राजस्थान सरकारी स्कूल विलय विवाद: क्यों सड़कों पर हैं छात्राएं और क्या है पूरा मामला?

राजस्थान में सरकारी स्कूलों के मर्जर (विलय) को लेकर छात्राओं और अभिभावकों का विरोध जारी है। जानिए जनवरी 2025 से शुरू हुए इस विवाद के मुख्य कारण और किस तरह नए प्रशासनिक फैसलों से हजारों स्कूलों पर इसका असर पड़ रहा है।

Jul 30, 2026 - 11:24
Updated: 15 hours ago
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Rajasthan government school merger protest
स्कूल परिसर के बाहर हाथ में तख्तियां लेकर विरोध प्रदर्शन करतीं सरकारी स्कूल की छात्र छात्राएं| •ai generated

राजस्थान में सरकारी स्कूलों के विलय (मर्जर) को लेकर पिछले डेढ़ साल से लगातार विवाद और विद्यार्थियों-अभिभावकों का विरोध देखने को मिल रहा है। जनवरी 2025 में राज्य सरकार ने कम नामांकन वाले 449 स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मिलाने का आदेश जारी किया था, जिसके खिलाफ बीकानेर, ब्यावर और जोधपुर सहित कई जिलों में छात्राएं और अभिभावक सड़कों पर उतर आए थे। मार्च 2026 में शिक्षा विभाग ने 7,352 और स्कूलों को इसी दायरे में लाने की तैयारी शुरू कर दी, जिसके बाद यह मुद्दा दोबारा सुर्खियों में है।

विवाद की शुरुआत: जनवरी 2025 का विलय आदेश

राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने 16 जनवरी 2025 को एक आदेश जारी कर 259 सरकारी स्कूलों के विलय को मंजूरी दी थी। इससे पहले जारी दो अन्य आदेशों को मिलाकर दस दिन के भीतर कुल 449 प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल विलय की जद में आ गए। सरकार ने इसके पीछे शून्य या बेहद कम नामांकन, एक ही परिसर में दो स्कूलों का संचालन और आसपास के स्कूलों की नजदीकी दूरी जैसे कारण बताए।

बीकानेर और ब्यावर में छात्राओं का प्रदर्शन

बीकानेर के जस्सूसर गेट स्थित बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के विलय के खिलाफ छात्राएं और उनके परिजन 25 जनवरी 2025 को स्कूल के बाहर एकत्र हुए और भूख हड़ताल की चेतावनी दी। छात्राओं का कहना था कि यह क्षेत्र की एकमात्र बालिका विद्यालय थी और इसे सह-शिक्षा (को-एड) स्कूल में मिलाए जाने से कई परिवार बेटियों को आगे पढ़ाने से हिचकेंगे। अजमेर जिले के ब्यावर में भी दिग्गी मोहल्ला की बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के विलय के विरोध में अभिभावकों ने प्रदर्शन किया। 22 से 25 जनवरी 2025 के बीच राज्य के कई हिस्सों में छात्राएं और अभिभावक सड़क पर उतरे, और जोधपुर के सिवांची गेट स्थित बालिका विद्यालय के बाहर छात्राओं के पुलिस वाहन पर चढ़कर प्रदर्शन करने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।

विरोध की मुख्य वजहें

अभिभावकों और छात्र संगठनों ने विलय के फैसले पर मुख्यतः चार आपत्तियां दर्ज कराईं।

  • बालिका विद्यालयों को सह-शिक्षा स्कूलों में मिलाए जाने से बेटियों की सुरक्षा और सामाजिक सहजता को लेकर चिंता।
  • सत्र के बीच में विलय होने से पढ़ाई और परीक्षा तैयारी में रुकावट।
  • दूरस्थ व आदिवासी क्षेत्रों में स्कूल दूर होने से पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों, खासकर बालिकाओं के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) का खतरा।
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत तय दूरी-मानकों के उल्लंघन का आरोप।

बांसवाड़ा से सांसद राजकुमार रोत ने अपने क्षेत्र में 19 स्कूलों के विलय पर सवाल उठाया, जिनमें सात बालिका विद्यालय शामिल थे। जयपुर स्थित अभिभावक संगठन संयुक्त अभिभावक संघ ने भी सत्र के बीच स्कूल बंद किए जाने का विरोध करते हुए इसे गरीब बच्चों की शिक्षा के खिलाफ कदम बताया।

सरकार और सत्तापक्ष के भीतर से भी असहमति

विलय के फैसले का विरोध सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। बीकानेर पश्चिम से भाजपा विधायक जेठानंद व्यास ने शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को पत्र लिखकर जस्सूसर गेट की बालिका विद्यालय को विलय से बाहर रखने का अनुरोध किया। सरकार का पक्ष रहा कि विलय का मकसद संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और छात्रों-शिक्षकों को बेहतर सुविधाओं वाले बड़े स्कूलों में एक साथ लाना है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस कदम को बालिका शिक्षा पर हमला बताते हुए दावा किया कि उनके कार्यकाल में कम नामांकन के बावजूद कोई बालिका विद्यालय बंद नहीं किया गया था।

2026 में नया विवाद: 7,352 और स्कूलों पर तलवार

मार्च 2026 में शिक्षा विभाग ने राज्यभर के उन प्राथमिक स्कूलों की जानकारी मांगी, जहां नामांकन 0 से 14 के बीच है, और उन उच्च प्राथमिक स्कूलों की, जहां नामांकन 0 से 24 के बीच है। विभाग के अनुसार राज्य में ऐसे 7,352 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल चिह्नित किए गए हैं। इसके अलावा उन अंग्रेजी-माध्यम महात्मा गांधी स्कूलों का भी ब्योरा मांगा गया जहां नामांकन 30 से कम है, साथ ही कक्षा 9 से 12 तक शून्य नामांकन वाले अंग्रेजी-माध्यम स्कूलों की सूची भी तैयार कराई जा रही है।

इससे पहले दिसंबर 2025 में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने शून्य नामांकन वाले 97 स्कूलों (88 प्राथमिक और 9 उच्च प्राथमिक) को पास के स्कूलों में मिलाने की घोषणा की थी, और उनके शिक्षकों को अन्य स्कूलों में समायोजित करने के निर्देश दिए गए थे।

घटनाक्रम समय प्रभावित स्कूल
पहला बड़ा विलय आदेश जनवरी 2025 449 स्कूल
शून्य नामांकन वाले स्कूलों का विलय दिसंबर 2025 97 स्कूल
नई विलय तैयारी (प्रस्तावित) मार्च 2026 7,352 प्राथमिक/उच्च प्राथमिक स्कूल
कुल नामांकन (राज्य सरकारी स्कूल) 2021-22 बनाम 2025-26 करीब 97 लाख से घटकर 73 लाख

देशभर में सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन

अखिल भारतीय स्तर पर भी सरकारी स्कूलों में नामांकन घटने का रुझान सामने आया है। यूडाइस (UDISE) रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 और 2025-26 के बीच देशभर के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के नामांकन में करीब 86 लाख की कमी दर्ज की गई। शिक्षाविदों का कहना है कि इसकी वजह निजी स्कूलों की ओर पलायन, जन्मदर में गिरावट और कुछ राज्यों में पलायन (माइग्रेशन) जैसे कई कारक हो सकते हैं। राजस्थान सरकार इसी राष्ट्रीय रुझान का हवाला देकर विलय की नीति को उचित ठहराती है, जबकि विपक्ष का कहना है कि नामांकन घटने के पीछे बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी जैसी सरकार की अपनी खामियां भी जिम्मेदार हैं।

कांग्रेस का विरोध: डोटासरा के आरोप

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सोशल मीडिया पर भाजपा सरकार की नीति की तीखी आलोचना की। उनके अनुसार भाजपा एक ओर नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 की बात करती है, तो दूसरी ओर स्कूल बंद कर बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीन रही है। डोटासरा ने दावा किया कि इस कदम से 20,000 से अधिक शिक्षक पद समाप्त हो सकते हैं, जिससे रोजगार के अवसर भी घटेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश में वास्तव में शून्य नामांकन वाले सिर्फ 96 स्कूल हैं, जबकि नामांकन में गिरावट पिछले चार साल से जारी है। कांग्रेस नेताओं ने याद दिलाया कि 2013-2018 के भाजपा शासनकाल में भी विलय के नाम पर 20,000 से ज्यादा स्कूल बंद किए गए थे।

क्या विलय आरटीई नियमों का उल्लंघन है?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थियों के लिए एक किलोमीटर के दायरे में और कक्षा 6 से 8 तक के लिए तीन किलोमीटर के दायरे में स्कूल उपलब्ध होना जरूरी है। विपक्ष का आरोप है कि दूरदराज इलाकों में स्कूलों के विलय से यह दूरी-मानक टूटता है, जिससे छोटे बच्चों, खासकर बालिकाओं के लिए दूर के स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है और ड्रॉपआउट दर बढ़ने का खतरा रहता है। राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में भी इसी तरह के स्कूल-युक्तिकरण (रैशनलाइजेशन) अभियान चल रहे हैं, और वहां भी स्थानीय स्तर पर विरोध सामने आया है।

स्कूल भवनों की सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा

विलय विवाद के साथ ही राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुरक्षा भी चर्चा में रही। जुलाई 2025 में झालावाड़ में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से सात विद्यार्थियों की मौत हो गई थी और आठ अन्य घायल हुए थे। इस हादसे के बाद कराए गए सर्वे में सामने आया कि राज्य के सरकारी स्कूलों में करीब 86,000 कक्षा-कक्ष जर्जर हालत में हैं। अगस्त 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे सभी जर्जर कक्षों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। इससे अभिभावकों के बीच यह सवाल भी उठा कि सरकार पास के जर्जर भवनों में बच्चों को भेजने के बजाय स्कूल विलय पर ज्यादा ध्यान क्यों दे रही है।

शिक्षकों का आंदोलन भी साथ-साथ

स्कूल विलय के अलावा शिक्षकों के तबादलों को लेकर भी असंतोष रहा है। राजस्थान हाईकोर्ट ने सितंबर में एक प्रधानाचार्य के तबादले पर रोक लगाते हुए टिप्पणी की थी कि सत्र के बीच बड़े पैमाने पर तबादले करना प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी दिखाता है और इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। मई 2026 में भी राज्यभर से हजारों शिक्षक तबादलों, डीपीसी और अन्य सेवा-शर्तों को लेकर सड़कों पर उतरे थे।

आगे क्या: विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए जरूरी बातें

जिन स्कूलों के विलय की सूचना मिले, वहां अभिभावक और छात्र सबसे पहले संबंधित जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय में लिखित आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। यदि बालिका विद्यालय के सह-शिक्षा स्कूल में विलय की स्थिति बने, तो स्थानीय विधायक या सांसद के माध्यम से मामला शिक्षा मंत्रालय तक पहुंचाया जा सकता है, जैसा बीकानेर में हुआ। आरटीई के दूरी-मानकों का हवाला देकर भी विलय के फैसले को चुनौती दी जा सकती है।

क्या विलय के बाद स्कूल की मान्यता और छात्र-रिकॉर्ड प्रभावित होता है?

नहीं, विलय की स्थिति में विद्यार्थियों का नामांकन और शैक्षणिक रिकॉर्ड नए (मेजबान) स्कूल में स्थानांतरित कर दिया जाता है, और शिक्षा विभाग के अनुसार प्रवेश, परीक्षा पंजीकरण और छात्रवृत्ति जैसी प्रक्रियाओं में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। हालांकि दूरी और सुरक्षा से जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतें अभिभावकों के लिए मुख्य चिंता बनी रहती हैं।

बालिका विद्यालय के सह-शिक्षा स्कूल में विलय पर अभिभावक क्या कर सकते हैं?

अभिभावक स्थानीय जनप्रतिनिधि के माध्यम से शिक्षा मंत्री या जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंप सकते हैं और सुरक्षा, आने-जाने की दूरी तथा अलग शौचालय जैसी सुविधाओं की अनुपलब्धता को आधार बनाकर मामला उठा सकते हैं, जैसा बीकानेर और ब्यावर में हुआ था।

गौरतलब है कि राज्यसभा में भी हाल में यह मुद्दा उठ चुका है कि राजस्थान के 14,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय की सुविधा नहीं है, जो बालिका विद्यालयों के सह-शिक्षा स्कूलों में विलय को लेकर अभिभावकों की चिंता को और पुख्ता करता है।

राज्य में स्कूल विलय की नई सूची और अंतिम निर्णय को लेकर शिक्षा विभाग की आधिकारिक अधिसूचनाएं राजस्थान शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर जारी की जाती हैं। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्टिंग द प्रिंट और द वायर पर उपलब्ध है।

Frequently Asked Questions

उन्हें नौकरी से नहीं हटाया जाता, बल्कि पास के अन्य सरकारी स्कूलों में समायोजित (Transfer) कर दिया जाता है।

इन भवनों का उपयोग आंगनबाड़ी केंद्र, सरकारी पुस्तकालय या ग्राम पंचायत के अन्य कामों के लिए किया जा सकता है।

हाँ, यदि अभिभावक और स्थानीय जनप्रतिनिधि जिला कलेक्टर या शिक्षा विभाग के समक्ष ठोस आपत्ति दर्ज कराएं, तो समीक्षा के बाद इसे बदला जा सकता है।

बीकानेर स्थित प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा निदेशालय और राज्य का शिक्षा मंत्रालय मिलकर इस पर निर्णय लेते हैं।
Naina Saini

"Naina Saini is an Editorial Intern at Aapbiti, specializing in publishing and managing education-focused news articles. Operating under the direct mentorship and guidance of Shakti Rao Mani, the Product Owner of aapbiti.com, Naina is dedicated to delivering accurate, timely, and engaging academic updates. Her role focuses on keeping readers informed about educational trends, exams, admissions, and key academic policies."

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