स्कूली छात्र के एग्रीटेक स्टार्टअप 'रैतु' को हरियाणा सरकार से मिला ₹10 लाख का अनुदान, छोटे किसानों के लिए वरदान बनेगी यह इलेक्ट्रिक मशीन
बेंगलुरु के 12वीं के छात्र अद्वैत दत्ता रेड्डी पालम द्वारा शुरू किए गए एग्रीटेक स्टार्टअप 'रैतु' को हरियाणा सरकार से ₹10 लाख का अनुदान मिला है। यह स्टार्टअप छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक बहु-उपयोगी, डीजल-मुक्त इलेक्ट्रिक कृषि मशीन तैयार कर रहा है। जानिए इसकी खासियत, कीमत और पूरी सफलता की कहानी।

बेंगलुरु के 10X इंटरनेशनल स्कूल में कक्षा 12 के छात्र अद्वैत दत्ता रेड्डी पालम द्वारा शुरू किए गए एग्रीटेक स्टार्टअप रैतु (Raitu) को हरियाणा सरकार की ओर से ₹10 लाख के अनुदान की प्रतिबद्धता मिली है। कंपनी के अनुसार यह सहयोग 28 जुलाई 2026 को घोषित किया गया। रैतु एक बिजली से चलने वाली, बहु-उपयोगी तिपहिया कृषि मशीन बना रहा है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए डीजल-मुक्त और किफायती विकल्प बनने का लक्ष्य रखती है।
रैतु एग्रीटेक: एक नज़र में
रैतु एक कृषि-तकनीक स्टार्टअप है, जिसकी स्थापना वर्ष 2023 में हुई। तेलुगु भाषा में "रैतु" का अर्थ "किसान" होता है। कंपनी का मुख्य उत्पाद एक मॉड्यूलर इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर है, जिसमें अलग-अलग औज़ार (अटैचमेंट) बदलकर कई खेती के काम किए जा सकते हैं। नीचे मुख्य जानकारी तालिका में दी गई है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्टार्टअप का नाम | रैतु एग्रीटेक (Raitu) |
| स्थापना वर्ष | 2023 |
| संस्थापक | अद्वैत दत्ता रेड्डी पालम, कक्षा 12 के छात्र, 10X इंटरनेशनल स्कूल, बेंगलुरु |
| उत्पाद | मॉड्यूलर, बहु-उपयोगी इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर |
| अनुमानित कीमत | लगभग ₹4 लाख |
| अब तक लाभान्वित किसान | 60 से अधिक (भारत में 40 से अधिक, बांग्लादेश में 20 से अधिक) |
| हरियाणा सरकार का सहयोग | ₹10 लाख की प्रतिबद्धता |
| जुटाई गई फंडिंग | ₹5 लाख |
मशीन की खासियत: एक वाहन, कई काम
रैतु की मशीन की सबसे बड़ी विशेषता इसका मॉड्यूलर डिज़ाइन है। किसान को हर काम के लिए अलग मशीन खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ती। एक ही वाहन पर अलग-अलग अटैचमेंट लगाकर कई कार्य किए जा सकते हैं। कंपनी के अनुसार मशीन को इन कार्यों के लिए ढाला जा सकता है:
- जुताई
- निराई (खरपतवार हटाना)
- बुवाई
- कीटनाशक या दवा का छिड़काव
- सिंचाई
मशीन बिजली से चलती है, इसलिए इसमें डीजल की आवश्यकता नहीं होती। इससे ईंधन पर होने वाला खर्च घटने की संभावना रहती है और धुएं तथा शोर से भी राहत मिलती है। हालांकि वास्तविक बचत खेत के आकार, उपयोग के घंटे और बिजली की उपलब्धता जैसी बातों पर निर्भर करेगी।
अटैचमेंट की प्राथमिकता कैसे तय हुई
टीम ने औज़ार बनाने का क्रम इस आधार पर तय किया कि हाथ से करने पर कौन-सा काम किसान के शरीर को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। संस्थापक अद्वैत के शब्दों में, अटैचमेंट इस आधार पर क्रमबद्ध किए गए कि कोई काम करने वाले व्यक्ति को कितना नुकसान पहुंचाता है, न कि इस आधार पर कि कौन-सा बनाना आसान था। यह सोच बताती है कि मशीन का उद्देश्य केवल उत्पादकता बढ़ाना नहीं, बल्कि किसान का स्वास्थ्य सुरक्षित रखना भी है।
छोटे किसानों के लिए यह मशीन क्यों अहम है
भारत में खेती की ज़मीन का बड़ा हिस्सा छोटे टुकड़ों में बंटा है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार देश में लगभग 14.6 करोड़ परिचालन जोत (ऑपरेशनल होल्डिंग) थीं, जिनमें से करीब 86 प्रतिशत दो हेक्टेयर से छोटी थीं। यानी लगभग 12.5 करोड़ से अधिक किसान परिवार बहुत सीमित ज़मीन पर खेती करते हैं।
| आंकड़ा | विवरण |
|---|---|
| कुल परिचालन जोत | लगभग 14.6 करोड़ |
| दो हेक्टेयर से छोटी जोत | लगभग 86 प्रतिशत |
| स्रोत | कृषि जनगणना 2015-16 |
ऐसे किसानों के लिए पूर्ण आकार का ट्रैक्टर खरीदना आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है। कई बार छोटे खेत में बड़े ट्रैक्टर का उपयोग व्यावहारिक भी नहीं होता। इसी खाई को भरने के लिए रैतु लगभग ₹4 लाख की कीमत वाली इलेक्ट्रिक मशीन पेश कर रहा है।
क्या रैतु की मशीन ट्रैक्टर की जगह ले सकती है?
रैतु की मशीन छोटे खेतों के लिए एक वैकल्पिक समाधान के रूप में डिज़ाइन की गई है। यह हर तरह के बड़े कार्य में पूर्ण आकार के ट्रैक्टर का स्थान लेने का दावा नहीं करती, बल्कि वहां उपयोगी है जहां ट्रैक्टर में निवेश करना व्यावहारिक नहीं है।
हरियाणा सरकार का सहयोग
हरियाणा सरकार ने रैतु के विकास और उसकी कृषि तकनीक के लिए ₹10 लाख का अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई है। कंपनी के अनुसार हरियाणा के उद्योग एवं वाणिज्य विभाग तथा राज्य के कृषि अधिकारियों ने इस स्टार्टअप के काम को मान्यता दी है। कंपनी का यह भी कहना है कि सरकार की ओर से भेजे गए प्रशंसा पत्र में प्रोटोटाइप की उस क्षमता की सराहना की गई, जो छोटी जोत वाले किसानों को लाभ पहुंचा सकती है।
ध्यान देने की बात है कि यह जानकारी कंपनी द्वारा साझा की गई है। अनुदान की अंतिम शर्तें, किस्तों का विवरण और वितरण की समय-सीमा अलग से स्पष्ट होने पर ही पूरी तस्वीर सामने आएगी।
बांग्लादेश से जुड़ाव
रैतु की पहुंच भारत की सीमा से बाहर भी है। कंपनी के अनुसार इसका संपर्क बांग्लादेश के कृषि मंत्रालय से बना। यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब अद्वैत और रैतु के निदेशक एवं मुख्य परिचालन अधिकारी (COO) निमिष अग्रवाल इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स ओलंपियाड में शामिल हुए और वहां आए बांग्लादेशी सरकारी अधिकारियों के सामने अपना नवाचार प्रस्तुत किया।
अधिकारियों ने टीम को बांग्लादेश के कृषि मंत्रालय से जोड़ा, जिसके बाद स्थानीय किसानों तक पहुंचना संभव हुआ। कंपनी के अनुसार मंत्रालय आगे और सहायता तथा अतिरिक्त मशीनों की खरीद पर भी विचार कर रहा है। बांग्लादेश में कंपनी का संचालन जैफ बिन मोर्शेद के सहयोग से चल रहा है।
विचार कहां से आया
रैतु की शुरुआत अद्वैत के पारिवारिक अनुभवों से हुई। उनके रिश्तेदार खेती से जुड़े हैं और उन्होंने देखा कि कठिन शारीरिक श्रम का असर किसानों के स्वास्थ्य पर लंबे समय में कितना गहरा पड़ता है। इसी अनुभव ने उन्हें ऐसी मशीन बनाने की प्रेरणा दी जो किसानों का बोझ घटाए।
तीन प्रोटोटाइप और एक बड़ी सीख
टीम ने कुल तीन प्रोटोटाइप बनाए और उन्हें असली खेतों में परखा। एक प्रोटोटाइप में खेत के भीतर ढांचागत (स्ट्रक्चरल) खराबी आ गई। इसके बाद टीम ने डिज़ाइन को फ्रेम से दोबारा तैयार किया, जिससे अधिक भारी और मॉड्यूलर इलेक्ट्रिक मशीन बनी। खेत में असफलता से सीखकर डिज़ाइन सुधारना इस परियोजना की सबसे अहम उपलब्धियों में गिना जा सकता है।
टीम, फंडिंग और पुरस्कार
निमिष अग्रवाल रैतु में निदेशक और मुख्य परिचालन अधिकारी हैं। शुरुआती दौर में साथी छात्र यी और चेतन ने भी योगदान दिया। बांग्लादेश के कार्यों में जैफ बिन मोर्शेद का सहयोग मिल रहा है।
| उपलब्धि | विवरण |
|---|---|
| हरियाणा सरकार | ₹10 लाख के अनुदान की प्रतिबद्धता |
| निजी फंडिंग | ₹5 लाख जुटाए गए |
| पुरस्कार | इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस (ISB) के वेंचर वर्स कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ स्टार्टअप पिच |
| किसानों तक पहुंच | 60 से अधिक किसान, भारत और बांग्लादेश में |
किसान का अनुभव
सोमशेखर नामक किसान ने इस मशीन का उपयोग किया है। उनके अनुसार इससे उनकी खेती का तरीका बदला है और खेत में काम के दौरान आने वाले शारीरिक जोखिमों से उन्हें राहत मिली है। यह किसान की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है, जिसे व्यापक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन यह मशीन की व्यावहारिक उपयोगिता का संकेत ज़रूर देती है।
आगे की चुनौतियां
किसी भी नई कृषि तकनीक के लिए खेत में लंबे समय तक टिके रहना असली परीक्षा होती है। रैतु के सामने आने वाले समय में मुख्य रूप से ये चुनौतियां होंगी:
- मशीन की पहुंच अधिक किसानों तक बढ़ाना
- अलग-अलग मिट्टी और मौसम में लंबे समय तक प्रदर्शन साबित करना
- बैटरी चार्जिंग और रखरखाव की सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराना
- कीमत को ऐसे स्तर पर रखना कि छोटे किसान वास्तव में उसे खरीद सकें
कंपनी ने स्वयं भी यही माना है कि पहुंच बढ़ाना, खेतों में दीर्घकालिक प्रदर्शन दिखाना और तकनीक को किसानों के लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाना उसकी अगली चुनौती है।
उपयोगी सरकारी लिंक
कृषि यंत्रों पर सहायता और स्टार्टअप योजनाओं की जानकारी के लिए पाठक ये आधिकारिक पोर्टल देख सकते हैं:
- कृषि जनगणना के आंकड़ों के लिए: कृषि जनगणना पोर्टल
- कृषि यंत्रीकरण योजनाओं और अनुदान की जानकारी के लिए: कृषि यंत्रीकरण पोर्टल
- स्टार्टअप पंजीकरण और सरकारी योजनाओं के लिए: स्टार्टअप इंडिया
- इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस की जानकारी के लिए: ISB की वेबसाइट
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रैतु एग्रीटेक क्या है?
रैतु एक एग्रीटेक स्टार्टअप है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए बिजली से चलने वाली बहु-उपयोगी कृषि मशीन बना रहा है। इसकी स्थापना 2023 में कक्षा 12 के छात्र अद्वैत दत्ता रेड्डी पालम ने की।
रैतु की इलेक्ट्रिक मशीन की कीमत कितनी है?
कंपनी के अनुसार रैतु की इलेक्ट्रिक मशीन की अनुमानित कीमत लगभग ₹4 लाख है।
यह मशीन कौन-कौन से कार्य कर सकती है?
अटैचमेंट बदलकर इस मशीन से जुताई, निराई, बुवाई, छिड़काव और सिंचाई जैसे कार्य किए जा सकते हैं।
हरियाणा सरकार ने रैतु को कितना अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई है?
कंपनी के अनुसार हरियाणा सरकार ने 28 जुलाई 2026 को ₹10 लाख का अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई है।
रैतु अब तक कितने किसानों तक पहुंचा है?
कंपनी के अनुसार रैतु 60 से अधिक किसानों की मदद कर चुका है, जिनमें भारत के 40 से अधिक और बांग्लादेश के 20 से अधिक किसान शामिल हैं।
कुल मिलाकर, एक स्कूली छात्र के नेतृत्व में खड़ा यह स्टार्टअप दिखाता है कि ज़मीनी समस्या को समझकर बनाया गया इंजीनियरिंग समाधान दो देशों की सरकारों का ध्यान खींच सकता है। इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह तकनीक कितने छोटे किसानों के खेतों तक टिकाऊ और सस्ते रूप में पहुंच पाती है।
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