NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 3: Atmavat Sarvabhuteshu Yah Pashyati Sah Panditah | आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः की सम्पूर्ण हिंदी व्याख्या

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय "आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" का यह लेख एक सम्पूर्ण स्टडी गाइड है। इसमें संत नामदेव और देव पाण्डुरङ्ग की प्रेरक कथा का सरल हिंदी सारांश, कठिन शब्दार्थ, महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर और उपपदविभक्तियों की व्याकरणिक व्याख्या दी गई है, जो परीक्षा की तैयारी के लिए बेहद उपयोगी है।

Aug 30, 2026 - 00:46
Updated: 3 hours ago
0 5
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः का हिंदी सारांश, संत नामदेव की कथा, कठिन शब्दार्थ और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर को दर्शाता हुआ चित्र।
यह शैक्षिक पोस्टर कक्षा 9 संस्कृत के अध्याय 3, **“आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः”** को प्रस्तुत करता है। इसमें पाठ की संवाद-रूपी कथा, सरल सारांश, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, व्याकरण, परीक्षा हेतु प्रश्न-उत्तर, पात्र और नैतिक मूल्यों को दर्शाया गया है। संत नामदेव की करुणा के माध्यम से दया, समानता, सेवा और सभी जीवों में ईश्वर को देखने की सीख दी गई है।

संस्कृत विषय में कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए तृतीय पाठ "आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" पिछले पाठों से बिल्कुल अलग है — यह किसी सुभाषित-निबंध या गद्यांश की तरह नहीं, बल्कि एक संवाद-रूपी कथा (नाट्यांश) है, जिसमें मातामही (नानी) अपने पौत्र-पौत्री कपिल और माधवी को संत नामदेव महाराज की एक शिक्षाप्रद घटना सुनाती हैं। इस लेख में हम इसी पाठ को कक्षा 9 के विद्यार्थियों के स्तर पर, बहुत ही सरल भाषा में समझेंगे। यहाँ आपको आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः का सारांश, संवादों का भावार्थ, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, उपपदविभक्तियों की सरल व्याख्या, क्तवतु-प्रत्ययान्त रूपों की तालिका और परीक्षा के लिए ज़रूरी प्रश्न-उत्तर — सब कुछ एक ही जगह मिलेगा, ताकि आप इस पाठ को अच्छी तरह याद रख सकें और परीक्षा में आत्मविश्वास से उत्तर लिख सकें।

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः पाठ का परिचय

"आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" एक संवादात्मक (नाट्य-शैली में लिखा) पाठ है, जिसमें मातामही (नानी), उनके पौत्र कपिल और पौत्री माधवी — तीन पात्र हैं। पाठ की शुरुआत में बताया गया है कि भारतभूमि अनेक ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि रही है, जिनके चरित्र सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। इन्हीं महात्माओं में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज का उदाहरण दिया गया है, जिन्होंने अपने व्यवहार से करुणा का महान आदर्श प्रस्तुत किया।

कहानी की शुरुआत तब होती है जब कपिल और माधवी छुट्टी के दिन मामा के घर जाते हैं और खेलते समय एक कुत्ते को पत्थर मारकर भगा देते हैं। यह देखकर मातामही उन्हें बुलाती हैं और संत नामदेव की एक शिक्षाप्रद घटना सुनाती हैं — कैसे नामदेव ने अपनी नैवेद्य-भरी रोटी चुराकर भागते हुए कुत्ते पर क्रोध करने के बजाय, उसे घी लेकर दौड़ाया ताकि सूखी रोटी खाकर उसे पेट-दर्द न हो। इस घटना से भगवान पाण्डुरङ्ग स्वयं प्रकट होकर नामदेव को परीक्षा में उत्तीर्ण घोषित करते हैं, क्योंकि उन्होंने गुरु-उपदेश "ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति" को सचमुच अपने जीवन में उतारा था। इस कथा से प्रेरित होकर कपिल और माधवी भी संकल्प लेते हैं कि वे कभी किसी जीव को पीड़ा नहीं पहुँचाएँगे।

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः का सरल सारांश

पाठ के आरम्भ में बताया गया है कि भारतदेश अनेक ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है, और उनके चरित्रों में भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता तथा बन्धुता जैसे जीवन-मूल्य मिलते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज ने अपने आचरण से करुणा का महान आदर्श स्थापित किया — वे सर्वात्मक ईश्वर की न केवल भक्ति (सङ्कीर्तन) करते थे, बल्कि सभी जीवों में भी उसी भगवान को देखते थे।

कहानी की शुरुआत में कपिल और माधवी अवकाश के समय मामा के घर जाते हैं और वहाँ खेलते समय एक कुत्ते को देखकर, बिना किसी कारण के, पत्थर उठाकर उसे मारने दौड़ते हैं। कुत्ता डरकर भाग जाता है, और दोनों बच्चे इस पर हँसते हैं। यह दृश्य दूर से देख रही मातामही उन्हें पास बुलाकर पूछती हैं कि वे क्या कर रहे थे। जब बच्चे बताते हैं कि कुत्ता उनके खेल में बाधा डाल रहा था इसलिए उन्होंने उसे "दण्डित" किया, तो मातामही उन्हें कहानी सुनाने का प्रस्ताव रखती हैं।

मातामही बताती हैं कि भारतभूमि अनेक नररत्नों, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों की जननी रही है। वे पूछती हैं कि क्या बच्चे महात्मा नामदेव को जानते हैं। माधवी बताती है कि उसने सुना है कि नामदेव के कीर्तन पर स्वयं देव पाण्डुरङ्ग नृत्य करते थे। मातामही इसकी पुष्टि करते हुए बताती हैं कि देव पाण्डुरङ्ग नामदेव के प्रिय सुहृद (मित्र) थे — नामदेव प्रतिदिन उन्हें नैवेद्य अर्पित करके ही स्वयं भोजन करते थे। उनके गुरु विसोबा ने उन्हें यह शिक्षा दी थी कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि सभी भूतों (प्राणियों) में निवास करता है, इसलिए सर्वात्मक ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद मातामही मुख्य घटना सुनाती हैं — एक दिन नामदेव नैवेद्य-स्थालिका लेकर मन्दिर गए, विग्रह के सामने रखी, आँखें बन्द करके प्रार्थना की और मन्त्र पढ़कर आँखें खोलीं तो देखा कि स्थालिका में रोटी नहीं थी! पूछने पर पता चलता है कि एक भूखा कुत्ता रोटी मुँह में दबाकर भाग गया था। कपिल तुरन्त कहता है कि नामदेव ने क्रोध में लाठी लेकर कुत्ते को मारने दौड़ा होगा। परन्तु मातामही बताती हैं कि नामदेव क्रोध से नहीं, बल्कि करुणा से दौड़े थे — हाथ में लाठी नहीं, बल्कि घी का पात्र लेकर, यह कहते हुए कि "सूखी रोटी मत खाओ, घी भी ले लो", ताकि कुत्ते को पेट-दर्द न हो।

यह सुनकर कपिल और माधवी दोनों लज्जित हो जाते हैं। मातामही आगे बताती हैं कि तभी कुत्ता अदृश्य हो गया और उसके स्थान पर स्वयं देव पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए। उन्होंने नामदेव से कहा — "हे वत्स नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। गुरु का उपदेश 'ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करता है' केवल सुना ही नहीं, बल्कि उसका पालन भी किया — तुम सचमुच धन्य हो।" यह सुनकर कपिल स्वयं स्वीकार करता है कि उसने बिना कारण कुत्ते को पीड़ा दी और आगे कभी किसी जीव को पीड़ित न करने का संकल्प लेता है। माधवी भी क्षमा माँगती है और वही संकल्प दोहराती है। अन्त में मातामही दोनों को गले लगाकर यह संकल्प कराती हैं कि वे कभी काया, वाणी या मन से किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाएँगे — यही पाठ का मूल सन्देश है: "आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।"

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः का हिंदी सारांश, संत नामदेव की कथा, कठिन शब्दार्थ और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर को दर्शाता हुआ चित्र।

संवादों का सरल भावार्थ

1. कुत्ते को दण्ड और मातामही का प्रश्न

कपिल और माधवी मामा के घर खेलते समय एक कुत्ते को देखकर बिना कारण उसे पत्थर मारकर भगा देते हैं और हँसते हैं। यह देख मातामही उन्हें बुलाकर पूछती हैं कि वे क्या कर रहे थे, और फिर उन्हें एक शिक्षाप्रद कथा सुनाने का प्रस्ताव रखती हैं।

आसान भाषा में समझें: बिना कारण किसी प्राणी को कष्ट देना उचित नहीं है — मातामही इसी बात को कहानी के माध्यम से समझाना चाहती हैं।

2. नामदेव और पाण्डुरङ्ग की मित्रता

मातामही बताती हैं कि पुण्यश्लोक नामदेव महाराज देव पाण्डुरङ्ग के केवल भक्त ही नहीं, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। नामदेव प्रतिदिन पाण्डुरङ्ग को नैवेद्य अर्पित करके ही भोजन करते थे। उनके गुरु विसोबा ने उन्हें सिखाया था कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, अपितु सभी भूतों में निवास करता है।

आसान भाषा में समझें: सच्ची भक्ति वही है जिसमें ईश्वर को हर जगह और हर प्राणी में देखा जाए, केवल मन्दिर की मूर्ति में नहीं।

3. रोटी का चोरी जाना और नामदेव की करुणा

एक दिन नामदेव नैवेद्य लेकर मन्दिर गए, प्रार्थना करके आँखें खोलीं तो रोटी गायब मिली — एक भूखा कुत्ता उसे लेकर भाग गया था। क्रोध करने के बजाय नामदेव घी का पात्र लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े, ताकि सूखी रोटी खाने से उसे पेट-दर्द न हो।

आसान भाषा में समझें: असली सन्त वही है जो नुकसान होने पर भी क्रोध नहीं करता, बल्कि दूसरे प्राणी के कल्याण के बारे में सोचता है।

4. पाण्डुरङ्ग का प्रकट होना और संकल्प

कुत्ता अदृश्य होकर उसके स्थान पर देव पाण्डुरङ्ग प्रकट होते हैं और नामदेव को परीक्षा में उत्तीर्ण घोषित करते हैं, क्योंकि उन्होंने गुरु-उपदेश को वास्तव में जीवन में उतारा। इससे प्रेरित होकर कपिल और माधवी अपनी गलती स्वीकार कर किसी को भी पीड़ा न देने का संकल्प लेते हैं।

आसान भाषा में समझें: ज्ञान सुनने से नहीं, बल्कि उसे आचरण में उतारने से ही असली फल मिलता है — यही "आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" का सार है।

संवादों का सरल भावार्थ — एक नज़र में तुलना

ऊपर बताए गए चारों मुख्य भावों को आसानी से याद रखने के लिए नीचे एक तुलनात्मक तालिका दी गई है:

मुख्य भाव किससे जुड़ा है सरल संदेश
कुत्ते को दण्ड और प्रश्न कपिल-माधवी की कथा बिना कारण किसी को कष्ट न दें
नामदेव-पाण्डुरङ्ग मित्रता गुरु विसोबा का उपदेश ईश्वर सभी प्राणियों में है
रोटी चोरी और करुणा नामदेव की परीक्षा क्रोध नहीं, करुणा से जवाब दें
पाण्डुरङ्ग का प्रकट होना कपिल-माधवी का संकल्प आचरण ही असली भक्ति है

महत्वपूर्ण शब्दार्थ

परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन्हें याद रखने से संवादों का अन्वय और भावार्थ समझना आसान हो जाता है।

संस्कृत शब्द सरल हिंदी अर्थ
अनुधावितवान् पीछे दौड़ा
अनुपालितवान् पालन किया
अपहृत्य चुराकर
आविर्भूतवान् प्रकट हुए
आलिङ्गनं कृतवन्तौ दोनों गले मिले
ऋजुता सरलता, सीधापन
करुणया दया से
कायः शरीर
घृतम् घी
दण्डितवन्तौ दण्ड दिया
नैवेद्यम् देवता को अर्पित भोग
निकषा पास
निमील्य बन्द करके
पाषाणखण्डम् पत्थर का टुकड़ा
पुण्यश्लोकः पवित्र चरित्रवाला
प्रसवित्री जन्म देने वाली
ब्रह्मर्षीणाम् ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का
बुभुक्षितः भूखा
भक्षितवान् खाया
मातुलः मामा
म्लाने कुम्हलाया (उदास)
लगुडम् लाठी
शिक्षाप्रदा सीख देने वाली
सुहृत् मित्र

उपपदविभक्तियाँ (महत्वपूर्ण व्याकरण-बिंदु)

इस पाठ में "अत्र इदम् अवधेयम्" शीर्षक के अन्तर्गत कुछ ऐसे अव्ययों/शब्दों की चर्चा की गई है जिनके योग में विशेष विभक्ति (उपपदविभक्ति) प्रयुक्त होती है। परीक्षा में इन पर आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं, इसलिए नीचे तालिका में इन्हें स्पष्ट किया गया है:

शब्द अर्थ विभक्ति उदाहरण
प्रति आभिमुख्य (की ओर) द्वितीया बालः मातरं प्रति धावति
विना बिना द्वितीया/तृतीया/पञ्चमी कारणं विना, कारणेन विना, कारणात् विना
धिक् निन्दावाचक (धिक्कार) द्वितीया धिक् शुनकम्, धिक् दुर्जनम्
निकषा समीप (पास) द्वितीया कपिलः मातामहीं निकषा आगतवान्
परितः चारों ओर द्वितीया देवं परितः भक्ताः सन्ति
सह/साकं/सार्धम्/समम् साथ में तृतीया माधवी कपिलेन सह भ्रमति
अलम् बस, पर्याप्त (मना करना) तृतीया अलं क्रीडया, अलं क्रोधेन

अत्र इदम् अवधेयम् — पाण्डुरङ्ग कौन हैं?

पाठ में एक विशेष बॉक्स के माध्यम से देव पाण्डुरङ्ग का परिचय दिया गया है। पाण्डुरङ्ग के ही विट्ठलः, विठोबा, पण्ढरीनाथः, विठुमाऊली आदि अनेक नाम हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में पण्ढरपुर नामक प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है, जो चन्द्रभागा नदी के तीर पर स्थित है — यही वारकरी सम्प्रदाय का आराध्य देवता पाण्डुरङ्ग हैं। वे ईंट पर दोनों हाथ कमर पर रखे समचरण खड़े रहते हैं, मानो कह रहे हों — "भक्तों की रक्षा के लिए मैं सदैव कटिबद्ध हूँ।"

इसी सन्दर्भ में नामदेव की प्रार्थना का श्लोक भी दिया गया है — "नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु। ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥" जिसका सरल भावार्थ है: हे देव! यह नैवेद्य ग्रहण कीजिए, मेरी भक्ति को अटल बनाइए, मुझे इच्छित वर और परलोक में उत्तम गति प्रदान कीजिए।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु

  • पाठ का शीर्षक है — आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।
  • यह पाठ संवाद-शैली (नाट्यांश) में लिखा गया है — पात्र हैं मातामही, कपिल और माधवी।
  • पाठ का मुख्य विषय है — सन्त नामदेव महाराज की करुणा और "ईश्वर सर्वभूतेषु निवसति" का सन्देश।
  • नामदेव के गुरु का नाम विसोबा था, और उनके मित्र-देवता का नाम पाण्डुरङ्ग (विट्ठल)।
  • नामदेव ने नैवेद्य चुराकर भागते कुत्ते को क्रोध से नहीं, घी का पात्र लेकर करुणा से दौड़ाया।
  • कुत्ते के स्थान पर देव पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए और नामदेव को परीक्षा में उत्तीर्ण घोषित किया।
  • पाठ में "उपपदविभक्तयः" के अन्तर्गत प्रति, विना, धिक्, निकषा, परितः, सह/साकं/सार्धम्/समम्, अलम् — इन शब्दों की विभक्तियाँ बताई गई हैं।
  • पाण्डुरङ्ग का प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र पण्ढरपुर, महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में चन्द्रभागा नदी तट पर है।
  • क्तवतु-प्रत्ययान्त शब्दों के पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग रूप याद रखने चाहिए।
  • अन्त में कपिल और माधवी काया, वाणी और मन से किसी को पीड़ा न देने का संकल्प लेते हैं।
  • शब्दार्थ, अन्वय और उपपदविभक्ति आधारित प्रश्न परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं।

इस पाठ से हमें क्या सीख मिलती है?

"आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" पाठ हमें यह सिखाता है कि सच्चा पण्डित (ज्ञानी) वही है जो सभी प्राणियों में अपने ही समान आत्मा को देखे, अर्थात् किसी को भी कष्ट न पहुँचाए। संत नामदेव की करुणा हमें सिखाती है कि क्रोध और प्रतिशोध के स्थान पर दया और सहानुभूति ही असली धर्म है। यह पाठ विद्यार्थियों में अहिंसा, करुणा और सभी जीवों के प्रति समभाव जगाने का सन्देश देता है।

पाठ के मूल्य और विद्यार्थी के लिए व्यावहारिक सीख

पाठ में बताया गया मूल्य विद्यार्थी इससे क्या सीख सकता है
भूतदया बिना कारण किसी जीव को कष्ट न देना
करुणा नुकसान होने पर भी क्रोध की बजाय दया दिखाना
समता (समभाव) सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर को देखना
आत्म-निरीक्षण अपनी गलती स्वीकार कर सुधरने का संकल्प लेना

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः — प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: यह पाठ किस शैली में लिखा गया है और इसके पात्र कौन हैं?

उत्तर: यह पाठ संवाद-शैली (नाट्यांश) में लिखा गया है, जिसके मुख्य पात्र मातामही, कपिल और माधवी हैं।

प्रश्न 2: कपिल और माधवी ने कुत्ते के साथ क्या किया था?

उत्तर: कपिल और माधवी ने खेलते समय बिना कारण एक कुत्ते को पत्थर मारकर भगा दिया था।

प्रश्न 3: नामदेव के गुरु कौन थे और उन्होंने क्या शिक्षा दी थी?

उत्तर: नामदेव के गुरु विसोबा थे। उन्होंने शिक्षा दी थी कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, अपितु सभी भूतों (प्राणियों) में निवास करता है, अतः सर्वात्मक ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।

प्रश्न 4: नैवेद्य-स्थालिका में रोटी क्यों नहीं मिली?

उत्तर: एक भूखा कुत्ता आकर मुँह में रोटी लेकर भाग गया था, इसीलिए स्थालिका में रोटी नहीं मिली।

प्रश्न 5: नामदेव किस भावना से कुत्ते के पीछे दौड़े और उनके हाथ में क्या था?

उत्तर: नामदेव क्रोध से नहीं, बल्कि करुणा से दौड़े थे, और उनके हाथ में लाठी नहीं, बल्कि घी का पात्र था।

प्रश्न 6: नामदेव ने कुत्ते के पीछे दौड़ते हुए क्या कहा?

उत्तर: नामदेव ने कहा — "हे देव! सूखी रोटी मत खाओ, घी भी स्वीकार करो", ताकि सूखी रोटी खाने से कुत्ते को पेट-दर्द न हो।

प्रश्न 7: कुत्ते के स्थान पर कौन प्रकट हुए और उन्होंने क्या कहा?

उत्तर: कुत्ते के स्थान पर देव पाण्डुरङ्ग प्रकट हुए। उन्होंने कहा — "वत्स नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए, क्योंकि तुमने गुरु का उपदेश केवल सुना ही नहीं, बल्कि उसका पालन भी किया।"

प्रश्न 8: 'विना' शब्द के योग में कौन-सी विभक्तियाँ होती हैं?

उत्तर: 'विना' शब्द के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी — तीनों विभक्तियाँ होती हैं; जैसे कारणं विना, कारणेन विना, कारणात् विना।

प्रश्न 9: देव पाण्डुरङ्ग का प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र कहाँ स्थित है?

उत्तर: देव पाण्डुरङ्ग का प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र पण्ढरपुर, महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में, चन्द्रभागा नदी के तीर पर स्थित है।

प्रश्न 10: कहानी सुनने के बाद कपिल और माधवी ने क्या संकल्प लिया?

उत्तर: कपिल और माधवी ने संकल्प लिया कि वे कभी काया, वाणी या मन से किसी भी प्राणी को पीड़ा नहीं पहुँचाएँगे।

प्रश्न 11: 'धिक्' शब्द किस अर्थ में प्रयुक्त होता है और इसकी विभक्ति क्या है?

उत्तर: 'धिक्' शब्द निन्दावाचक (धिक्कार के अर्थ में) प्रयुक्त होता है, और इसके योग में द्वितीया विभक्ति होती है; जैसे धिक् शुनकम्।

प्रश्न 12: पाठ का मूल सन्देश ("आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः") क्या है?

उत्तर: इस सूक्ति का भाव है कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने ही समान (आत्मवत्) देखता और उनके प्रति समभाव रखता है, वही सच्चा पण्डित (ज्ञानी) है।

एक नजर में पूरा पाठ

"आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः" एक संवादात्मक (नाट्य-शैली) पाठ है, जिसमें मातामही अपने पौत्र कपिल और पौत्री माधवी को संत नामदेव महाराज की एक शिक्षाप्रद कथा सुनाती हैं। इसमें बताया गया है कि कैसे नामदेव ने अपनी नैवेद्य-रोटी चुराकर भागते कुत्ते पर क्रोध करने के बजाय करुणावश उसके पीछे घी लेकर दौड़े, जिससे प्रसन्न होकर देव पाण्डुरङ्ग स्वयं प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी प्रेरणा से कपिल और माधवी भी किसी को पीड़ा न देने का संकल्प लेते हैं। पाठ में उपपदविभक्तियों (प्रति, विना, धिक्, निकषा, परितः, सह, अलम्) तथा क्तवतु-प्रत्ययान्त रूपों का व्याकरणिक अध्ययन भी कराया गया है। परीक्षा में इस पाठ से शब्दार्थ, भावार्थ, उपपदविभक्ति और घटनाक्रम से जुड़े प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।

कक्षा 9 के पाठ्यक्रम से जुड़े अन्य विषयों की तैयारी के लिए आप हमारी वेबसाइट पर कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 के नोट्स और कक्षा 9 विज्ञान — हमारे आस-पास के पदार्थ के नोट्स भी पढ़ सकते हैं। अगर आप अपनी NCERT पाठ्यपुस्तकें ऑनलाइन मँगाना चाहते हैं, तो NCERT किताबें घर बैठे मँगाने की Step-by-Step गाइड उपयोगी रहेगी। इसके अलावा पढ़ाई को और आसान बनाने के लिए कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए बेहतरीन Free AI और Scientific Tools की सूची भी देख सकते हैं। संस्कृत पाठ्यपुस्तकों और आधिकारिक पाठ्यक्रम से जुड़ी जानकारी के लिए NCERT की आधिकारिक वेबसाइट पर भी जा सकते हैं।

Frequently Asked Questions

इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा पण्डित (ज्ञानी) वही है जो सभी प्राणियों में अपने ही समान आत्मा को देखता है और किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाता। यह हमें जीवों के प्रति करुणा और दयाभाव रखना सिखाता है।

इस पाठ में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज और उनके मित्र-देवता पाण्डुरङ्ग (विट्ठल) की कथा का वर्णन किया गया है, जो मातामही (नानी) द्वारा कपिल और माधवी को सुनाई जाती है।

संत नामदेव क्रोध के कारण नहीं, बल्कि करुणावश कुत्ते के पीछे घी का पात्र लेकर दौड़े थे। वे चाहते थे कि कुत्ता सूखी रोटी के साथ घी भी खा ले, ताकि उसे पेट-दर्द न हो।

'विना' शब्द के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी—तीनों विभक्तियों का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए: कारणं विना (द्वितीया), कारणेन विना (तृतीया), और कारणात् विना (पञ्चमी)।
Vivek kumar

Vivek Kumar is an Editorial Intern at Aapbiti, specializing in publishing and managing education-focused news articles. Operating under the direct mentorship and guidance of Shakti Rao Mani, the Product Owner of aapbiti.com, Vivek is dedicated to delivering accurate, timely, and engaging academic updates. His role focuses on keeping readers informed about educational trends, exams, admissions, and key academic policies.

Comments (0)

User