NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 7: Dharmashcha Vyavaharashcha | धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्

NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के सप्तम पाठ 'धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें कौटिल्य का अर्थशास्त्र, राज्य के सात अंग, न्याय के चार आधार और अमरकोश का परिचय — चित्रों सहित — शामिल है।

Aug 30, 2026 - 03:51
Updated: 23 hours ago
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 “धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्” की फीचर्ड इमेज, जिसमें बाईं ओर गुरु-शिष्य कक्षा, बीच में न्याय और राजशासन के प्रतीक, तथा दाईं ओर अध्याय का पुस्तक कवर दिखाया गया है।
यह चित्र कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 – “धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्” पर आधारित एक आकर्षक फीचर्ड इमेज है। बाईं ओर पारंपरिक भारतीय कक्षा का दृश्य है, जहाँ आचार्य विद्यार्थियों को अर्थशास्त्र, धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन के बारे में समझा रहे हैं। मध्य भाग में शास्त्रीय शैली के चार्ट और प्रतीक दिए गए हैं, जिनमें राज्य के सात अंग और न्याय के चार पाद दर्शाए गए हैं। दाईं ओर अध्याय का सुंदर पुस्तक कवर है, जिसमें न्याय, राजसत्ता, भवन और भारतीय स्थापत्य की झलक मिलती है। पूरी रचना अध्याय की विषय

NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का सप्तम पाठ "धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्" आचार्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र, राज्य के सात अंगों, न्याय के चार आधारों और भारतीय शासन-परंपरा का परिचय संवाद-शैली में देता है। पाठ में राजा के कर्तव्य, राजकोष व कर-व्यवस्था, तथा भारतीय संविधान से अर्थशास्त्र के संबंध को भी दर्शाया गया है, साथ ही चाणक्य के सुख-सूत्र और अमरकोश ग्रन्थ का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।

सातों पाठों को एक साथ देखें तो ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक की विषय-विविधता पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है — संविधान, प्राचीन ज्ञान-परंपरा, आयुर्वेद, नारी-शक्ति, बौद्धधर्म और कृषि के पश्चात् यह सप्तम पाठ राजशासन-व्यवस्था और न्याय-सिद्धांतों को संस्कृत के माध्यम से प्रस्तुत करता है, जो प्रथम पाठ के संविधान-विषयक विवेचन से भी गहनता से जुड़ा हुआ है।

पाठ का सार — पुस्तकालय में अर्थशास्त्र पर चर्चा

पाठ का आरंभ एक पुस्तकालय-दृश्य से होता है, जहाँ अध्यापक विद्यार्थियों (दक्ष, श्रुति, वागीश, मुदिता, श्रीवाणी) के साथ अर्थशास्त्र ग्रन्थ पर चर्चा करते हैं। दक्ष बताता है कि अध्यापक के कहने पर वे पुस्तकालय गए थे और वहाँ आचार्य कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ देखा। अध्यापक स्पष्ट करते हैं कि इस ग्रन्थ में आचार, व्यवहार और नागरिकों के कर्तव्य जैसे विषय विस्तार से वर्णित हैं, और भूमि के लाभ व संरक्षण हेतु पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा प्रस्तावित प्रायः सभी अर्थशास्त्रों को संकलित कर ही यह ग्रन्थ रचा गया।

राज्य के सात अंग (सप्त प्रकृतयः)

विद्यार्थी श्रुति के प्रश्न पर अध्यापक अर्थशास्त्र का यह श्लोक उद्धृत करते हैं:

"स्वाम्यमात्य-जनपद-दुर्ग-कोश-दण्ड-मित्राणि प्रकृतयः।" (६.२.२७)

पाठ के अनुसार इस श्लोक में राज्य के सात अंग (प्रकृतियाँ) बताए गए हैं — स्वामी (शासन-प्रमुख/राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (जनों के वास योग्य भूभाग), दुर्ग (सुरक्षा-चक्र/किला), कोश (सरकारी वित्त-संग्रह), दण्ड (प्रजा-अनुशासन-व्यवस्था/सेना), और मित्र (सुहृद् देश/सहयोगी राष्ट्र)। पाठ के चित्र में इन सातों अंगों को एक चक्र के रूप में दर्शाया गया है, जिसके केंद्र में स्वयं आचार्य कौटिल्य विराजमान हैं, साथ में यह संदेश भी है कि इन सात प्रकृतियों के समुचित पालन से ही राष्ट्र समृद्धि प्राप्त करता है।

चित्र विवरण: स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र — अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के सात अंग।

न्याय के चार आधार

पाठ का शीर्षक भी इसी संकल्पना से लिया गया है। अध्यापक बताते हैं कि न्याय के चार आधार ("पाद") होते हैं — धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन — और इन्हीं के माध्यम से विवादों का समाधान होता था। पाठ में यह श्लोक उद्धृत है:

"धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्। विवादार्थश्चतुष्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः॥
अत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु। चरित्रं सङ्ग्रहे पुंसां राज्ञामाज्ञा तु शासनम्॥"

अर्थात् धर्म सत्य में स्थित होता है, व्यवहार साक्षियों पर आधारित होता है, चरित्र लोगों के संचित आचरण (प्रथा/परंपरा) में निहित होता है, और शासन राजा की आज्ञा होती है। पाठ यह भी स्पष्ट करता है कि विवाद के इन चार आधारों में, क्रम में बाद वाला आधार पहले वाले से अधिक प्रबल माना जाता है — अर्थात् टकराव की स्थिति में राजशासन, चरित्र से; चरित्र, व्यवहार से; और व्यवहार, धर्म से अधिक प्रभावी होता है।

चित्र विवरण: धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन — प्राचीन भारतीय न्याय-व्यवस्था के चार आधार।

प्रसिद्ध ध्येय-वाक्य

पाठ के अनुसार आज भी इन सिद्धांतों का प्रयोग दिखाई देता है। "यतो धर्मस्ततो जयः" (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है) भारत के उच्चतम न्यायालय (सर्वोच्च न्यायालय) का ध्येय-वाक्य है, जिसमें धर्म की प्रतिष्ठा ही झलकती है। इसी प्रकार "सत्यमेव जयते" और "धर्मचक्रप्रवर्तनाय" जैसे प्रसिद्ध ध्येय-वाक्य भी विभिन्न भारतीय संस्थाओं में अनुप्रयुक्त होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि धर्म और सत्य की यह प्राचीन परंपरा आज भी भारतीय राष्ट्र-जीवन में जीवंत है।

राजा के कर्तव्य

शासकों के कर्तव्यों पर चर्चा करते हुए अध्यापक अर्थशास्त्र के ये दो श्लोक उद्धृत करते हैं:

"विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः। अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः॥" (१.२.५)

"प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥" (१.१९.३९)

अर्थात् विद्या से विनम्र राजा, जो प्रजा के अनुशासन में और सभी प्राणियों के हित में रत रहता है, वही निर्विवाद रूप से पृथ्वी का उपभोग करता है। राजा का सुख प्रजा के सुख में है, और उसका हित प्रजा के हित में है — राजा का व्यक्तिगत प्रिय महत्त्वपूर्ण नहीं, अपितु प्रजा को जो प्रिय व हितकर हो, वही राजा के लिए भी प्रिय व हितकर माना जाना चाहिए। इस प्रकार राजा का जीवन प्रजा-सेवा को समर्पित माना गया है।

राजकोष और कर-व्यवस्था

नागरिकों की सुरक्षा व व्यवस्था पर चर्चा करते हुए अध्यापक बताते हैं कि अर्थशास्त्र में "कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः" (२.८.१–२) — अर्थात् सभी कार्यों का आरंभ कोष (राजकोष) से पूर्व होता है — यह उक्ति दी गई है, इसीलिए कोष की व्यवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी गई है। सभी नागरिकों के भोजन आदि की व्यवस्था करना ही कोष का मुख्य प्रयोजन था। पाठ के अनुसार उस काल में भी कर-व्यवस्था विद्यमान थी — नियमानुसार धान्य का छठा भाग, व्यापार-आय का दसवाँ भाग, तथा स्वर्ण, कर के रूप में देय होता था।

चित्र विवरण: धान्य का छठा भाग, व्यापार-आय का दसवाँ भाग, और स्वर्ण — प्राचीन कर-व्यवस्था के तीन अंश।

अर्थशास्त्र और भारतीय संविधान का संबंध

पाठ के अंत में अध्यापक एक महत्त्वपूर्ण बात बताते हैं — अर्थशास्त्र में ऐसे अनेक विषय हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं, और भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भी इस ग्रन्थ से अनेक अंश ग्रहण किए। यह संबंध ऋषिकुल्या के प्रथम पाठ "अहमस्मि भारतस्य संविधानम्" से भी गहनता से जुड़ता है, जहाँ भारत के संविधान की प्रस्तावना, मूल्यों और मौलिक कर्तव्यों की चर्चा की गई है — यह दिखाता है कि आधुनिक भारतीय शासन-व्यवस्था की जड़ें प्राचीन ग्रन्थों में भी विद्यमान हैं।

एक शब्द, अनेक अर्थ

पाठ के व्याकरण-प्रकरण "अत्र इदम् अवधेयम्" में यह दिखाया गया है कि संस्कृत के कई शब्द प्रसंगानुसार भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं:

  • प्रकृति — स्वभाव, स्वरूप, प्रकृति (निसर्ग), राज्य के अंग, माया, आगम
  • व्यवहार — मुकदमा, लेन-देन, स्वभाव
  • अर्थ — विषय, अर्थ (meaning), प्रयोजन, धन, याचना (धातु-रूप में)
  • दण्ड — डंडा, सेना, दंड (सज़ा)
  • कोश/कोष — दोनों शब्द "भण्डार" के अर्थ में समानार्थक हैं

यह बताता है कि "अर्थशास्त्र" शीर्षक में स्वयं "अर्थ" शब्द के भी बहुविध अर्थ संभव हैं — धन, प्रयोजन, या विषय — जो इस ग्रन्थ के व्यापक दायरे को दर्शाता है।

चाणक्य का सुख-सूत्र और अमरकोश का परिचय

"स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में चाणक्य-प्रणीत-सूत्रम् से एक कारण-श्रृंखला दी गई है — सुख का मूल धर्म है, धर्म का मूल अर्थ (धन) है, अर्थ का मूल राज्य है, राज्य का मूल इन्द्रिय-विजय है, इन्द्रिय-विजय का मूल विनय है, विनय का मूल वृद्ध-जनों की सेवा है, और वृद्धोपसेवा का मूल ज्ञान है। इसी भाव को इस प्रसिद्ध सुभाषित में संक्षेप में कहा गया है:

"विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मः ततस्सुखम्॥"

अर्थात् विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता (योग्यता) प्राप्त होती है, पात्रता से धन मिलता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। इसी खंड में आचार्य अमरसिंह द्वारा रचित प्रसिद्ध कोश-ग्रन्थ "अमरकोश" का भी परिचय दिया गया है, जिसके तीन काण्ड (भाग) हैं। पाठ में इसके तृतीय काण्ड के "नानार्थवर्ग" से एक उदाहरण-श्लोक भी दिया गया है, जो दर्शाता है कि कैसे एक ही शब्द (जैसे "नाक") के कई अर्थ हो सकते हैं — आकाश, स्वर्ग आदि।

पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली

पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:

संस्कृत शब्द अर्थ (हिंदी) Meaning (English)
संहृत्य इकट्ठा करके Bringing together
शासनव्यवस्था शासन की व्यवस्था Governing system
सर्वकारीयवित्तकोषः सरकारी कोष Government treasury
विवादसमाधानम् मतभेद का समाधान Dispute resolution
उच्चतमन्यायालयस्य सर्वोच्च न्यायालय का Of the supreme court
ध्येयवाक्ये ध्येय के प्रेरक वाक्य में In the motto
भुङ्क्ते भोजन करता है, भोगता है Enjoys
सर्वभूतहिते सब का हित करने में For the wellbeing of all
करव्यवस्था कर लेने-देने की व्यवस्था Taxation system
धान्यषड्भागम् धान का छठा भाग One-sixth part of grain
पण्यदशभागम् व्यापार का दसवाँ भाग One-tenth part of trade
हिरण्यम् सोना Gold
संविधानकर्तृभिः संविधान के निर्माताओं द्वारा By the makers of the constitution
जिज्ञासाशमनार्थम् जिज्ञासा की शान्ति हेतु To quench the thirst for knowing
दिङ्मात्रम् केवल दिशासूचक Mere indication

पाठ में "शासनव्यवस्था" व "विवादसमाधानम्" (षष्ठी-तत्पुरुष), "सर्वकारीयवित्तकोषः" (कर्मधारय), और "अस्पष्टता" (नञ्-तत्पुरुष) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।

अभ्यास और गतिविधियाँ

पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:

  • पाठ पर आधारित एक-वाक्य प्रश्नों के उत्तर लिखना — जैसे अर्थशास्त्र के विषय, राज्य के अंग, न्याय के चार पाद, तथा कर के रूप में देय वस्तुओं से जुड़े प्रश्न
  • कोष्ठक में दिए गए पदों (स्वामी, अमात्य, दुर्गम्, कोषः, मित्रम्) को अर्थानुसार रिक्त स्थानों में योजित करना
  • दिए गए वाक्यों का पाठ से समानार्थक सूक्ति खोजना
  • चाणक्य के सुख-सूत्र से संबंधित अनुच्छेद पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखना

पाठ के साथ "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को कक्षा 6-9 की पाठ्यपुस्तकों से अमरकोश-शैली के वाक्य संकलित करने, भारत के प्रशासनिक पदों व मंत्रियों का वंश-वृक्ष बनाने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से अर्थशास्त्र की रचना-संरचना दर्शाने वाला फलक बनाने, अर्थव्यवस्था विषय पर वाद-विवाद प्रस्तुत करने, तथा पाठ में आए ध्येय-वाक्यों सहित दस अन्य प्रसिद्ध संस्थाओं के ध्येय-वाक्य खोजकर प्रस्तुत करने जैसी गतिविधियाँ दी गई हैं।

प्रश्न एवं उत्तर

पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:

प्रश्न 1: अर्थशास्त्र ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: अर्थशास्त्र ग्रन्थ के रचयिता आचार्य कौटिल्य हैं।

प्रश्न 2: राज्य के सात अंग (सप्त प्रकृतयः) कौन-से हैं?

उत्तर: स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र — ये राज्य के सात अंग हैं।

प्रश्न 3: न्याय के चार आधार (पाद) कौन-से हैं?

उत्तर: धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन — ये न्याय के चार आधार हैं।

प्रश्न 4: इन चार आधारों में कौन-सा आधार सबसे प्रबल माना जाता है?

उत्तर: पाठ के अनुसार क्रम में बाद वाला आधार पहले वाले से अधिक प्रबल होता है, अतः राजशासन सबसे प्रबल है।

प्रश्न 5: भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय-वाक्य क्या है?

उत्तर: "यतो धर्मस्ततो जयः" भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय-वाक्य है।

प्रश्न 6: राजा के अनुसार उसका सुख किसमें निहित है?

उत्तर: पाठ के अनुसार राजा का सुख प्रजा के सुख में और उसका हित प्रजा के हित में निहित है, न कि उसके व्यक्तिगत प्रिय में।

प्रश्न 7: प्राचीन काल में कर के रूप में क्या देय था?

उत्तर: धान्य का छठा भाग, व्यापार-आय का दसवाँ भाग, तथा स्वर्ण कर के रूप में देय था।

प्रश्न 8: भारतीय संविधान का अर्थशास्त्र से क्या संबंध बताया गया है?

उत्तर: पाठ के अनुसार भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अर्थशास्त्र से अनेक अंश ग्रहण किए हैं।

प्रश्न 9: चाणक्य के सुख-सूत्र के अनुसार सुख का मूल क्या है?

उत्तर: सुख का मूल धर्म है, धर्म का मूल अर्थ (धन) है, और अर्थ का मूल राज्य है — इस प्रकार यह एक कारण-श्रृंखला है।

प्रश्न 10: अमरकोश किसने रचा और उसमें कितने काण्ड हैं?

उत्तर: अमरकोश आचार्य अमरसिंह द्वारा रचित है, जिसमें तीन काण्ड हैं।

प्रश्न 11: "अर्थ" शब्द के पाठ में कौन-कौन से भिन्न अर्थ बताए गए हैं?

उत्तर: विषय, अर्थ (meaning), प्रयोजन, धन, और याचना — ये "अर्थ" शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं।

प्रश्न 12: कोश की व्यवस्था को अर्थशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण बताया गया है?

उत्तर: क्योंकि "कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः" अर्थात् सभी कार्यों का आरंभ कोष से पूर्व होता है, इसलिए कोष की व्यवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी गई है।

पाठ से मुख्य सीख

इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:

  • राज्य के सात अंग — स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र — मिलकर एक सुव्यवस्थित शासन की नींव बनाते हैं।
  • धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन — न्याय के ये चार आधार आज भी भारत की न्याय-व्यवस्था में मूर्त रूप में विद्यमान हैं।
  • एक आदर्श शासक अपने व्यक्तिगत हित से पहले प्रजा के हित को रखता है।
  • भारतीय संविधान की जड़ें प्राचीन ग्रन्थों जैसे अर्थशास्त्र में भी खोजी जा सकती हैं।
  • विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है — यह प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन का सार है।

इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ प्राचीन भारतीय राजशासन-व्यवस्था, न्याय-सिद्धांतों और भारतीय संविधान की ऐतिहासिक जड़ों की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। कक्षा 9 के अन्य विषयों की व्याख्या के लिए विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 भी देख सकते हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से जुड़ी बुनियादी अवधारणाएँ समझाई गई हैं।

Frequently Asked Questions

धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन — न्याय के ये चार आधार हैं, और पाठ के अनुसार क्रम में बाद वाला आधार पहले वाले से अधिक प्रबल माना जाता है।

"यतो धर्मस्ततो जयः" भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय-वाक्य है, जिसे पाठ में धर्म की प्रतिष्ठा के उदाहरण रूप में उद्धृत किया गया है।

पाठ के अनुसार भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अर्थशास्त्र से अनेक अंश ग्रहण किए हैं, जो प्राचीन भारतीय शासन-परंपरा और आधुनिक संविधान के बीच की निरंतरता को दर्शाता है।

स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र — ये अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के सात अंग हैं।
Yash Kumar

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