NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 4: Na Khalu Vayastejaso Hetuh | न खलु वयस्तेजसो हेतुः की सम्पूर्ण हिंदी व्याख्या
कक्षा 9 संस्कृत का चतुर्थ पाठ 'न खलु वयस्तेजसो हेतुः' महान बालक्रांतिवीर खुदीराम बोस के प्रेरणादायक जीवन और बलिदान पर आधारित है। इस लेख में आपको पाठ का सरल हिंदी सारांश, भावार्थ, कठिन शब्दार्थ, व्याकरण (चित्-प्रत्यय, युगलपद अव्यय) और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर मिलेंगे, जो आपकी तैयारी को आसान बनाएंगे।
संस्कृत विषय में कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए चतुर्थ पाठ न खलु वयस्तेजसो हेतुः पिछले पाठों से बिल्कुल अलग है — यह किसी संवाद-रूपी नाट्यांश की तरह नहीं, बल्कि एक प्रेरक जीवनी-निबन्ध (गद्यांश) है, जिसमें भारत के किशोर क्रान्तिवीर खुदीराम बोस के अल्पायु किन्तु तेजस्वी जीवन तथा बलिदान का वर्णन किया गया है। इस लेख में हम इसी पाठ को कक्षा 9 के विद्यार्थियों के स्तर पर, बहुत ही सरल भाषा में समझेंगे। यहाँ आपको न खलु वयस्तेजसो हेतुः का सारांश, पाठ का भावार्थ, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, व्याकरण-बिंदुओं (चित्-प्रत्यय, युगलपद अव्यय आदि) की सरल व्याख्या और परीक्षा के लिए ज़रूरी प्रश्न-उत्तर — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा, ताकि आप इस पाठ को अच्छी तरह याद रख सकें और परीक्षा में आत्मविश्वास से उत्तर लिख सकें।
न खलु वयस्तेजसो हेतुः पाठ का परिचय
"न खलु वयस्तेजसो हेतुः" एक गद्यात्मक (वर्णनात्मक) पाठ है, अर्थात् इसमें कोई संवाद या पात्रों की बातचीत नहीं है, बल्कि सीधे भारत के एक बालक्रान्तिवीर के जीवन की घटनाओं का वर्णन किया गया है। पाठ के शीर्षक का अर्थ है — "आयु (उम्र) ही तेज अर्थात् शौर्य-तेजस्विता का कारण नहीं होती", अर्थात् वीरता और देशभक्ति के लिए बड़ी आयु आवश्यक नहीं है, बालक भी महान कार्य कर सकते हैं। पाठ की शुरुआत में बताया गया है कि भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के यज्ञ में अनेक ज्ञात-अज्ञात क्रान्तिवीरों ने अपना जीवन और परिवार तक आहुति के रूप में समर्पित कर दिया, और इन्हीं में से एक तेजस्वी बालक्रान्तिवीर हुतात्मा खुदीराम बोस का जीवन-वृत्तान्त संक्षेप में इस पाठ में वर्णित है।
कहानी की शुरुआत होती है खुदीराम के जन्म-परिचय से — वे बंगप्रान्त के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में सन् १८८९ में जन्मे थे। बाल्यकाल में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया और उनकी बहन अपरूपादेवी ने उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही खुदीराम असाधारण थे — उन्हें खेलकूद में मन नहीं लगता था, बल्कि देशवासियों पर होने वाले अत्याचार देखकर वे व्यथित हो जाते थे। आगे चलकर बंगभंग आन्दोलन में भाग लेना, क्रान्तिवीर सत्येन्द्रनाथ से भेंट और प्रशिक्षण, अत्याचारी अंग्रेज़ अधिकारी किंग्ज़फोर्ड पर विस्फोटक-आक्रमण, और अन्ततः मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूमना — यही इस पाठ की मूल कथा है।
न खलु वयस्तेजसो हेतुः का सरल सारांश
पाठ के आरम्भ में बताया गया है कि भारत ने अपनी स्वतन्त्रता का अमृत-महोत्सव वर्ष मनाया, परन्तु क्या हम जानते हैं कि देश को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए कितने ज्ञात-अज्ञात क्रान्तिवीरों ने अपना परिवार और अपना जीवन आहुति के रूप में समर्पित किया? वे सभी क्रान्तिवीर हमारे द्वारा कृतज्ञतापूर्वक सदा वन्दनीय हैं। उन्हीं देशभक्तों में एक तेजस्वी बालक्रान्तिवीर हुतात्मा हैं — खुदीराम बोस, जिनका जीवन-वृत्तान्त इस पाठ में संक्षेप में वर्णित है।
भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम के सशस्त्र आन्दोलन में बंगप्रान्त सबसे आगे था। इसी बंगप्रान्त के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में सन् १८८९ के दिसम्बर मास की तीसरी तिथि को खुदीराम का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ तथा माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बाल्यकाल में ही उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया, इसलिए उनकी बड़ी बहन अपरूपादेवी ने ही उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही खुदीराम असाधारण थे — सामान्य बालकों की तरह उनका मन खेल-कूद में नहीं रमता था, बल्कि देशवासियों पर हो रहे अत्याचार देखकर वे दुःखी हो जाते थे।
बंगप्रान्त के क्रान्तिवीरों की गुप्त गतिविधियों से अंग्रेज़ भयभीत रहते थे। भारत के तत्कालीन वायसराय कर्ज़न ने बंगप्रान्त के इस वीरत्व, उत्साह और देशभक्ति को कुचलने के लिए सन् १९०५ में बंगप्रान्त का बँटवारा (बंगभंग) कर दिया। इस निर्णय से केवल बंगप्रान्त में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण देश में जनान्दोलन आरम्भ हो गया, जिसे "बंगभंग-आन्दोलन" कहा गया। उस समय खुदीराम मात्र पंद्रह वर्ष के थे, फिर भी देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर वे इस जनान्दोलन में कूद पड़े और नवीं कक्षा भी पूरी नहीं कर सके, क्योंकि देशभक्तों का जीवन तो राष्ट्र के लिए ही समर्पित होता है।
खुदीराम ने बालकों को संगठित करके पदयात्राएँ आयोजित कीं, जिनमें देशभक्ति के गीत और "वन्दे मातरम्" जैसे घोष होते थे। पदयात्रा के माध्यम से वे लोक-जागरण सम्बन्धी पत्रक जनता में बाँटते थे। एक बार पत्रक बाँटते समय वे अंग्रेज़ों के हाथ लग गए, परन्तु समर्थ खुदीराम ने अंग्रेज़ों को पीटकर वहाँ से भागने में सफलता पाई। बंगप्रान्त में क्रान्तिवीरों के कई गुप्त-मण्डल सक्रिय थे, जो अंग्रेज़ों के मन में भय उत्पन्न करते थे। एक गुप्त-मण्डल के संचालक सत्येन्द्रनाथ थे — खुदीराम अपने मित्र प्रफुल्ल के साथ जाकर उनसे मिले। सत्येन्द्रनाथ ने उपदेश दिया कि क्रान्तिकार्य करने के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार के समान तीक्ष्ण, और मन गंगाजल के समान निर्मल होना चाहिए। इसके बाद दोनों मित्रों ने गुप्त प्रशिक्षण-केन्द्र में आठ महीने का प्रशिक्षण प्राप्त किया और बन्दूक चलाने में भी शीघ्र ही निपुण हो गए। राणा प्रताप के चरित्र से प्रेरित होकर खुदीराम ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक भारत अंग्रेज़ी शासन से मुक्त नहीं होगा, तब तक वे जूते नहीं पहनेंगे।
कलकत्ता के मुख्य न्यायिक अधिकारी किंग्ज़फोर्ड नामक अंग्रेज़ भारतीय देशभक्तों को अत्यन्त कठोरता से दण्डित करता था और बालकों को भी नहीं छोड़ता था। जब उसका स्थानान्तरण मुज़फ्फरनगर हुआ, तब सशस्त्र-क्रान्तिवीर-मण्डल ने निश्चय किया कि उसका वध किया जाए। इस कार्य का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व प्रफुल्ल और खुदीराम ने स्वीकार किया और स्वयं ही सूक्ष्म योजना भी बनाई। सन् १९०८ के अप्रैल मास की अट्ठाईसवीं तिथि को प्रफुल्ल और खुदीराम ने किंग्ज़फोर्ड की गाड़ी समझकर एक रथ पर विस्फोटक फेंका। भीषण विस्फोट हुआ और आग की लपटें आकाश तक उठीं। "किंग्ज़फोर्ड मारा गया, हमारा उत्तरदायित्व पूरा हुआ" — यह सोचकर दोनों वहाँ से भाग निकले। परन्तु दुर्भाग्यवश उस रथ में किंग्ज़फोर्ड नहीं, बल्कि केनेडी नामक अधिकारी की पत्नी और पुत्री बैठी थीं, जिनकी मृत्यु हो गई, जबकि किंग्ज़फोर्ड बच गया। रातभर दोनों क्रान्तिवीर भागते रहे, परन्तु दुर्भाग्यवश अंग्रेज़ पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। वीर प्रफुल्ल ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध प्रतिकार का प्रयास किया, परन्तु वह व्यर्थ गया। अन्ततः असहाय प्रफुल्ल ने भारत माता को मन-ही-मन प्रणाम कर "वन्दे मातरम्" कहते हुए अपनी ही बन्दूक से स्वयं को गोली मारकर वीरगति प्राप्त की।
अंग्रेज़ों ने खुदीराम को पकड़कर न्यायालय में पेश किया। वहाँ वकीलों के हर प्रश्न का खुदीराम का एक ही निश्चित उत्तर होता था — "वन्दे मातरम्"। न्यायाधीश ने निर्दयतापूर्वक बालक खुदीराम को फाँसी की मृत्युदण्ड सुनाई। देशभक्त खुदीराम के मुख पर भय या दुःख का कोई भाव नहीं था, बल्कि प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज झलक रहे थे — यह देखकर न्यायाधीश और अंग्रेज़ अधिकारी भी चकित रह गए। सन् १९०८ के अगस्त मास की ग्यारहवीं तिथि को बाल्यावस्था में ही देश की स्वतन्त्रता के लिए खुदीराम हुतात्मा बन गए। प्रिय भारत माता के दर्शन की कामना से हँसते हुए, "वन्दे मातरम्" जपते हुए, आनन्दपूर्वक वे स्वर्ग सिधार गए।

पाठ का सरल भावार्थ (घटनाक्रम अनुसार)
1. भूमिका — अनाम क्रान्तिवीरों को श्रद्धांजलि
पाठ के आरम्भ में भारतवासियों से पूछा जाता है कि क्या वे जानते हैं कि स्वतन्त्रता की वेदी पर कितने ज्ञात-अज्ञात क्रान्तिवीरों ने अपना परिवार और जीवन बलिदान कर दिया। इन्हीं में से एक तेजस्वी बालक्रान्तिवीर हैं खुदीराम, जिनका जीवन-वृत्तान्त यहाँ संक्षेप में बताया गया है।
आसान भाषा में समझें: स्वतन्त्रता कोई सहज उपहार नहीं थी, अनेक अनाम वीरों के बलिदान से ही यह प्राप्त हुई है।
2. खुदीराम का जन्म और बाल्यकाल
खुदीराम का जन्म सन् १८८९ में बंगप्रान्त के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में हुआ। बाल्यकाल में ही माता-पिता का देहान्त हो गया, बहन अपरूपादेवी ने पालन-पोषण किया। बचपन से ही वे असाधारण थे और देशवासियों पर अत्याचार देखकर व्यथित होते थे।
आसान भाषा में समझें: कठिन बचपन के बावजूद खुदीराम के मन में बचपन से ही देशभक्ति और संवेदनशीलता के बीज मौजूद थे।
3. बंगभंग आन्दोलन में भागीदारी
वायसराय कर्ज़न द्वारा सन् १९०५ में बंगप्रान्त के विभाजन के विरोध में सम्पूर्ण देश में जनान्दोलन छिड़ गया। मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में ही खुदीराम इस आन्दोलन में कूद पड़े, नवमी कक्षा पूरी नहीं कर सके, पदयात्राएँ आयोजित कीं और पत्रक बाँटे।
आसान भाषा में समझें: देशभक्ति के लिए आयु बाधा नहीं बनती — यही इस पाठ के शीर्षक का सार है।
4. सत्येन्द्रनाथ से भेंट और प्रशिक्षण
खुदीराम अपने मित्र प्रफुल्ल के साथ गुप्त-मण्डल के संचालक सत्येन्द्रनाथ से मिले, जिन्होंने शरीर को वज्र-सम दृढ़, बुद्धि को तलवार-सी तीक्ष्ण और मन को गंगाजल-सा निर्मल रखने का उपदेश दिया। आठ महीने के गुप्त प्रशिक्षण के बाद दोनों बन्दूक चलाने में निपुण हो गए।
आसान भाषा में समझें: क्रान्तिकार्य के लिए केवल साहस ही नहीं, अनुशासित शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि और निर्मल मन भी आवश्यक हैं।
5. किंग्ज़फोर्ड पर आक्रमण और प्रफुल्ल का बलिदान
अत्याचारी अंग्रेज़ अधिकारी किंग्ज़फोर्ड के वध का उत्तरदायित्व प्रफुल्ल-खुदीराम ने लिया। १९०८ में उन्होंने एक रथ पर विस्फोटक फेंका, परन्तु उसमें किंग्ज़फोर्ड नहीं, केनेडी की पत्नी-पुत्री बैठी थीं, जिनकी मृत्यु हो गई। पकड़े जाने पर प्रफुल्ल ने स्वयं को गोली मारकर वीरगति प्राप्त की।
आसान भाषा में समझें: क्रान्तिकारियों का उद्देश्य कितना भी उचित हो, योजना में चूक होने पर निर्दोषों की हानि भी हो सकती है — यह घटना का दुखद पक्ष है।
6. खुदीराम की फाँसी और अमरत्व
न्यायालय में खुदीराम का हर प्रश्न का उत्तर केवल "वन्दे मातरम्" था। न्यायाधीश ने फाँसी की सज़ा सुनाई, फिर भी खुदीराम के मुख पर भय नहीं, प्रसन्नता और तेज था। १९०८ में मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में हँसते हुए वे हुतात्मा बन गए।
आसान भाषा में समझें: सच्चा देशभक्त मृत्यु से भी भयभीत नहीं होता, बल्कि उसे राष्ट्र-सेवा का पावन क्षण मानता है।
पाठ के भावार्थ — एक नज़र में तुलना
ऊपर बताए गए छहों मुख्य भावों को आसानी से याद रखने के लिए नीचे एक तुलनात्मक तालिका दी गई है:
| मुख्य भाव | किससे जुड़ा है | सरल संदेश |
|---|---|---|
| भूमिका — क्रान्तिवीरों को श्रद्धांजलि | अनाम बलिदानी | स्वतन्त्रता अनगिनत बलिदानों से मिली |
| जन्म और बाल्यकाल | खुदीराम का प्रारम्भिक जीवन | बचपन से ही संवेदनशील स्वभाव |
| बंगभंग आन्दोलन | पंद्रह वर्ष की आयु में भागीदारी | आयु देशभक्ति में बाधा नहीं |
| सत्येन्द्रनाथ का प्रशिक्षण | गुरु-उपदेश एवं अभ्यास | दृढ़ शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि, निर्मल मन आवश्यक |
| किंग्ज़फोर्ड पर आक्रमण | प्रफुल्ल का बलिदान | योजना में चूक से अनपेक्षित हानि सम्भव |
| फाँसी और अमरत्व | खुदीराम की वीरगति | मृत्यु से निर्भय सच्चा देशभक्त |
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ (पाठ्यपुस्तक की "सर्वं शब्देन भासते" तालिका के अनुसार) नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | सरल हिंदी अर्थ |
|---|---|
| अधिवक्तृणाम् | वकीलों के |
| असाधारणः | असामान्य |
| आचरितवन्तः | मनाये (आचरित किया) |
| आतङ्कम् | डर |
| आन्दोलनम् | आन्दोलन |
| उद्बन्धनम् | फाँसी |
| कदाचित् | एक बार |
| चकितः | चौंकना (विस्मित) |
| दिवम् | स्वर्ग को |
| निर्दयः | दया रहित |
| प्रतीकारयत्नः | प्रतिरोध का प्रयास |
| भुशुण्डी | बन्दूक |
| व्यथितः | चिन्तित (दुःखित) |
| विस्फोटकम् | विस्फोटक सामग्री |
| संत्रस्तः | आतंकित (भीत, पीड़ित) |
व्याकरण-बिंदु (महत्वपूर्ण)
इस पाठ में मुख्यतः चार व्याकरणिक बिंदुओं का अभ्यास कराया गया है — सन्धि-विच्छेद, समास (विग्रहवाक्य), चित्-प्रत्ययान्त अव्यय, और भूतकाल के विविध रूप (लङ्-लकार, क्तवतु-प्रत्यय, स्म, क्त-प्रत्यय) तथा युगलपद अव्यय। परीक्षा में इन पर आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
'चित्' प्रत्ययान्त अनिश्चयवाचक पद
पाठ में कदाचित्, कस्यचित् जैसे पद आए हैं। 'चित्' प्रत्यय जोड़ने से शब्द में अनिश्चय (कुछ अनिश्चितता) का भाव आता है — ये पद विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं:
| मूल शब्द + चित् | बना हुआ पद | अर्थ |
|---|---|---|
| कदा + चित् | कदाचित् | कभी-न-कभी / एक बार |
| कस्य + चित् | कस्यचित् | किसी का |
| केन + चित् | केनचित् | किसी के द्वारा |
| कुत्र + चित् | कुत्रचित् | कहीं |
| कति + चित् | कतिचित् | कुछ (संख्या में) |
| कुतः + चित् | कुतश्चित् | किसी कारण से |
| कथं + चित् | कथञ्चित् | किसी तरह |
| का + चित् | काचित् | कोई (स्त्रीलिंग) |
| कः + चित् | कश्चित् | कोई (पुल्लिंग) |
| किं + चित् | किञ्चित् | कुछ (नपुंसकलिंग) |
युगलपद अव्यय (जोड़े में प्रयुक्त होने वाले अव्यय)
पाठ में कुछ अव्यय ऐसे हैं जो सदैव जोड़े (युगल) में प्रयुक्त होते हैं। परीक्षा में इनके सही जोड़े पहचानना महत्वपूर्ण है:
| युगल अव्यय | अर्थ | उदाहरण (पाठ्यपुस्तक-आधारित) |
|---|---|---|
| यत् ... तत् | जो ... वह | यत् सामर्थ्यम् एव जीवनम्, तत् दुर्बलता मृत्युः |
| यदा ... तदा | जब ... तब | यदा कृष्णः शङ्खनादं कृतवान् तदा हृदयानि कम्पितानि |
| यावत् ... तावत् | जब तक ... तब तक | यावत् भूतले गिरयः भवन्ति तावत् रामायणकथा प्रचलिष्यति |
| यद्यपि ... तथापि | यद्यपि ... फिर भी | यद्यपि मेघाः सन्ति तथापि वृष्टिः न भवति |
अत्र इदम् अवधेयम् — बंगभंग आन्दोलन एवं खुदीराम बोस
सन् १९०५ में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने प्रशासनिक सुविधा के बहाने बंगप्रान्त को दो भागों में बाँट दिया, वास्तव में इसका उद्देश्य बंगाल की बढ़ती राष्ट्रवादी भावना को कमज़ोर करना था। इसके विरोध में शुरू हुआ "बंगभंग-आन्दोलन" (स्वदेशी आन्दोलन) भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। खुदीराम बोस इसी आन्दोलन से प्रेरित होकर किशोरावस्था में ही क्रान्ति-पथ पर चल पड़े थे और मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी दी गई — वे भारत के सबसे कम आयु के फाँसी पाने वाले क्रान्तिवीरों में गिने जाते हैं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- पाठ का शीर्षक है — न खलु वयस्तेजसो हेतुः, अर्थात् आयु ही तेज (शौर्य) का कारण नहीं है।
- यह पाठ गद्यात्मक (वर्णनात्मक) शैली में लिखा गया है, संवाद-शैली में नहीं।
- पाठ का मुख्य विषय है — बालक्रान्तिवीर खुदीराम बोस का जीवन-वृत्तान्त और बलिदान।
- खुदीराम का जन्म सन् १८८९ में मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में हुआ था।
- वायसराय कर्ज़न ने सन् १९०५ में बंगप्रान्त का विभाजन किया, जिससे बंगभंग-आन्दोलन आरम्भ हुआ।
- खुदीराम के प्रशिक्षक सत्येन्द्रनाथ थे, जिन्होंने दृढ़ शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि और निर्मल मन का उपदेश दिया।
- प्रफुल्ल और खुदीराम ने १९०८ में किंग्ज़फोर्ड के वध का उत्तरदायित्व लिया, परन्तु उसमें केनेडी की पत्नी-पुत्री की मृत्यु हुई।
- पकड़े जाने पर प्रफुल्ल ने स्वयं को गोली मारकर वीरगति प्राप्त की।
- खुदीराम को न्यायालय में हर प्रश्न का उत्तर केवल "वन्दे मातरम्" था।
- ११ अगस्त १९०८ को मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में खुदीराम को फाँसी दी गई।
- व्याकरण में सन्धि-विच्छेद, समास-विग्रह, 'चित्'-प्रत्ययान्त पद और युगलपद अव्यय (यत्-तत्, यदा-तदा, यावत्-तावत्, यद्यपि-तथापि) का अभ्यास कराया गया है।
- शब्दार्थ, संवत्सर (वर्ष)-आधारित मिलान, और भूतकाल के रूपान्तरण से जुड़े प्रश्न परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं।
इस पाठ से हमें क्या सीख मिलती है?
"न खलु वयस्तेजसो हेतुः" पाठ हमें यह सिखाता है कि देशभक्ति, साहस और त्याग के लिए बड़ी आयु आवश्यक नहीं है — मात्र किशोरावस्था में ही खुदीराम बोस ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची तेजस्विता आयु की मोहताज नहीं होती। यह पाठ विद्यार्थियों में देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और निर्भयता जैसे मूल्यों को जगाने का सन्देश देता है।
पाठ के मूल्य और विद्यार्थी के लिए व्यावहारिक सीख
| पाठ में बताया गया मूल्य | विद्यार्थी इससे क्या सीख सकता है |
|---|---|
| देशभक्ति | छोटी आयु में भी राष्ट्र-सेवा के लिए तत्पर रहना |
| अनुशासन एवं संकल्प | दृढ़ शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि व निर्मल मन का अभ्यास करना |
| निर्भयता | कठिनतम परिस्थिति में भी भयभीत न होना |
| त्याग | बड़े उद्देश्य के लिए निजी सुख-सुविधा का त्याग करना |
न खलु वयस्तेजसो हेतुः — प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: यह पाठ किस शैली में लिखा गया है और इसका मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: यह पाठ गद्यात्मक (वर्णनात्मक) शैली में लिखा गया है, और इसका मुख्य विषय बालक्रान्तिवीर खुदीराम बोस का जीवन-वृत्तान्त तथा बलिदान है।
प्रश्न 2: खुदीराम का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: खुदीराम का जन्म बंगप्रान्त के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में सन् १८८९ के दिसम्बर मास की तीसरी तिथि को हुआ था।
प्रश्न 3: खुदीराम बाल्यकाल में किस कारण व्यथित होते थे?
उत्तर: खुदीराम देशवासियों पर हो रहे अत्याचार देखकर व्यथित होते थे।
प्रश्न 4: बंगभंग-आन्दोलन क्यों आरम्भ हुआ?
उत्तर: वायसराय कर्ज़न ने सन् १९०५ में बंगप्रान्त के वीरत्व, उत्साह और देशभक्ति को कुचलने के लिए बंगप्रान्त का विभाजन कर दिया, जिसके विरोध में सम्पूर्ण देश में बंगभंग-आन्दोलन आरम्भ हुआ।
प्रश्न 5: सत्येन्द्रनाथ ने खुदीराम को क्या उपदेश दिया?
उत्तर: सत्येन्द्रनाथ ने उपदेश दिया कि क्रान्तिकार्य करने के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार के समान तीक्ष्ण, और मन गंगाजल के समान निर्मल होना चाहिए।
प्रश्न 6: खुदीराम ने कब तक जूते न पहनने की प्रतिज्ञा ली थी?
उत्तर: राणा प्रताप के चरित्र से प्रेरित होकर खुदीराम ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक भारत अंग्रेज़ी शासन से मुक्त नहीं होगा, तब तक वे जूते नहीं पहनेंगे।
प्रश्न 7: किंग्ज़फोर्ड पर किए गए आक्रमण में वास्तव में किसकी मृत्यु हुई?
उत्तर: विस्फोटक-आक्रमण में किंग्ज़फोर्ड नहीं, बल्कि केनेडी नामक अधिकारी की पत्नी और पुत्री की मृत्यु हुई, जबकि किंग्ज़फोर्ड बच गया।
प्रश्न 8: प्रफुल्ल की वीरगति कैसे हुई?
उत्तर: पकड़े जाने की स्थिति में प्रफुल्ल ने भारत माता को प्रणाम कर "वन्दे मातरम्" कहते हुए अपनी ही बन्दूक से स्वयं को गोली मारकर वीरगति प्राप्त की।
प्रश्न 9: न्यायालय में हर प्रश्न पर खुदीराम का क्या उत्तर होता था?
उत्तर: न्यायालय में वकीलों के प्रत्येक प्रश्न पर खुदीराम का निश्चित उत्तर केवल "वन्दे मातरम्" होता था।
प्रश्न 10: न्यायाधीश तथा अंग्रेज़ अधिकारी किस बात से चकित रह गए?
उत्तर: मृत्युदण्ड सुनाए जाने पर भी खुदीराम के मुख पर भय या दुःख के बजाय प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज था — यह देखकर न्यायाधीश और अंग्रेज़ अधिकारी चकित रह गए।
प्रश्न 11: खुदीराम को कब और किस आयु में फाँसी दी गई?
उत्तर: खुदीराम को ११ अगस्त १९०८ को मात्र उन्नीस वर्ष की बाल्यावस्था में ही फाँसी दी गई।
प्रश्न 12: पाठ के शीर्षक ("न खलु वयस्तेजसो हेतुः") का मूल भाव क्या है?
उत्तर: इस शीर्षक का भाव है कि आयु (उम्र) ही तेज अर्थात् शौर्य-तेजस्विता का कारण नहीं होती — छोटी आयु में भी व्यक्ति महान देशभक्ति और वीरता का परिचय दे सकता है।
एक नजर में पूरा पाठ
"न खलु वयस्तेजसो हेतुः" एक गद्यात्मक (वर्णनात्मक) पाठ है, जिसमें भारत के बालक्रान्तिवीर खुदीराम बोस के जीवन का वर्णन किया गया है। बचपन में ही अनाथ हुए खुदीराम बंगभंग-आन्दोलन से प्रेरित होकर मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में क्रान्ति-पथ पर चल पड़े, सत्येन्द्रनाथ से प्रशिक्षण लिया, अपने मित्र प्रफुल्ल के साथ अत्याचारी किंग्ज़फोर्ड पर आक्रमण किया, और अन्ततः पकड़े जाने पर हँसते-हँसते "वन्दे मातरम्" कहते हुए मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में फाँसी के फंदे को चूम लिया। पाठ में सन्धि-विच्छेद, समास-विग्रह, 'चित्'-प्रत्ययान्त पद तथा युगलपद अव्यय (यत्-तत्, यदा-तदा, यावत्-तावत्, यद्यपि-तथापि) का व्याकरणिक अध्ययन भी कराया गया है। परीक्षा में इस पाठ से शब्दार्थ, भावार्थ, संवत्सर-मिलान, सन्धि-विच्छेद और भूतकाल-रूपान्तरण से जुड़े प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।
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