NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 2: Yo'dhitvidyah Sakalah Sa Sarvesham Gururbhavet | योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् की सम्पूर्ण व्याख्या
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) के दूसरे पाठ की व्याख्या — शुक्रनीति ग्रन्थ पर आधारित यह पाठ विद्या और कला में अंतर, 32 विद्याओं व 64 कलाओं का वर्गीकरण, छह वेदांग और अनुष्टुप् छन्द को समझाता है।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का द्वितीय पाठ "यः अधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत्" प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में विद्या और कला के वर्गीकरण को प्रस्तुत करता है। यह पाठ महर्षि शुक्राचार्य द्वारा रचित शुक्रनीति ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय के तृतीय प्रकरण से संकलित है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली, छन्द-नियम और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति के अंतर्गत संस्कृत एक मान्यता-प्राप्त भारतीय भाषा है, जिसे कक्षा 9 के अधिकांश विद्यार्थी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में पढ़ते हैं। NCERT की कक्षा 9 की अन्य नई पाठ्यपुस्तकों — जैसे गणित मंजरी — की तरह ही ऋषिकुल्या भी वर्तमान पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
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पाठ का सार — शुक्रनीति और गुरु की योग्यता
पाठ का प्रारंभ नीतिशास्त्र की परंपरा के परिचय से होता है। पाठ के अनुसार नीतिशास्त्र धर्मशास्त्र का ही एक अंग है, और नीतिशास्त्र की रचनाओं में शुक्राचार्य द्वारा रचित शुक्रनीति ग्रन्थ का विशिष्ट स्थान है। इस ग्रन्थ में राज्यव्यवस्था, दण्डनीति, अर्थनीति, प्रजापालन, शिक्षाव्यवस्था और सामाजिकव्यवस्था जैसे विषयों का विस्तार से वर्णन है। पाठ के अनुसार यह ग्रन्थ लोककल्याण, सुशासन और आदर्श समाज की स्थापना के लिए मार्गदर्शक है।
पाठ का प्रथम श्लोक ही इसका शीर्षक भी है — "यः अधीतविद्यः सकलः सः सर्वेषां गुरुः भवेत्। न च जात्या अनधीती यः गुरुः भवितुम् अर्हति॥" अर्थात् जिस व्यक्ति ने समस्त विद्याओं का सम्यक् अध्ययन किया हो, वही सबका गुरु बनने योग्य होता है; केवल जाति के आधार पर, बिना अध्ययन किए, कोई गुरु बनने का अधिकारी नहीं होता। पाठ का यह प्रारंभिक कथन ही आगे की संपूर्ण चर्चा — विद्या, कला और शास्त्र के वर्गीकरण — की भूमिका तैयार करता है।
विद्या और कला में अंतर
पाठ विद्या और कला के बीच एक स्पष्ट भेद प्रस्तुत करता है। श्लोक ३ के अनुसार जो भी कर्म वाचिक (वाणी से सम्बन्धित) हो और सम्यक् रूप से किया जाए, वह "विद्या" कहलाता है; जबकि जिस कर्म को एक मूक (गूँगा) व्यक्ति भी करने में समर्थ हो, वह "कला" कहलाती है। इस प्रकार विद्या का सम्बन्ध वाणी और बौद्धिक अध्ययन से है, जबकि कला का सम्बन्ध कौशल और व्यावहारिक निपुणता से है।
पाठ यह भी बताता है कि विद्याएँ और कलाएँ वस्तुतः अनन्त हैं, अतः इनकी पूर्ण गणना संभव नहीं है। फिर भी, स्थूल रूप से मुख्य विद्याओं की संख्या बत्तीस (३२) तथा कलाओं की संख्या चौंसठ (६४) मानी गई है।
चित्र विवरण: विद्या (वाणी से जुड़ा बौद्धिक ज्ञान) और कला (मूक व्यक्ति भी कर सकने योग्य कौशल) का तुलनात्मक चित्रण।
बत्तीस विद्याएँ और चौंसठ कलाएँ
पाठ में बत्तीस विद्याओं के नाम श्लोक ५ से ९ में क्रमबद्ध रूप से गिनाए गए हैं। इन्हें निम्नलिखित वर्गों में देखा जा सकता है:
| वर्ग | विद्याएँ |
|---|---|
| चार वेद | ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद |
| चार उपवेद | आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अर्थवेद (स्थापत्यवेद) |
| छह वेदांग | शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष |
| दर्शन-सम्बन्धी | मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग |
| इतिहास-पुराण सम्बन्धी | इतिहास, पुराण, स्मृति, नास्तिक मत |
| राजनीति व कला सम्बन्धी | अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकृति |
| भाषा व व्यवहार सम्बन्धी | काव्य, देशभाषा, अवसरोक्ति, यावन मत |
| अन्य | देशादिधर्म (देश के रीति-रिवाज) |
इस प्रकार कुल बत्तीस विद्याएँ गिनाई गई हैं। ध्यान देने योग्य है कि पाठ की सूची में "तर्क" शब्द से न्याय और वैशेषिक — दोनों दर्शनों का बोध होता है, जिससे परंपरागत षड्दर्शन (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) की पूर्णता बनी रहती है। कलाओं की संख्या चौंसठ मानी गई है, परन्तु इस पाठ में उनके नाम अलग से सूचीबद्ध नहीं किए गए हैं — पाठ की गतिविधि में विद्यार्थियों को स्वयं ग्रन्थालय अथवा अंतर्जाल की सहायता से चौंसठ कलाओं के नाम एकत्र करने को कहा गया है।
चित्र विवरण: बत्तीस विद्याओं का वेद, उपवेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास-पुराण, राजनीति-कला, भाषा-व्यवहार और स्थानीय रीति — इन आठ वर्गों में वर्गीकरण।
वैदिक वाङ्मय का वर्गीकरण
पाठ में वैदिक वाङ्मय (साहित्य) का भी वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। वाङ्मय दो प्रकार का होता है — शास्त्र और काव्य। शास्त्र भी दो प्रकार का है — अपौरुषेय (जो मनुष्य द्वारा रचित न हो) और पौरुषेय। अपौरुषेय शास्त्र को श्रुति कहा जाता है, और श्रुति का अर्थ है वेद।
वेदों के चार भाग बताए गए हैं — संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्। संहिता में मन्त्रों का संग्रह है, जिनमें देवताओं की स्तुतियाँ हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में मन्त्रों की व्याख्या तथा यज्ञ-कर्मों का वर्णन है। आरण्यकों में मन्त्रों का दार्शनिक विवेचन है, और उपनिषदों में गूढ़ तत्त्वों का निरूपण है।
पाठ के अनुसार प्रत्येक वेद के मन्त्रों की प्रकृति भी भिन्न है — ऋग्वेद में ऋचाएँ (छन्दोबद्ध स्तुतियाँ), सामवेद में गेय मन्त्र (गाए जाने वाले), यजुर्वेद में यज्ञकर्म से सम्बद्ध मन्त्र, तथा अथर्ववेद में विविध विषयों से जुड़े मन्त्र हैं।
छह वेदांगों का कार्य
पाठ प्रत्येक वेदांग के कार्य को भी स्पष्ट करता है:
| वेदांग | कार्य |
|---|---|
| शिक्षा | वर्णों की उत्पत्ति, उच्चारण-स्थान और प्रयत्न आदि सिखाना |
| कल्प | यज्ञकर्मों की विधि बताना |
| व्याकरण | शब्दों की साधुता-असाधुता का ज्ञान कराना |
| निरुक्त | शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ स्पष्ट करना |
| छन्द | वैदिक छन्दों का ज्ञान देना |
| ज्योतिष | काल, ग्रह, नक्षत्र आदि का ज्ञान देना |
चित्र विवरण: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — छह वेदांग और उनके कार्य।
धर्मनिष्ठ राजा की कीर्ति
पाठ के अंतिम दो श्लोकों (९ व १०) में यह बताया गया है कि जिस राष्ट्र में लोग अपने-अपने धर्म (कर्तव्य) के पालन में तत्पर रहते हैं, वहाँ उत्तम व्यवस्था बनी रहती है। जो राजा धर्म और नीति दोनों का पालन करता है, वह दीर्घकाल तक कीर्ति प्राप्त करता है — और पाठ के अनुसार जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति बनी रहती है, तब तक वह स्वर्ग में भी स्थान पाता है।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| अधीतविद्यः | जिसने विद्या ग्रहण की हो | One who has attained knowledge |
| अनधीती | जिसने विद्या ग्रहण न की हो | One who has not attained knowledge |
| अर्हति | योग्य होता है | One who deserves, is worthy |
| उपवेदाः | वेद के अनुगामी विद्या | Auxiliary Vedas |
| कलाः | कौशल | Arts, skills |
| गान्धर्वः | संगीतशास्त्र से सम्बद्ध | Musicology |
| जात्या | जन्म से, जाति से | By birth |
| मूकः | जो बोलने में असमर्थ हो, गूँगा | Dumb, mute |
| वाचिकम् | वाणी से सम्बन्धित | Verbal |
| नास्तिकं मतम् | वेद को न मानने वाला मत | Atheist doctrine |
| अलङ्कृतिः | अलंकरण की विद्या | Ornamentation, aesthetics |
| अवसरोक्तिः | अवसर के अनुसार कही गई बात | Appropriate speech |
| देशादिधर्माः | देश के रीति-रिवाज | Local customs and traditions |
| धर्मनीतिपरः | धर्म और नीति का पालन करने वाला | Devoted to righteousness and ethics |
पाठ में "अधीतविद्यः" (बहुव्रीहि), "मीमांसातर्कसांख्यानि" (द्वन्द्व), और "देशादिधर्माः" (षष्ठी-तत्पुरुष) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
छन्द बिंदु — अनुष्टुप् छन्द
पाठ के व्याकरण-प्रकरण "अत्र इदम् अवधेयम्" में इस पाठ में प्रयुक्त छन्द — अनुष्टुप् — का परिचय दिया गया है। अनुष्टुप् छन्द के प्रत्येक श्लोक में चार पाद (चरण) होते हैं, और प्रत्येक पाद में आठ अक्षर होते हैं।
सामान्य नियम
प्रत्येक पाद में छठा अक्षर सदैव गुरु (दीर्घ) होता है और पाँचवाँ अक्षर सदैव लघु (ह्रस्व) होता है। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सातवाँ अक्षर लघु होता है, जबकि प्रथम और तृतीय पादों में सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है। पाठ में इस नियम को महोपनिषद् की प्रसिद्ध उक्ति "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥" के उदाहरण से समझाया गया है।
नियम का अपवाद
पाठ यह भी बताता है कि इस चरण-नियम के कुछ अपवाद भी देखने को मिलते हैं। स्वयं इस पाठ का प्रथम श्लोक "योऽधीतविद्यः सकलः" इस सामान्य नियम का अपवाद है, अर्थात् वहाँ लघु-गुरु का यह नियमित क्रम पूर्णतः नहीं मिलता।
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- पाठ पर आधारित प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्यों में लिखना — जैसे गुरु की योग्यता, वेदांगों और धर्मनिष्ठ राजा से जुड़े प्रश्न
- दो स्तंभों में दिए गए पदों (जैसे ऋक्, गान्धर्व, व्याकरण, अर्थशास्त्र, शुक्रनीति) का उनकी श्रेणियों (वेद, उपवेद, वेदांग, नीतिशास्त्रग्रन्थ आदि) से मेलन करना
- दी गई पंक्तियों में सर्वनाम पदों को पहचानकर रेखांकित करना
- दिए गए पदों (जैसे योऽधीतविद्यः, स चाश्नुते) का सन्धि-विच्छेद करना
- दिए गए विग्रह-वाक्यों (जैसे स्वधर्मे परः, देशादीनां धर्माः) से पाठ में से चुनकर समस्त पद (समास) लिखना
पाठ के साथ "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में सभी दस श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ भी दिया गया है, जो विद्यार्थियों के स्वाध्याय में सहायक है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को विद्यालय के यूट्यूब चैनल हेतु "हमारा वैदिक वाङ्मय" विषय पर एक लघु-चलचित्र की पटकथा लिखने — जिसमें अभिवादन, विषय-परिचय, वेद, उपवेद, वेदांग, शास्त्र और उपसंहार जैसे अंश क्रमशः सम्मिलित हों — तथा ग्रंथालय अथवा अंतर्जाल की सहायता से चौंसठ कलाओं के नाम एकत्र करने का कार्य दिया गया है।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: गुरु बनने के योग्य कौन होता है?
उत्तर: पाठ के अनुसार जिसने समस्त विद्याओं का सम्यक् अध्ययन किया हो, वही सबका गुरु बनने योग्य होता है; केवल जाति के आधार पर कोई गुरु नहीं बन सकता।
प्रश्न 2: विद्या और कला में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर: जो कर्म वाचिक (वाणी-सम्बन्धी) हो और सम्यक् रूप से किया जाए, वह विद्या कहलाता है; जिसे एक मूक व्यक्ति भी करने में समर्थ हो, वह कला कहलाती है।
प्रश्न 3: मुख्य विद्याओं और कलाओं की संख्या कितनी मानी गई है?
उत्तर: मुख्य विद्याओं की संख्या बत्तीस (32) और कलाओं की संख्या चौंसठ (64) मानी गई है, यद्यपि वास्तव में दोनों अनन्त हैं।
प्रश्न 4: चार उपवेद कौन-से हैं?
उत्तर: आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थवेद (स्थापत्यवेद) — ये चार उपवेद हैं।
प्रश्न 5: छह वेदांग कौन-से हैं?
उत्तर: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — ये छह वेदांग हैं।
प्रश्न 6: श्रुति किसे कहते हैं?
उत्तर: पाठ के अनुसार अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा अरचित) शास्त्र को श्रुति कहा जाता है, और श्रुति का अर्थ है वेद।
प्रश्न 7: वेदों के चार भाग कौन-से हैं?
उत्तर: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् — ये वेदों के चार भाग हैं।
प्रश्न 8: निरुक्त वेदांग का क्या कार्य है?
उत्तर: निरुक्त शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ को स्पष्ट करता है।
प्रश्न 9: इस पाठ में किस छन्द का प्रयोग हुआ है?
उत्तर: इस पाठ में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, जिसमें प्रत्येक पाद में छठा अक्षर गुरु और पाँचवाँ अक्षर लघु होता है।
प्रश्न 10: धर्मनीतिपरायण राजा को क्या प्राप्त होता है?
उत्तर: पाठ के अनुसार धर्म और नीति का पालन करने वाला राजा दीर्घकाल तक कीर्ति प्राप्त करता है, और जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति रहती है, तब तक वह स्वर्ग में भी स्थान पाता है।
प्रश्न 11: यह पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?
उत्तर: यह पाठ शुक्राचार्य द्वारा रचित शुक्रनीति ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय के तृतीय प्रकरण से संकलित है।
प्रश्न 12: सामवेद के मन्त्रों की क्या विशेषता बताई गई है?
उत्तर: पाठ के अनुसार सामवेद में गेय मन्त्र हैं, अर्थात् जो गाए जाते हैं।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- सच्चा गुरु वही बन सकता है जिसने समस्त विद्याओं का सम्यक् अध्ययन किया हो; केवल जन्म अथवा जाति से यह अधिकार नहीं मिलता।
- विद्या वाणी से सम्बन्धित बौद्धिक ज्ञान है, जबकि कला व्यावहारिक कौशल है, जिसे मूक व्यक्ति भी कर सकता है।
- प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में वेद, उपवेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास-पुराण आदि मिलाकर बत्तीस प्रमुख विद्याएँ मानी गई हैं।
- अनुष्टुप् छन्द के पाँचवें, छठे और सातवें अक्षरों के लघु-गुरु सम्बन्धी नियम इस पाठ के श्लोकों को समझने के लिए आवश्यक हैं।
- धर्म और नीति का पालन करने वाला शासक ही चिरस्थायी कीर्ति प्राप्त करता है।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था और ज्ञान-वर्गीकरण की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। प्राचीन भारत की पृष्ठभूमि को और गहराई से समझने के लिए विद्यार्थी कक्षा 9 इतिहास का आदि मानव और सभ्यता का आरंभ अध्याय भी देख सकते हैं, जहाँ प्राचीन भारतीय समाज के आरंभिक विकास की चर्चा है।


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