mission LiFE (Lifestyle for Environment) इसी विचार को वैश्विक मंच पर भारत का योगदान है।
Revise Reflect Refine — परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण उत्तर
Q1: बायोजियोकेमिकल चक्रों की भूमिका क्या है?
उत्तर: (ii) जैविक और अजैविक घटकों के बीच आवश्यक पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करना।
Q2: पृथ्वी के ताप के लिए मुख्यतः क्या उत्तरदायी है?
उत्तर: (iii) पृथ्वी की सतह सौर विकिरण अवशोषित करती है, जो पुनः-विकिरण होकर greenhouse गैसों द्वारा रोकी जाती है।
Q3: जलवायु परिवर्तन जल चक्र को कैसे प्रभावित करता है?
गर्म वायुमण्डल अधिक नमी धारण करता है → कहीं तीव्र मानसून, कहीं सूखा। हिमनद पिघलने से नदियों में जल बढ़ता है; दीर्घकाल में समुद्र-स्तर वृद्धि — मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय नगर खतरे में। तीव्र वर्षा से मिट्टी कटाव और भूजल पुनर्भरण में कमी → कृषि संकट।
Q4: Albedo पृथ्वी की जलवायु को कैसे प्रभावित करता है?
बर्फ का Albedo 0.80–0.90 → ध्रुवीय क्षेत्र ठंडे। काली मिट्टी और महासागर का Albedo 0.05–0.10 → अधिक ताप अवशोषण → अपेक्षाकृत गर्म। यदि ध्रुवीय बर्फ पिघले तो Albedo घटेगा → अधिक ताप अवशोषण → और अधिक पिघलाव — यह एक Positive Feedback Loop है।
Q5: पर्वत और घाटी समीर कैसे बनती हैं? घास से ढका बनाम चट्टानी पर्वत — क्या अंतर?
दिन में ढलान जल्दी गर्म → हवा ऊपर उठे → घाटी से हवा आए = घाटी समीर। रात में ढलान जल्दी ठंडी → भारी हवा नीचे = पर्वत समीर। घास से ढकी ढलान का Albedo अधिक और वाष्पोत्सर्जन से ठंडक — पर्वत समीर तुलनात्मक रूप से ठंडी। चट्टानी ढलान का Albedo कम, ताप-अवशोषण अधिक — पर्वत समीर अपेक्षाकृत गर्म।
Q6: मौसम की घटनाओं के लिए कौन-सी परत उत्तरदायी है?
क्षोभमण्डल (Troposphere) — यह पृथ्वी की सतह से गर्म होता है। ऊँचाई के साथ तापमान घटने से गर्म हवा ऊपर उठती है और पवन व तूफान पैदा होते हैं।
Q7: नाइट्रोजन चक्र की प्रक्रियाएँ? यदि नाइट्रोजन न चक्रित हो?
Fixation (Rhizobium, Azotobacter) → Nitrification (Nitrosomonas, Nitrobacter) → Assimilation → Ammonification → Denitrification (Pseudomonas)। यदि चक्र रुके तो पौधे उपयोग-योग्य नाइट्रोजन न पाएँ → प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्ल संश्लेषण रुके → समस्त जीवन संकट में।
Q8: वनों की कटाई का ऑक्सीजन और कार्बन चक्र पर प्रभाव?
प्रकाश-संश्लेषण में कमी → O₂ उत्पादन घटे; CO₂ अवशोषण कम → वायुमण्डल में CO₂ बढ़े; Greenhouse effect तीव्र। वाष्पोत्सर्जन कम → स्थानीय वर्षा में कमी। Albedo बदले। मिट्टी कटाव और जैव विविधता हानि।
Q10: CO₂ की अधिकता अवांछनीय क्यों, जबकि पौधों को चाहिए?
पौधों के लिए संतुलित CO₂ आवश्यक है, परंतु अत्यधिक CO₂ greenhouse effect बढ़ाती है → वैश्विक ताप-वृद्धि → हिमनद पिघलाव → समुद्र-स्तर वृद्धि → अत्यधिक मौसमी घटनाएँ → पारितंत्र असंतुलन। संतुलन महत्वपूर्ण है।
Q11: पृथ्वी की सतह से ताप कैसे नष्ट होता है?
पृथ्वी की सतह अवरक्त (IR) विकिरण के रूप में ताप पुनः-विकिरण करती है। Greenhouse गैसें इसका एक भाग रोकती हैं — शेष अंतरिक्ष में जाता है। यह ऊर्जा संतुलन पृथ्वी का तापमान जीवन-अनुकूल बनाए रखता है।
Q12: यदि पृथ्वी गोलाकार की बजाय चपटी होती?
सूर्य की किरणें हर स्थान पर समान कोण पर पड़तीं → समान ताप → भूमध्यरेखा और ध्रुवों में तापमान-अंतर न होता → ग्रहीय पवनें और महासागरीय धाराएँ नहीं बनतीं → मानसून और जलवायु क्षेत्र नहीं होते → जीवन की विविधता और वितरण बिल्कुल अलग होता।
Q13: वायुमण्डलीय तापमान वृद्धि से तीनों मण्डलों पर प्रभाव?
हिममण्डल: हिमनद और ध्रुवीय बर्फ तेज़ी से पिघलेगी। जलमण्डल: नदियों में प्रवाह बढ़ेगा, समुद्र-स्तर ऊँचा होगा, बाढ़ और अनियमित वर्षा। जैवमण्डल: आवास नष्ट होंगे, प्रजातियाँ खतरे में पड़ेंगी, कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव।
Q14: पृथ्वी का वायुमण्डल जीवन के लिए उपयुक्त तापमान कैसे बनाए रखता है?
वायुमण्डल दोहरी भूमिका निभाता है — ओज़ोन परत हानिकारक UV रोकती है जबकि Greenhouse गैसें पृथ्वी से पुनः-विकिरित ताप का एक भाग रोककर तापमान को जीवन-अनुकूल बनाए रखती हैं। वायुमण्डल के बिना पृथ्वी जीवन-समर्थन के लिए अत्यधिक ठंडी होती।
Q15: पृथ्वी के विभिन्न मण्डलों की परस्पर निर्भरता?
उदाहरण — दक्षिण-पश्चिम मानसून: अरब सागर (जलमण्डल) गर्म होने से वाष्पीकरण → बादल (वायुमण्डल) → वर्षा → नदियाँ (जलमण्डल) → फसल वृद्धि (जैवमण्डल) → मिट्टी पोषण (भूमण्डल)। यदि हिमनद (हिममण्डल) पिघलें तो नदियाँ उफनें, समुद्र-स्तर बढ़े और तटीय पारितंत्र (जैवमण्डल) नष्ट हों — सभी मण्डल एक नाज़ुक संतुलन में परस्पर जुड़े हैं।
Aapbiti News Experts की सलाह
Exam Alert — Class 9 Chapter 13 के लिए आवश्यक Tips: इस Chapter में सबसे अधिक Confusion Troposphere बनाम Stratosphere और Fast Cycle बनाम Slow Cycle में होती है। याद रखें — Troposphere में तापमान ऊँचाई के साथ घटता है (इसीलिए मौसम यहीं बनता है) जबकि Stratosphere में बढ़ता है (ओज़ोन UV अवशोषित करता है)। भूमि-स्तरीय ओज़ोन हानिकारक और समतापमण्डलीय ओज़ोन लाभकारी — यह उलझन परीक्षा में कई बार आती है।
नाइट्रोजन चक्र के बैक्टीरिया के नाम परीक्षा में सीधे पूछे जाते हैं — Rhizobium, Azotobacter, Nitrosomonas, Nitrobacter, Pseudomonas — इन्हें उनके कार्य के साथ लिखकर याद करें। Biogeochemical Cycles के प्रश्न Case Study रूप में आते हैं — पाँचों मण्डलों से जोड़कर उत्तर दें। Solar Constant (1.4 kWm⁻²) और Example 13.1 की गणना पद्धति MCQ और Numerical दोनों में उपयोगी है। Albedo के अनुमानित मान (Snow: 0.80–0.90, Ocean: 0.06–0.10) MCQ में आते हैं। Chapter 12 के साथ इस Chapter को जोड़कर पढ़ें — Chapter 12 जैव विविधता और वर्गीकरण की हिंदी व्याख्या Aapbiti पर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)
प्र. पृथ्वी के पाँच मण्डल कौन-कौन से हैं?
पाँच मण्डल हैं — भूमण्डल (Geosphere), जलमण्डल (Hydrosphere), हिममण्डल (Cryosphere), वायुमण्डल (Atmosphere) और जैवमण्डल (Biosphere)। इनमें से एक में परिवर्तन आने पर शेष सभी प्रभावित होते हैं।
प्र. Solar Constant क्या है और इसका मान क्या है?
सौर स्थिरांक पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल में सूर्य की किरणों के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्रति इकाई समय में प्राप्त होने वाली औसत सौर ऊर्जा है। इसका मान लगभग 1.4 kWm⁻² (1400 J s⁻¹m⁻²) है। वायुमण्डलीय प्रभावों के बाद धरातल पर यह लगभग 1 kWm⁻² रह जाती है।
प्र. Albedo क्या है और इसका जलवायु से क्या संबंध है?
Albedo किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण का अनुपात है। बर्फ का Albedo 0.80–0.90 होने से ध्रुवीय क्षेत्र ठंडे रहते हैं। काली मिट्टी और महासागर का Albedo कम होने से वे अधिक ताप अवशोषित करते हैं। ध्रुवीय बर्फ पिघलने से Albedo घटता है → अधिक ताप अवशोषण → और अधिक पिघलाव का दुष्चक्र।
प्र. Eutrophication क्या है?
उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से नाइट्रेट नदियों और झीलों में मिलकर शैवाल की अनियंत्रित वृद्धि (Algal Bloom) करता है। यह शैवाल ऑक्सीजन समाप्त करके मछलियाँ मार देती है। इस प्रक्रिया को Eutrophication कहते हैं — यह जल निकायों और तटीय मत्स्य पालन के लिए गंभीर खतरा है।
प्र. नाइट्रोजन चक्र में Rhizobium और Pseudomonas की क्या भूमिका है?
Rhizobium दलहन की जड़ ग्रंथिकाओं में रहकर वायुमण्डलीय N₂ को अमोनिया में बदलता है (Nitrogen Fixation)। Pseudomonas मिट्टी में नाइट्रेट को वापस N₂ गैस में बदलकर वायुमण्डल में लौटाता है (Denitrification) — इस प्रकार दोनों मिलकर चक्र को पूर्ण करते हैं।
प्र. घाटी और पर्वत समीर में क्या अंतर है?
घाटी समीर दिन में प्रवाहित होती है — घाटी से ढलान की ओर, क्योंकि ढलान जल्दी गर्म होती है। पर्वत समीर रात को प्रवाहित होती है — ढलान से घाटी की ओर, क्योंकि ढलान जल्दी ठंडी होती है। दोनों का कारण असमान ताप से उत्पन्न दाबांतर है।
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