NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 8: Yaksha Yudhishthira Samvada | यक्ष-युधिष्ठिरसंवादः व्याख्या
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के अष्टम पाठ 'यक्ष-युधिष्ठिरसंवादः' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें महाभारत का यक्षप्रश्न, मित्रता व मृत्यु संबंधी प्रश्न, आठ गुण, तथा सुख-आश्चर्य-मार्ग के गूढ़ प्रश्नोत्तर — चित्रों सहित — शामिल हैं।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9) का अष्टम पाठ "यक्ष-युधिष्ठिरसंवादः" महाभारत के वनपर्व से लिया गया एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है, जिसे परंपरागत रूप से "यक्षप्रश्न" के नाम से जाना जाता है। इस संवाद में एक यक्ष युधिष्ठिर से मित्रता, जीवन-मृत्यु, तप, ज्ञान, धर्म और सुख जैसे गहन विषयों पर प्रश्न पूछता है, और युधिष्ठिर के सारगर्भित उत्तर प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करते हैं। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
आठों पाठों को एक साथ देखें तो ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक की विषय-विविधता पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है — संविधान, प्राचीन ज्ञान-परंपरा, आयुर्वेद, नारी-शक्ति, बौद्धधर्म, कृषि और राजशासन के पश्चात् यह अष्टम पाठ महाभारत के सबसे गहन दार्शनिक प्रसंगों में से एक को संस्कृत के माध्यम से प्रस्तुत करता है, जो कक्षा 9 के विद्यार्थियों को भारतीय महाकाव्य-परंपरा से भी परिचित कराता है।
पाठ का सार — व्यासदेव की मूर्ति और महाभारत की चर्चा
पाठ का आरंभ राष्ट्रिय-शैक्षिक-अनुसन्धान-प्रशिक्षण-परिषद् (NCERT) के परिसर में भ्रमण करते हुए विद्यार्थियों (नवनीता, मधुमिता, शक्तिकुमार, विजय) के एक मूर्ति देखने के दृश्य से होता है। मूर्ति के नीचे लिखे नाम से पता चलता है कि यह महर्षि व्यासदेव — अर्थात् कृष्णद्वैपायन वेदव्यास — की प्रतिमा है, जिन्होंने अठारह पुराणों तथा महाभारत की रचना की। विद्यार्थियों के बीच चर्चा के दौरान ही अध्यापक वहाँ आते हैं और बताते हैं कि वे आज महाभारत ग्रन्थ से एक प्रश्नोत्तर-आधारित संवाद सुनाएँगे, जिसमें आज के समाज के लिए भारतीय ज्ञान-परंपरा का सुंदर मार्गदर्शन विद्यमान है।
यक्ष-प्रश्न की पृष्ठभूमि — द्वैतवन की कथा
पाठ के "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में इस संवाद की पृष्ठभूमि दी गई है। अज्ञातवास के समय पाण्डव द्वैतवन में भ्रमण करते हुए प्यास से व्याकुल होकर एक वटवृक्ष की छाया में बैठे थे। युधिष्ठिर ने पहले नकुल को जल लाने भेजा। नकुल को पास ही एक सुंदर सरोवर दिखा, परन्तु जल पीने से पहले एक अशरीरी वाणी ने उसे चेतावनी दी कि पहले उसके प्रश्नों के उचित उत्तर देकर ही जल पिया जाए। नकुल ने इस चेतावनी की उपेक्षा कर जल पी लिया और मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़ा। इसी प्रकार सहदेव, अर्जुन और भीम को भी बारी-बारी से भेजा गया, परन्तु कोई भी वापस नहीं लौटा। अंततः युधिष्ठिर स्वयं वहाँ पहुँचे और अपने मूर्च्छित भाइयों को देखकर अत्यंत दुःखी हुए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष है, जो पहले अपने प्रश्नों का उत्तर चाहता है, तभी जल पीने की अनुमति मिलेगी। युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए, जिससे उनके भाई पुनः चेतन हो गए।
मित्रता और "मृत्यु" संबंधी प्रश्न
यक्ष प्रश्न करता है कि प्रवासी, गृहस्थ, रोगी और मरणासन्न व्यक्ति का मित्र कौन होता है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं:
"विद्या प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः। आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः॥"
अर्थात् विद्या प्रवासी की मित्र है, पत्नी गृहस्थ की मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है, और दान मरणासन्न व्यक्ति का मित्र है। इसके पश्चात् यक्ष पूछता है कि पुरुष, राष्ट्र, श्राद्ध और यज्ञ कब "मृत" कहलाते हैं। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं:
"मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम्। मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः॥"
अर्थात् दरिद्र पुरुष "मृत" है, राजा-रहित राष्ट्र "मृत" है, वेद-ज्ञान से रहित ब्राह्मण द्वारा किया गया श्राद्ध "मृत" है, और दक्षिणा के बिना किया गया यज्ञ भी "मृत" ही माना जाता है — अर्थात् इन सबका होना न होने के समान है।

चित्र विवरण: दरिद्र पुरुष, अराजक राष्ट्र, अश्रोत्रिय द्वारा किया श्राद्ध, और अदक्षिण यज्ञ — यक्ष के अनुसार चार "मृत" अवस्थाएँ।
आठ गुणों की परिभाषाएँ — तप, दम, क्षमा, ह्री, ज्ञान, शम, दया और आर्जव
यक्ष आगे आठ महत्त्वपूर्ण गुणों के लक्षण पूछता है, जिनके उत्तर में युधिष्ठिर कहते हैं:
"तपः स्वधर्मवर्त्तित्वं मनसो दमनं दमः। क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं ह्रीरकार्यनिवर्त्तनम्॥"
"ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता। दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता॥"
इन दोनों श्लोकों में युधिष्ठिर इन आठ गुणों को इस प्रकार परिभाषित करते हैं — तप अर्थात् अपने धर्म (कर्तव्य) पर टिके रहना; दम अर्थात् मन का नियंत्रण; क्षमा अर्थात् सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों को सहन करना; ह्री (लज्जा) अर्थात् बुरे कार्यों से दूर रहना; ज्ञान अर्थात् वास्तविक सत्य का बोध; शम अर्थात् मन की शांति; दया अर्थात् सभी के सुख की कामना करना; और आर्जव (सरलता) अर्थात् सभी के प्रति समान भाव रखना।

चित्र विवरण: तप, दम, क्षमा, ह्री, ज्ञान, शम, दया और आर्जव — युधिष्ठिर द्वारा परिभाषित आठ गुण, राजा के आदर्श चरित्र के केंद्र में।
शत्रु, व्याधि, साधु और असाधु की पहचान
यक्ष पूछता है कि मनुष्यों का सबसे बड़ा शत्रु और सबसे भयंकर रोग क्या है, तथा साधु और असाधु व्यक्ति की पहचान क्या है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं:
"क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः। सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः॥"
अर्थात् क्रोध वह शत्रु है जिसे जीतना अत्यंत कठिन है, लोभ ही वह व्याधि है जिसका कोई अंत नहीं, जो सभी प्राणियों का हित चाहता है वही साधु है, और जो निर्दयी है वही असाधु कहलाता है। इसी क्रम में यक्ष पण्डित, नास्तिक, मूर्ख, काम और मत्सर के विषय में भी पूछता है, जिनके उत्तर में युधिष्ठिर बताते हैं कि धर्म को जानने वाला ही पण्डित है, नास्तिक ही मूर्ख कहलाता है, काम (इच्छा) संसार का कारण है, और मत्सर (ईर्ष्या) हृदय का संताप है।
यक्ष के चार अंतिम प्रश्न — सुख, आश्चर्य, मार्ग और सत्य-समाचार
संवाद के अंत में यक्ष चार अत्यंत गहन प्रश्न पूछता है — कौन सुखी है, संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, सच्चा मार्ग क्या है, और संसार का सत्य-समाचार क्या है — और कहता है कि इन चार प्रश्नों का उचित उत्तर देने पर ही युधिष्ठिर के मृत भाई पुनः जीवित होंगे। युधिष्ठिर का पहला उत्तर है:
"पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति यो गृहे। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥"
अर्थात् जो व्यक्ति सादगी से घर में भोजन बनाता है, जो ऋण-मुक्त है, और जो विदेश में नहीं रहता — वही वास्तव में सुखी है। संसार के सबसे बड़े आश्चर्य के विषय में युधिष्ठिर कहते हैं:
"अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। शेषा जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥"
अर्थात् प्रतिदिन प्राणी यमराज के घर (मृत्यु) की ओर जाते हैं, फिर भी शेष बचे लोग सदा जीवित रहने की इच्छा रखते हैं — इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है? सच्चे मार्ग के विषय में युधिष्ठिर का उत्तर संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक उद्धृत श्लोकों में से एक है:
"तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥"
अर्थात् तर्क अस्थिर है, शास्त्र-वचन परस्पर भिन्न हैं, ऐसा कोई एक मुनि नहीं जिसका मत ही अंतिम प्रमाण हो; धर्म का तत्त्व गुफा में छिपा है (अर्थात् अत्यंत सूक्ष्म व दुर्बोध है) — अतः जिस मार्ग पर महापुरुष चले हैं, वही सच्चा मार्ग है। अंतिम प्रश्न — संसार का सत्य-समाचार — के उत्तर में युधिष्ठिर कहते हैं:
"पृथ्वी विभाण्डं गगनं पिधानं सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन। मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्त्ता॥"
अर्थात् पृथ्वी एक बड़ा पात्र है, आकाश उसका ढक्कन है, सूर्य रूपी अग्नि से, दिन-रात रूपी ईंधन से, तथा महीनों-ऋतुओं रूपी करछी से हिलाकर, काल (समय) समस्त प्राणियों को पकाता है — यही संसार का सच्चा समाचार है। युधिष्ठिर द्वारा इन सभी प्रश्नों के सही उत्तर देने पर यक्ष ने उनके मृत भाइयों को पुनः जीवित कर दिया।

चित्र विवरण: सुख, आश्चर्य, मार्ग और सत्य-समाचार — यक्ष के चार अंतिम प्रश्न, जिनके उत्तर से पाण्डव पुनः जीवित हुए।
महाभारत और अष्टादश पर्व
पाठ के "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में महाभारत ग्रन्थ का परिचय भी दिया गया है। पुराणमुनि व्यासदेव द्वारा रचित महाभारत में भारतीय संस्कृति-सभ्यता-परम्पराओं का महनीय चित्र सारस्वत-सृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कौरव-पाण्डवों का चरित्र इस ग्रन्थ का मुख्य आधार है, तथा विश्वजनीन ग्रन्थ "श्रीमद्भगवद्गीता" भी महाभारत के अंतर्गत ही आता है। पाठ में महाभारत के अठारह पर्वों (अष्टादशपर्वाणि) के नाम भी एक स्मरण-सहायक श्लोक के माध्यम से दिए गए हैं — आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रास्थानिक, और स्वर्गारोहण पर्व।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| प्रवसतो | प्रवास में रहने वाले का | One who lives abroad |
| आतुरस्य | बीमार व्यक्ति का | Of a sick person |
| भिषक् | वैद्य | Doctor, physician |
| अराजकम् | राजा-रहित, अव्यवस्थित | Kingless state, anarchy |
| अश्रोत्रियम् | वेद-ज्ञान से रहित | Ignorant of the Vedas |
| दमः | मन और इन्द्रियों का नियंत्रण | Restraint |
| द्वन्द्वसहिष्णुत्वम् | सुख-दुःख जैसे युगल को सहना | Tolerance of dualities |
| ह्रीः | लज्जा, लोकलाज | Modesty |
| तत्त्वार्थबोधः | वास्तविक सत्य का ज्ञान | Knowledge of the ultimate truth |
| सर्वसुखैषित्वम् | सभी के सुख की चाह रखना | Wishing for everyone's happiness |
| अनन्तकः | जिसका कोई अंत न हो | Endless |
| सर्वभूतहितः | सभी प्राणियों का भला चाहने वाला | Compassionate for all beings |
| मत्सरः | ईर्ष्या | Jealousy |
| यमालयम् | यमराज के घर को | The abode of Yama |
| श्रुतयः | वेद के वाक्य | Vedic scriptures |
| महाजनः | श्रेष्ठ पुरुष | Great men |
पाठ में "अराजकम्" व "अश्रोत्रियम्" (बहुव्रीहि), "स्वधर्मवर्त्तितम्" (तत्पुरुष), और "अनन्तकः" (नञ्-तत्पुरुष) जैसे विविध समासों के उदाहरण भी दिए गए हैं, जो कक्षा 9 के समास-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- पाठ पर आधारित पूर्ण-वाक्य प्रश्नों के उत्तर लिखना — जैसे विद्या किसकी मित्र है, तप का लक्षण क्या है, तथा भूत कहाँ जाते हैं जैसे प्रश्न
- रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करना
- दिए गए श्लोक ("क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुः...") को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखना
- दिए गए पदों का सन्धि-विच्छेद करना
- विग्रह-वाक्यों से पाठ में से समस्त पद (समास) चुनना
पाठ के साथ "अत्र इदम् अवधेयम्" खंड में सभी सत्रह श्लोकों का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ विस्तार से दिया गया है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में विद्यार्थियों को विद्या, समाज के आदरणीय जन, लोभ, संसार के आकर्षक विषय, या भारत में ऋतु-परिवर्तन जैसे विषयों पर अनुच्छेद लिखने, समूहों में इस संवाद का भूमिका-अभिनय करने, महर्षि व्यासदेव पर प्रस्तुति तैयार करने, तथा पाठ से जुड़े प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखने जैसी गतिविधियाँ दी गई हैं।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: यह संवाद महाभारत के किस पर्व से लिया गया है?
उत्तर: यह संवाद महाभारत के वनपर्व, अध्याय 313 से लिया गया है।
प्रश्न 2: युधिष्ठिर के अनुसार गृहस्थ और रोगी का मित्र कौन होता है?
उत्तर: गृहस्थ का मित्र पत्नी (भार्या) होती है, और रोगी का मित्र वैद्य (भिषक्) होता है।
प्रश्न 3: किन चार वस्तुओं को "मृत" कहा गया है?
उत्तर: दरिद्र पुरुष, राजा-रहित राष्ट्र, अश्रोत्रिय द्वारा किया गया श्राद्ध, और दक्षिणा-रहित यज्ञ — इन्हें "मृत" कहा गया है।
प्रश्न 4: तप और दम की परिभाषा युधिष्ठिर के अनुसार क्या है?
उत्तर: तप अपने धर्म पर टिके रहना है, और दम मन का नियंत्रण/दमन है।
प्रश्न 5: मनुष्यों का सबसे कठिन शत्रु और सबसे भयंकर व्याधि क्या बताई गई है?
उत्तर: क्रोध सबसे कठिन शत्रु है, और लोभ सबसे भयंकर (अनंत) व्याधि है।
प्रश्न 6: वास्तव में सुखी व्यक्ति कौन है, युधिष्ठिर के अनुसार?
उत्तर: जो व्यक्ति सादगी से भोजन बनाता है, ऋण-मुक्त है, और विदेश में नहीं रहता — वही वास्तव में सुखी है।
प्रश्न 7: संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या बताया गया है?
उत्तर: प्रतिदिन प्राणी मृत्यु की ओर जाते हैं, फिर भी शेष बचे लोग सदा जीवित रहने की इच्छा रखते हैं — यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।
प्रश्न 8: सच्चे मार्ग की पहचान युधिष्ठिर किस प्रकार बताते हैं?
उत्तर: तर्क अस्थिर है और शास्त्र-वचन भिन्न-भिन्न हैं, अतः जिस मार्ग पर महापुरुष चले हैं, वही सच्चा मार्ग है।
प्रश्न 9: संसार के सत्य-समाचार के रूप में युधिष्ठिर काल (समय) को कैसे वर्णित करते हैं?
उत्तर: पृथ्वी एक पात्र है, आकाश उसका ढक्कन है, और सूर्य की अग्नि से, दिन-रात के ईंधन से, तथा ऋतुओं की करछी से काल सभी प्राणियों को पकाता है।
प्रश्न 10: महाभारत की रचना किसने की और उसमें क्या समाहित है?
उत्तर: महाभारत की रचना महर्षि व्यासदेव ने की, और इसमें श्रीमद्भगवद्गीता भी समाहित है।
प्रश्न 11: महाभारत में कुल कितने पर्व हैं?
उत्तर: महाभारत में कुल अठारह (अष्टादश) पर्व हैं।
प्रश्न 12: यक्ष ने अंततः युधिष्ठिर के भाइयों को क्यों जीवित किया?
उत्तर: युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के सभी प्रश्नों — विशेषकर चार अंतिम गूढ़ प्रश्नों — के सटीक उत्तर देने पर प्रसन्न होकर यक्ष ने उनके मृत भाइयों को पुनः जीवित कर दिया।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- विद्या, पत्नी, वैद्य और दान — प्रत्येक परिस्थिति में एक अलग सच्चा मित्र होता है।
- क्रोध सबसे बड़ा शत्रु है और लोभ सबसे भयंकर व्याधि — इन दोनों पर विजय ही सच्चे जीवन की कुंजी है।
- तप, दम, क्षमा, ह्री, ज्ञान, शम, दया और आर्जव — ये आठ गुण किसी भी व्यक्ति के आदर्श चरित्र की नींव बनाते हैं।
- प्रतिदिन मृत्यु को देखते हुए भी अमरता की आशा रखना — यही मानव-जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास व आश्चर्य है।
- जब तर्क और शास्त्र अनिश्चित हों, तब महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग ही सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक होता है।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ महाभारत के गहन दार्शनिक चिंतन और जीवन-मूल्यों की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। कक्षा 9 के अन्य विषयों की व्याख्या के लिए विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 भी देख सकते हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से जुड़ी बुनियादी अवधारणाएँ समझाई गई हैं।
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