NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 9: Yadrisham Annam Tadrisham Manah | यादृशम् अन्नं तादृशं मनः व्याख्या
NCERT कक्षा 9 की संस्कृत पुस्तक ऋषिकुल्या के नवम पाठ 'यादृशम् अन्नं तादृशं मनः' की विस्तृत हिंदी व्याख्या, जिसमें आरुणि-श्वेतकेतु संवाद, मनः-प्राण-वाक् की उत्पत्ति, घृतोत्पत्ति की उपमा और त्रिविध आहार-गुण — चित्रों सहित — शामिल हैं।
NCERT की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ऋषिकुल्या (कक्षा 9), जो सीबीएसई त्रि-भाषा नीति के अंतर्गत नई R2 पुस्तक-शृंखला का भाग है, का नवम पाठ "यादृशम् अन्नं तादृशं मनः" छान्दोग्योपनिषद् के षष्ठाध्याय के पञ्चमखण्ड से संकलित है। यह पाठ ऋषि आरुणि (उद्दालक आरुणि) और उनके पुत्र श्वेतकेतु के मध्य हुए संवाद के माध्यम से मन, प्राण और वाक् — इन तीनों के मूल स्वरूप को समझाता है। यह लेख कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए पाठ की विषयवस्तु, संस्कृत शब्दावली और अभ्यासों की विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक के पूर्ववर्ती पाठों में संविधान, गुरु-शिष्य ज्ञान-परंपरा, आयुर्वेद, नारी-शक्ति, बौद्धधर्म और कृषि जैसे विविध विषय समाहित रहे हैं। इसी विषय-वैविध्य की कड़ी में यह नवम पाठ भारतीय दर्शन के एक गूढ़ किन्तु अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न — मन और अन्न के सम्बन्ध — को उपनिषद् की संवाद-शैली में प्रस्तुत करता है।
पाठ का सार — आरुणि-श्वेतकेतु संवाद
पाठ का आरंभ श्वेतकेतु द्वारा अपने पिता एवं गुरु आरुणि को प्रणाम करने से होता है। श्वेतकेतु निवेदन करता है कि वह कुछ जिज्ञासाएँ पूछना चाहता है, और आरुणि उसे अनुमति देते हैं। इसके पश्चात् श्वेतकेतु क्रमशः तीन प्रश्न पूछता है — मनः क्या है, प्राणः क्या है, और वाक् क्या है। आरुणि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पहले संक्षेप में देते हैं, और श्वेतकेतु के पुनः-पुनः अनुरोध करने पर विस्तार से समझाते हैं।
आरुणि के अनुसार खाए गए अन्न का जो सबसे सूक्ष्म (अणिष्ठ) भाग होता है, वही मनः है। पीये गए जल का जो सूक्ष्मतम भाग होता है, वही प्राणः है। और खाए गए तेजस् (तेजयुक्त पदार्थ) का जो सूक्ष्मतम भाग होता है, वही वाक् है। इस प्रकार आरुणि संवाद के माध्यम से मनः, प्राणः और वाक् — तीनों का मूल स्रोत स्पष्ट करते हैं।
मनः अन्नमयम् — अन्न और मन का सम्बन्ध
पाठ के अनुसार मनः अन्नमयम् है, अर्थात् मन अन्न से बना है। आरुणि श्वेतकेतु से कहते हैं — "अशितस्यान्नस्य यद् अणिष्ठं तन्मनः", अर्थात् खाए गए अन्न का जो सबसे सूक्ष्म भाग होता है, वही मन बनता है। इसी क्रम में वे आगे बताते हैं कि पीये गए जल का सूक्ष्मतम भाग प्राण कहलाता है, और खाए गए तेजस् का सूक्ष्मतम भाग वाक् बन जाता है। पाठ में यह सम्पूर्ण सिद्धान्त एक ही वाक्य में संक्षेपतः दिया गया है — "मनः अन्नमयं, प्राणः आपोमयः, वाक् च तेजोमयी भवति इत्यप्यवधार्यम्।"

चित्र विवरण: अन्न से मनः, जल से प्राणः और तेजस् (घृत) से वाक् की उत्पत्ति — प्रत्येक का सूक्ष्मतम अंश ही परिणाम बनता है।
दधि से घृत — सूक्ष्मतम अंश की उपमा
जब श्वेतकेतु आरुणि से इस सिद्धान्त को और स्पष्ट करने का अनुरोध करता है, तब आरुणि दधि (दही) मथने के दृष्टान्त से समझाते हैं। मथे जा रहे दही का जो सूक्ष्मतम (अणिमा) भाग होता है, वही ऊपर उठता है और सर्पिः (घी) के रूप में प्रकट होता है। ठीक इसी प्रकार खाए जा रहे अन्न का सूक्ष्मतम भाग ऊपर उठकर मन बनता है, पीये जा रहे जल का सूक्ष्मतम भाग प्राण बनता है, और खाए जा रहे तेजस् का सूक्ष्मतम भाग वाक् बनता है।

चित्र विवरण: दही मथने पर ऊपर उठने वाला सूक्ष्मतम अंश ही घी बनता है — उपनिषद् की इस उपमा से आरुणि श्वेतकेतु को सिद्धान्त समझाते हैं।
संवाद के अन्त में आरुणि श्वेतकेतु से कहते हैं — "एतत्सर्वं हृदयेन अवधारय" (यह सब हृदय से समझ लो)। श्वेतकेतु सहमति दर्शाते हुए प्रणाम करता है, और आरुणि उसे आशीर्वाद देते हुए पाठ का समापन करते हैं — "तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु" (हम दोनों का यह अध्ययन तेजस्वी हो)।
उपनिषद् का मूल सन्देश — जैसा अन्न, वैसा मन
पाठ की स्वाध्याय-सामग्री में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य जैसा अन्नादि ग्रहण करता है, उसका चित्त (मन) भी वैसा ही बनता है — "यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवस्तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति"। यही इस सम्पूर्ण पाठ का सार-वाक्य है, जो पाठ के शीर्षक में भी प्रतिबिम्बित होता है। स्वाध्याय-सामग्री एक चरण आगे भी जोड़ती है — "यादृशं मनः तादृशं जीवनम्", अर्थात् जैसा मन होगा वैसा ही जीवन भी बनेगा।
आयुर्वेद में अन्न का महत्त्व
पाठ की स्वाध्याय-सामग्री में आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी अन्न के महत्त्व को दर्शाया गया है। आयुर्वेद में कहा गया है — "आहारसम्भवं वस्तु रोगाश्चाहारसम्भवाः", अर्थात् शरीर का पोषण आहार से ही होता है, और अधिकांश रोगों का मूल कारण भी अनुचित आहार ही है। इसी सन्दर्भ में हितकर, मित (संतुलित मात्रा में) और शुद्ध आहार को स्वास्थ्य का मूलाधार माना गया है, जिसे संक्षेप में "हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक्" कहा गया है। यह दृष्टिकोण ऋषिकुल्या के तीसरे पाठ वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा में वर्णित वैद्य-धर्म की भावना से भी जुड़ता है, जहाँ उपचार और आहार के परस्पर सम्बन्ध की चर्चा है।
त्रिविध आहार-गुण
भारतीय दर्शन में आहार को तीन गुणों में विभाजित किया गया है — सात्त्विक, राजस और तामस। फल, दुग्ध, शाक और धान्य जैसे सात्त्विक आहार मन में शुद्धि, शान्ति और एकाग्रता उत्पन्न करते हैं। अत्यधिक तीखा, खट्टा अथवा नमकीन राजस आहार चञ्चलता, उद्वेग और क्रोध को बढ़ाता है। तथा आमिष, बासी (पर्युषित) अथवा दूषित तामस आहार आलस्य, प्रमाद और जड़ता को जन्म देता है। पाठ इस प्रकार यह दर्शाता है कि उपनिषद् की प्राचीन शिक्षा का समर्थन आयुर्वेद और आधुनिक पोषण-विज्ञान — दोनों से होता है, क्योंकि सन्तुलित पौष्टिक भोजन मस्तिष्क की कार्यक्षमता, स्मरणशक्ति और एकाग्रता को भी बढ़ाता है।

चित्र विवरण: सात्त्विक, राजस और तामस — तीनों प्रकार के आहार के उदाहरण एवं मन पर उनका प्रभाव।
पाठ की महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दावली
पाठ के साथ दी गई शब्दावली-सूची "सर्वं शब्देन भासते" में इस पाठ से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द समझाए गए हैं। कुछ प्रमुख शब्द नीचे दिए गए हैं:
| संस्कृत शब्द | अर्थ (हिंदी) | Meaning (English) |
|---|---|---|
| यादृशम् | जैसा | One like this |
| तादृशम् | वैसा | That type |
| अशितस्य | खाए हुए का | Of what is eaten |
| अणिष्ठः | अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वाधिक लघु | Smallest, subtlest |
| अन्नमयम् | अन्न से निर्मित | Made of food |
| आपोमयः | जल में परिणत, जल से बना | Made of water |
| तेजोमयः | अग्नि का परिणामभूत | Made of fire/energy |
| सर्पिः | घृतम्, आज्यम् (घी) | Clarified butter |
| समुदीषति | उत्पन्न होता है, ऊपर उठता है | Arises, rises up |
| घृतोत्पत्तिरहस्यम् | घी उत्पादन का रहस्य या क्रम | The secret of ghee-production |
| अवधार्यम् | समझना चाहिए | To be understood |
| गुरुसेवनपटुः | गुरु-सेवा में दक्ष | Skilled in serving the teacher |
| वाङ्मनःप्राणानाम् (इतरेतरयोगद्वन्द्वः) | वाणी, मन और प्राण — इन तीनों का | Of speech, mind and vital force |
| सम्यगवगतम् (जश्त्वसन्धिः) | ठीक से समझा | Properly understood |
पाठ में "वाङ्मनःप्राणानाम्" (इतरेतरयोगद्वन्द्व-षष्ठीतत्पुरुष) और "आरुणि-श्वेतकेत्वोः" (द्वन्द्व) जैसे समासों के उदाहरण भी मिलते हैं, साथ ही "सम्यगवगतम्" और "मदुपदेशसारः" जैसे जश्त्वसन्धि के उदाहरण भी दिए गए हैं — जो कक्षा 9 के समास एवं सन्धि-प्रकरण के अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
व्याकरण बिंदु — तुमुन् प्रत्यय
पाठ के व्याकरण-अभ्यास में तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग सिखाया गया है। यह प्रत्यय धातु में जुड़कर क्रिया के साथ "करने के लिए" जैसा इच्छा या उद्देश्य का भाव जोड़ता है — जैसे पाठ में ही दिया गया उदाहरण "प्रच्छ् + तुमुन् = प्रष्टुम्" (पूछने के लिए)। कुछ अन्य उदाहरण देखें:
| धातु + तुमुन् | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| श्रु + तुमुन् | श्रोतुम् | सुनने के लिए |
| वन्द् + तुमुन् | वन्दितुम् | प्रणाम करने के लिए |
| पठ् + तुमुन् | पठितुम् | पढ़ने के लिए |
| कृ + तुमुन् | कर्तुम् | करने के लिए |
| वि + ज्ञा + तुमुन् | विज्ञातुम् | जानने के लिए |
| वि + आ + ख्या + तुमुन् | व्याख्यातुम् | व्याख्या करने के लिए |
अभ्यास और गतिविधियाँ
पाठ के अंत में "अभ्यासाद् जायते सिद्धिः" शीर्षक के अंतर्गत पठन-बोध, व्याकरण और शब्द-ज्ञान से जुड़े कई प्रकार के अभ्यास दिए गए हैं:
- पाठ पर आधारित प्रश्नों के उत्तर एक पद अथवा पूर्ण वाक्य में लिखना
- दो स्तंभों के पदों का मेलन करना (जैसे मनः-अन्नमयम्, प्राणः-आपोमयः, वाक्-तेजोमयी)
- दिए गए पदों के विलोम पद लिखना
- चयनित धातुओं में तुमुन् प्रत्यय जोड़कर पद-निर्माण करना, तथा निर्देशित लकार में रिक्तस्थान भरना
इसके साथ ही "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" खंड में छान्दोग्योपनिषद् का संक्षिप्त परिचय, आरुणि-श्वेतकेतु का पृष्ठभूमि-परिचय, इस पाठ की वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक दृष्टि, गुरु-शिष्य परम्परा का महत्त्व तथा आधुनिक जीवन के लिए सन्देश दिया गया है। "यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्" खंड में समूहचर्चा (स्वस्थ आहार का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव), आरुणि-श्वेतकेतु संवाद की भूमिकाभिनय, तथा पाँच मिनट की योग-ध्यानक्रिया के पश्चात् मन की स्थिति पर चर्चा जैसी गतिविधियाँ दी गई हैं। "परियोजनाकार्यम्" खंड में विद्यार्थियों को स्वस्थ जीवनशैली एवं आहार-विषयक गूगल-सर्वेक्षण तैयार करने, तथा "पौष्टिक-आहार: स्वस्थं मनः" विषय पर 5–6 स्लाइडयुक्त प्रस्तुति बनाने का कार्य भी सौंपा गया है। ऋषिकुल्या पाठ्यपुस्तक के अन्य सभी पाठ इस पेज पर क्रमशः उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के विभिन्न भागों पर आधारित कुछ प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
प्रश्न 1: मनः अन्न का कैसा भाग है?
उत्तर: पाठ के अनुसार खाए गए अन्न का जो सबसे सूक्ष्म (अणिष्ठ) भाग होता है, वही मनः है।
प्रश्न 2: मथे जा रहे दही का सूक्ष्मतम भाग क्या बन जाता है?
उत्तर: मथे जा रहे दही का जो सूक्ष्मतम (अणिमा) भाग होता है, वह ऊपर उठकर सर्पिः अर्थात् घी बन जाता है।
प्रश्न 3: मनः किस प्रकार का बताया गया है?
उत्तर: पाठ के अनुसार मनः अन्नमयम् है, अर्थात् मन अन्न से निर्मित है।
प्रश्न 4: तेजोमयी किसे कहा गया है?
उत्तर: पाठ के अनुसार वाक् (वाणी) को तेजोमयी कहा गया है, क्योंकि वह तेजस् के सूक्ष्मतम भाग से बनती है।
प्रश्न 5: इस पाठ में आरुणि किसे उपदेश देते हैं?
उत्तर: इस पाठ में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को उपदेश देते हैं।
प्रश्न 6: "वत्स! चिरञ्जीव" यह किसने कहा है?
उत्तर: यह वचन आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा है, जब श्वेतकेतु उन्हें प्रणाम करता है।
प्रश्न 7: यह पाठ किस उपनिषद् से संगृहीत है?
उत्तर: यह पाठ छान्दोग्योपनिषद् से संगृहीत है।
प्रश्न 8: श्वेतकेतु सर्वप्रथम आरुणि से किसके स्वरूप के विषय में पूछता है?
उत्तर: श्वेतकेतु सर्वप्रथम आरुणि से मनः के स्वरूप के विषय में पूछता है।
प्रश्न 9: आरुणि प्राण के स्वरूप का निरूपण किस प्रकार करते हैं?
उत्तर: आरुणि बताते हैं कि पीये गए जल का जो सबसे सूक्ष्म भाग होता है, वही प्राण है — "पीतानाम् अपां योऽणिष्ठं स प्राणः"।
प्रश्न 10: मानवों के चित्त कैसे होते हैं, पाठ के अनुसार?
उत्तर: पाठ के अनुसार मनुष्य जैसा अन्नादि ग्रहण करता है, उसका चित्त भी वैसा ही होता है — "यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवस्तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति"।
प्रश्न 11: सर्पिः क्या होता है?
उत्तर: सर्पिः घृत अथवा आज्य अर्थात् घी को कहते हैं, जो मथे गए दही के सूक्ष्मतम भाग से प्राप्त होता है।
प्रश्न 12: आरुणि के मतानुसार मनः कैसा होता है?
उत्तर: आरुणि के मतानुसार मनः अन्नमयम् होता है, अर्थात् वह अन्न के सूक्ष्मतम भाग से बना होता है।
पाठ से मुख्य सीख
इस पाठ से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित मुख्य बातें उभर कर आती हैं:
- मन अन्न से बना है — भोजन जैसा होगा, मन भी उतना ही उसके अनुरूप बनेगा।
- प्राण जल का सूक्ष्मतम अंश है, और वाक् तेज अथवा अग्नि के सूक्ष्मतम अंश से बनती है।
- दही मथने पर ऊपर उठने वाला सूक्ष्मतम भाग घी बनता है — यही सरल उपमा उपनिषद् की गूढ़ शिक्षा को समझने में सहायक बनती है।
- गुरु-शिष्य संवाद तथा बार-बार प्रश्न पूछने की जिज्ञासा प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति का आधार थी।
- सात्त्विक एवं संतुलित आहार केवल शरीर के लिए ही नहीं, अपितु मन, बुद्धि और चरित्र के विकास के लिए भी आवश्यक है।
इस प्रकार यह पाठ संस्कृत भाषा-कौशल के साथ-साथ आहार और मन के गहरे सम्बन्ध की समझ भी विद्यार्थियों तक पहुँचाता है। गुरु-शिष्य परम्परा की इसी भावना को आगे समझने के लिए विद्यार्थी ऋषिकुल्या का द्वितीय पाठ — विद्या और कला में अंतर भी देख सकते हैं, जहाँ गुरु की योग्यता और प्राचीन ज्ञान-परंपरा की चर्चा है। इसी पुस्तक-शृंखला का प्रथम पाठ — संविधानम् भी कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए एक उपयोगी सन्दर्भ है।
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