NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 6: Samarthena Krishih Karya | समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के षष्ठ पाठ 'समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें अन्न का महत्त्व, कृषक के गुण, भूमि-परीक्षण की प्राचीन विधियाँ और अन्न के चार प्रकार — चित्रों सहित — शामिल है।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का षष्ठ पाठ "समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया" कृषि के महत्त्व, कृषकों के गुणों और भारतीय कृषि-विज्ञान की प्राचीन परंपरा का परिचय संवाद-शैली में देता है। पाठ में आठ संस्कृत श्लोकों के माध्यम से अन्न के महत्त्व, कृषक की दिनचर्या, तथा भूमि-परीक्षण की प्राचीन वैज्ञानिक विधियों को दर्शाया गया है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
छहों पाठों को एक साथ देखें तो ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक की विषय-विविधता पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है — संविधान, प्राचीन ज्ञान-परंपरा, आयुर्वेद, नारी-शक्ति और बौद्धधर्म के पश्चात् यह षष्ठ पाठ कृषि जैसे व्यावहारिक व जीवनोपयोगी विषय को संस्कृत के माध्यम से प्रस्तुत करता है, जो कक्षा 9 के विद्यार्थियों को भारत की कृषि-प्रधान परंपरा से भी परिचित कराता है।
पाठ का सार — कृषि के महत्त्व पर संवाद
पाठ का आरंभ एक कक्षा-दृश्य से होता है, जिसमें आचार्या विद्यार्थियों (दिनेश, रश्मि, कविता, प्रकाश, विवेक) के साथ कृषि पर चर्चा करती हैं। दिनेश बताता है कि भारतवर्ष प्राचीन काल से ही कृषि-प्रधान राष्ट्र रहा है, और विद्यार्थी इसके महत्त्व को समझना चाहते हैं। रश्मि एक पद्य-पंक्ति ("तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्") का अर्थ पूछती है, जिस पर आचार्या स्पष्ट करती हैं कि कृषि-कर्म से ही अन्न, फल, वनस्पति और दुग्ध आदि सभी वस्तुओं की प्राप्ति होती है, इसीलिए अन्य सभी कार्यों को छोड़कर कृषि करनी चाहिए — क्योंकि इनके बिना जीवन ही सम्भव नहीं है। विद्यार्थी आगे बताते हैं कि किसान पहले भूमि व जल की जाँच करते हैं, फिर उपयुक्त भूमि चुनकर जुताई व बीज-बोवाई करते हैं — यही कृषि-विज्ञान है। आचार्या यह भी बताती हैं कि कृषि विषय पर पराशर जैसे प्राचीन ऋषियों ने गहन विचार किया है, और आचार्य कौटिल्य ने कृषि-विद्या को "वार्ता" नामक विद्या के अंतर्गत सम्मिलित किया है।
अन्न ही जीवन का आधार है
पाठ के आरंभिक श्लोक अन्न के महत्त्व को रेखांकित करते हैं:
"अन्नं प्राणा बलं चान्नमन्नं सर्वार्थसाधनम्। देवासुरमनुष्याश्च सर्वे चान्नोपजीविनः॥"
अर्थात् अन्न ही प्राण है, अन्न ही बल है, और अन्न ही सभी उद्देश्यों को सिद्ध करने वाला है। देव, असुर और मनुष्य — सभी अन्न पर ही जीवन-निर्वाह करते हैं। पाठ आगे बताता है कि अन्न धान्य से उत्पन्न होता है, और धान्य कृषि के बिना संभव नहीं — इसीलिए सब कुछ छोड़कर भी यत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए।
समर्थ व्यक्ति द्वारा कृषि — लोक-कल्याण का मार्ग
पाठ का शीर्षक-श्लोक कृषि की गरिमा को इस प्रकार दर्शाता है:
"समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया। असमर्थो हि कृषको भिक्षां प्राप्नोति मानवः॥"
अर्थात् समर्थ (सक्षम) व्यक्ति द्वारा लोगों के कल्याण की कामना से कृषि की जानी चाहिए, क्योंकि असमर्थ कृषक को ही भिक्षा माँगनी पड़ती है। पाठ आगे यह भी बताता है कि केवल कृषि करने वाला व्यक्ति कभी याचक नहीं बनता — कृषि से जुड़ा व्यक्ति इस लोक में राजा तक बन सकता है, और सोने-चाँदी-रत्नों से सम्पन्न लोग भी भोजन की इच्छा से अंततः कृषक की ही शरण लेते हैं।
कृषक के गुण
पाठ के अनुसार सच्चे कृषक गो-भूमि-देव के प्रति भक्तिभाव रखने वाले, अत्यंत सत्यवादी, परोपकार में निरत, सदैव प्रसन्नचित्त, आलस्य व तन्द्रा से रहित, काम-क्रोध से मुक्त, तथा परस्पर स्नेह व सहयोग की भावना से युक्त होते हैं। ये गुण कृषक को न केवल एक कुशल जीविकोपार्जक, अपितु एक आदर्श सामाजिक व्यक्ति भी बनाते हैं।

चित्र विवरण: सत्य, परोपकार, संतोष, स्नेह और श्रम — पाठ के अनुसार आदर्श कृषक के गुण।
भूमि-परीक्षण की प्राचीन विधि
पाठ के अंतिम श्लोक में भूमि-परीक्षण की प्राचीन वैज्ञानिक विधि का वर्णन है — मिट्टी को सूँघकर, चखकर, कभी-कभी तौलकर, अथवा बर्तन में रखे जल में डालकर एक घटिका (लगभग 24 मिनट) के भीतर उसका परीक्षण किया जाता था। जो व्यक्ति समय की इस अवधि (घटिका) को भली-भाँति जानता था, उसे "घटिकावधिकोविदः" कहा जाता था। पाठ के अनुसार कृषि-कर्म में वही व्यक्ति योग्य माना जाता है जो ऋतु और काल को सम्यक् रूप से जानता हो।

चित्र विवरण: इन्द्रिय-परीक्षण (गंध व स्वाद), भार-परीक्षण और जल-परीक्षण — भूमि की उर्वरता जाँचने की तीन प्राचीन विधियाँ।
कृषि-विज्ञान की भारतीय परंपरा
पाठ के व्याकरण-प्रकरण "अत्र इदम् अवधेयम्" में बताया गया है कि आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में चार विद्याओं का वर्णन किया है, जिनमें से "वार्ता" नामक विद्या के अंतर्गत कृषि-विद्या भी सम्मिलित है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में कृषि-विज्ञान के आधार पर काश्यपीय-कृषि-पद्धति, कृषि-पाराशर, वृक्षायुर्वेद जैसे अनेक ग्रन्थ रचे गए। इन ग्रन्थों में कृषि से जुड़े सूक्ष्म व विशद विषयों पर विचार किया गया है, जो यह दर्शाता है कि भारत में कृषि को केवल एक जीविका नहीं, अपितु एक सुव्यवस्थित शास्त्र के रूप में देखा जाता रहा है।
अन्न के चार प्रकार
काश्यपीय-कृषि-पद्धति ग्रन्थ के अनुसार अन्न चार प्रकार का बताया गया है:
- व्रीह्यादिरूप (धान्य-रूप) — चावल आदि धान्य, जिससे शरीर पुष्ट होता है
- मुद्गमाषादिरूप (द्विदल-रूप) — मूँग-उड़द आदि दालें, जिनसे बल बढ़ता है
- शाकादिरूप — साग-सब्जियाँ, जिनसे स्वास्थ्य की रक्षा होती है
- लताकुसुमादिरूप (फल-पुष्प-रूप) — फल व फूल, जिनसे रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है

चित्र विवरण: धान्य, द्विदल (दालें), शाक और फल-पुष्प — काश्यपीय-कृषि-पद्धति के अनुसार अन्न के चार प्रकार।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| सर्वार्थसाधनम् | सभी उद्देश्यों का साधक | Accomplisher of all goals |
| अन्नोपजीविनः | अन्न से जीवित रहने वाले | Those who sustain on grain |
| धान्यसञ्जातम् | धान्य से उत्पन्न | Produced from grain |
| कृष्यन्वितः | कृषि कर्म से युक्त | Engaged in agriculture |
| परित्यज्य | त्याग करके | Having renounced |
| भूपतिः | राजा | King |
| भक्ततृष्णया | भोजन की इच्छा से | With a desire for food |
| परानुकूल्यनिरताः | परोपकार में निरत | Devoted to benevolence |
| तुष्टचेतसः | प्रसन्न चित्त वाले | Cheerful-minded |
| तन्द्रालस्यादिहीनाः | आलस्य से रहित | Free from laziness |
| स्नेहभाजम् | स्नेह भावना से युक्त | Filled with affection |
| साह्यकर्मरताः | सहयोग की भावना से युक्त | Filled with cooperation |
| आघ्राय | सूँघकर | By smelling |
| तोलयित्वा | तौलकर | By weighing |
| घटिकावधिकोविदः | समय के ज्ञाता | One who knows the passage of time |
पाठ में "सर्वार्थसाधनम्" (षष्ठी-तत्पुरुष), "अन्नोपजीविनः" (उपपद-तत्पुरुष), "तुष्टचेतसः" व "तन्द्रालस्यादिहीनाः" (बहुव्रीहि), और "धान्यसञ्जातम्" (तृतीया-तत्पुरुष) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- पाठ पर आधारित पूर्ण-वाक्य प्रश्नों के उत्तर लिखना — जैसे प्रसन्नचित्त कौन होते हैं, अन्न पर जीवित रहने वाले कौन हैं, कृषि के बिना क्या होता है
- रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करना
- मञ्जूषा से उचित पद चुनकर भावार्थ के रिक्त स्थान भरना
- दिए गए पदों का सन्धि-विच्छेद करना
पाठ के साथ "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में सभी आठों श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ विस्तार से दिया गया है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को किसी कृषक से चर्चा कर मासिक/ऋतु-अनुसार अन्न-फलों की सूची बनाने, भारत के विभिन्न राज्यों में प्रचुर मात्रा में उगाई जाने वाली फसलों के नाम लिखने, अपने गाँव या निकटवर्ती क्षेत्र की फसलों की जानकारी एकत्र करने, तथा छह माह के भीतर किसी वृक्ष का रोपण व संरक्षण करने जैसी गतिविधियों में से कोई तीन कार्य चुनने को कहा गया है।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: भारतवर्ष प्राचीन काल से किस प्रकार का राष्ट्र रहा है?
उत्तर: पाठ के अनुसार भारतवर्ष प्राचीन काल से ही कृषि-प्रधान राष्ट्र रहा है।
प्रश्न 2: अन्न को सर्वार्थसाधन क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि अन्न ही प्राण, बल और सभी उद्देश्यों की सिद्धि का साधन है — देव, असुर और मनुष्य सभी अन्न पर ही जीवन-निर्वाह करते हैं।
प्रश्न 3: असमर्थ कृषक को क्या प्राप्त होता है?
उत्तर: पाठ के अनुसार असमर्थ कृषक को भिक्षा माँगनी पड़ती है, जबकि समर्थ व्यक्ति कृषि से राजा तक बन सकता है।
प्रश्न 4: आदर्श कृषक के क्या गुण बताए गए हैं?
उत्तर: सत्यवादिता, परोपकार में निरति, प्रसन्नचित्तता, आलस्य-रहितता, तथा परस्पर स्नेह व सहयोग की भावना।
प्रश्न 5: भूमि-परीक्षण की कौन-सी विधियाँ पाठ में बताई गई हैं?
उत्तर: मिट्टी को सूँघकर, चखकर, तौलकर, अथवा जल में डालकर एक घटिका के भीतर उसकी परख करना।
प्रश्न 6: "घटिकावधिकोविदः" शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो एक घटिका (लगभग 24 मिनट) की समय-अवधि को भली-भाँति जानता हो।
प्रश्न 7: आचार्य कौटिल्य ने कृषि-विद्या को किस विद्या में सम्मिलित किया है?
उत्तर: आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कृषि-विद्या को "वार्ता" नामक विद्या के अंतर्गत सम्मिलित किया है।
प्रश्न 8: भारतीय कृषि-विज्ञान से जुड़े कौन-से प्राचीन ग्रन्थ बताए गए हैं?
उत्तर: काश्यपीय-कृषि-पद्धति, कृषि-पाराशर, और वृक्षायुर्वेद।
प्रश्न 9: काश्यपीय-कृषि-पद्धति के अनुसार अन्न के कितने प्रकार हैं?
उत्तर: चार प्रकार — व्रीह्यादिरूप (धान्य), मुद्गमाषादिरूप (दालें), शाकादिरूप (सब्जियाँ), और लताकुसुमादिरूप (फल-पुष्प)।
प्रश्न 10: शाकादि-रूप अन्न से क्या लाभ बताया गया है?
उत्तर: शाकादि-रूप अन्न से स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
प्रश्न 11: धनवान लोग भी कृषकों से क्यों प्रार्थना करते हैं?
उत्तर: पाठ के अनुसार सोने-चाँदी-रत्नों से सम्पन्न लोग भी भोजन की इच्छा (भक्ततृष्णा) से कृषकों की ही शरण लेते हैं।
प्रश्न 12: कृषि-कर्म में कौन व्यक्ति योग्य माना जाता है?
उत्तर: पाठ के अनुसार वही व्यक्ति कृषि-कर्म में योग्य माना जाता है जो ऋतु और काल को सम्यक् रूप से जानता हो।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- अन्न ही जीवन का आधार है, और अन्न की प्राप्ति कृषि के बिना संभव नहीं।
- कृषि लोक-कल्याण का मार्ग है, और एक सच्चा कृषक कभी याचक नहीं बनता।
- सत्यवादिता, परोपकार, संतोष और स्नेह — ये गुण आदर्श कृषक की पहचान हैं।
- भारतीय ज्ञान-परंपरा में कृषि को एक सुव्यवस्थित शास्त्र के रूप में विकसित किया गया, जिसमें भूमि-परीक्षण जैसी वैज्ञानिक विधियाँ भी सम्मिलित थीं।
- अन्न के चार प्रकार — धान्य, दालें, सब्जियाँ और फल-पुष्प — मिलकर संतुलित आहार का आधार बनाते हैं।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ कृषि के महत्त्व और भारत की कृषि-वैज्ञानिक परंपरा की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। कक्षा 9 के अन्य विषयों की व्याख्या के लिए विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 भी देख सकते हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से जुड़ी बुनियादी अवधारणाएँ समझाई गई हैं।
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